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                <title>सम्पादकीय - देश रोजाना</title>
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                <description>सम्पादकीय RSS Feed</description>
                
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                <title>कहीं हंसना, रोना और मुस्कुराना भूल तो नहीं रहे हैं: संजय मग्गू</title>
                                    <description><![CDATA[<p>कहीं हंसना, रोना और मुस्कुराना भूल तो नहीं रहे हैं<br />संजय मग्गू<br />बताइए, क्या जमाना आ गया है। रोने, अपनी पीड़ा किसी अनजान व्यक्ति के सामने सुनाने के लिए भी क्राइंग क्लब खुलने लगे हैं। इसके लिए बाकायदा घंटे के हिसाब से फीस भी देनी पड़ती है। देश के कई हिस्सों में खुले यह क्राइंग क्लब आपको आपके दुख के हिसाब से चार्ज भी करते हैं। क्या सचमुच हम अपने घर, परिवार, यार-दोस्तों से इतने कट गए हैं कि हमें रोने के लिए भी किसी दूसरे की सहायता लेनी पड़ रही है। यह सच है कि जैसे-जैसे जीवन शैली बदल</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p>कहीं हंसना, रोना और मुस्कुराना भूल तो नहीं रहे हैं<br />संजय मग्गू<br />बताइए, क्या जमाना आ गया है। रोने, अपनी पीड़ा किसी अनजान व्यक्ति के सामने सुनाने के लिए भी क्राइंग क्लब खुलने लगे हैं। इसके लिए बाकायदा घंटे के हिसाब से फीस भी देनी पड़ती है। देश के कई हिस्सों में खुले यह क्राइंग क्लब आपको आपके दुख के हिसाब से चार्ज भी करते हैं। क्या सचमुच हम अपने घर, परिवार, यार-दोस्तों से इतने कट गए हैं कि हमें रोने के लिए भी किसी दूसरे की सहायता लेनी पड़ रही है। यह सच है कि जैसे-जैसे जीवन शैली बदल रही है, लोग समाज से कटते जा रहे हैं। आज से तीन-चार दशक पहले तक इंसान दिन में एक बार जरूर अपने परिवार, हित-मित्रों के साथ घंटे-आधे घंटे बैठता था। खूब गप्पें लड़ाए जाते थे। हंसी-ठिठोली होती थी। इसी दौरान लोग अपने मन की पीड़ा को भी बता देते थे। सारे लोग मिलकर एक दूसरे की पीड़ा सुनकर उसका निदान खोजने की कोशिश करते थे। लोग भी इतने विश्वसनीय होते थे कि वह एक की पीड़ा का अंदाजा दूसरे को नहीं लगने देते थे। हंसी भी नहीं उड़ाते थे। हर दोस्त कमीना होते हुए भी दोस्त की पीड़ा को सुनकर खुद दुखी हो जाता था। उसे लगने लगता था कि यह उसका ही दुख है। गांव और शहर में शाम को होने वाली बैठकें लोगों के सुख-दुख की गाथाओं से भरी रहती थीं। लोग भावनाओं में बहकर अपने घर की पोल तक खोल दिया  करते थे, लेकिन मजाल है कि यह बात किसी दूसरे को पता चल जाए। आज दोस्तों, रिश्तेदारों, भाई-बहन, पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेमिका, बेटा-बेटी के होते हुए भी इंसान अकेला है। हर इंसान को यही लगता है कि कहीं इसके सामने हमने अपना दुखड़ा रोया और यह सबके सामने गा-गाकर बताएगा। फिर स्टेट्स, ईगो, अमीरी-गरीबी का फर्क भी अब आड़े आने लगा है। बचपन का दोस्त है, लेकिन अगर स्टेट्स में थोड़ा बहुत कम है, तो उसके सामने कैसे रोया जाए, अपने दिल की भड़ास निकाली जाए। इससे बेहतर है कि कुछ रुपये देकर किसी अंजान के सामने जार-जार रोकर अपने दुख को कम कर लिया जाए। आज लोगों की यही मनोवृत्ति हो गई है। यही कारण है कि सन 1917 में गुजरात के सूरत में देश में खुलने वाला पहला क्राइंग क्लब आज कई शहरों में खुल चुका है। यह कैसी विडंबना है कि हंसने और रोने के लिए क्लब खुलने लगे हैं। इन क्लबों में हंसना और रोना सिखाया जाता है, जबकि हंसना और रोना प्रकृति प्रदत्त स्वभाव है। जब बच्चा पैदा होता है, तो वह सबसे पहले रोता ही है। रोना प्रकृति सिखा देती है, नवजात को रोना सिखाने के लिए कोई क्लब नहीं होता है। वैसे ही उस बच्चे को हंसना और मुस्कुराना सिखाने के लिए कोई स्कूल नहीं खोला जाता है। कितने अफसोस की बात है कि इंसान हंसना, रोना और मुस्कुराना भूलता जा रहा है। सोचकर देखिए, आप दिन भर में कितनी बार अतीत या वर्तमान की किसी घटना को याद करके मुस्कुराए हैं। अपने घर-परिवार में अपनी पीड़ा बताते समय आपकी आंखों में आंसू आए हों। शायद एक बार भी नहीं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 22:19:47 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>नारी शक्ति वंदन अधिनियमः सशक्त भारत की ओर एक ऐतिहासिक कदम</title>
                                    <description><![CDATA[<p>भारत में महिलाओं की भूमिका सदियों से महत्वपूर्ण रही है, लेकिन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में उन्हें बराबरी का स्थान दिलाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाते रहे हैं।</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/editorial/nari-shakti-vandan-act-a-historic-step-towards-strong-india/article-633"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2026-04/img-20260415-wa0036.jpg" alt=""></a><br /><p>भारत में महिलाओं की भूमिका सदियों से महत्वपूर्ण रही है, लेकिन सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में उन्हें बराबरी का स्थान दिलाने के लिए निरंतर प्रयास किए जाते रहे हैं। इसी दिशा में नारी शक्ति वंदन अधिनियम एक ऐतिहासिक और दूरदर्शी पहल के रूप में सामने आया है। यह अधिनियम न केवल महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रदान करता है, बल्कि उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी का अवसर भी देता है।</p>
<p>प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के कुशल नेतृत्व में केंद्र सरकार ने महिलाओं के सशक्तिकरण को प्राथमिकता देते हुए अनेक योजनाएं और नीतियां लागू की हैं, जिनका उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को राजनीति में अधिक भागीदारी सुनिश्चित करना है। इसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है।</p>
<p>यह अधिनियम भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को और अधिक समावेशी बनाता है, जहां महिलाओं की आवाज को समान महत्व मिलता है। इससे महिलाओं को नीति निर्माण और प्रशासनिक निर्णयों में भाग लेने का अवसर मिलेगा। यह अधिनियम महिलाओं को केवल प्रतिनिधित्व नहीं देता, बल्कि उन्हें नेतृत्व की भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करता है।</p>
<p>प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने कई मंचों पर यह स्पष्ट किया है कि "नारी शक्ति" भारत की प्रगति का आधार है। उनका मानना है कि जब महिलाएं सशक्त होंगी, तभी देश तेजी से विकास करेगा। उनके नेतृत्व में सरकार ने महिलाओं को "लाभार्थी" से "निर्माता बनाने की दिशा में काम किया है। यानी महिलाएं अब केवल योजनाओं का लाभ लेने वाली नहीं, बल्कि देश के विकास में सक्रिय भागीदार बन रही हैं।</p>
<p>प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने महिलाओं के सशक्तिकरण को प्राथमिकता देते हुए अनेक योजनाएं और नीतियां लागू की हैं, जिनका उद्देश्य महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाना है।</p>
<p>'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना का उद्देश्य बालिका जन्म दर में सुधार करना और लडकियों की शिक्षा को बढ़ावा देना है। इससे समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित हुई है। हर घर-हर गृहिणी योजना के तहत गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन दिए गए, जिससे उन्हें धुएं से मुक्ति मिली और उनके स्वास्थ्य में सुधार हुआ। जन-धन योजना के माध्यम से महिलाओं के बैंक खाते खोले गए, जिससे वे आर्थिक रूप से सशक्त बनीं और वित्तीय समावेशन को बढ़ावा मिला।</p>
<p>प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत गर्भवती महिलाओं को आर्थिक सहायता प्रदान कर उनके स्वास्थ्य और पोषण का ध्यान रखा गया है। सुकन्या समृद्धि योजना बालिकाओं के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए शुरू की गई, जिसमें उनकी शिक्षा और विवाह के लिए बचत की जाती है। मोदी सरकार ने स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण ने महिलाओं की गरिमा और सुरक्षा को बढ़ाया है। महिला स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा देकर उन्हें स्वरोजगार के अवसर प्रदान किए गए। डिजिटल इंडिया अभियान के तहत महिलाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ा गया, जिससे वे ऑनलाइन सेवाओं का लाभ उठा सकें।</p>
<p>राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लागू होने से महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या बढ़ेगी और महिला नेताओं को नए अवसर मिलेंगे। नीति निर्माण में महिलाओं का दृष्टिकोण शामिल होगा। मोदी सरकार का यह कदम भारतीय लोकतंत्र को और अधिक मजबूत बनाएगा।</p>
<p>यह अधिनियम केवल राजनीतिक सुधार नहीं है, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम भी है। महिलाओं के प्रति समाज की सोच बदलेगी तथा लड़कियों को आगे बढने की प्रेरणा मिलेगी। यह महिलाओं को समान अधिकार और अवसर प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।</p>
<p> </p>
<p>इस अधिनियम के लागू होने का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि शासन की प्राथमिकताओं में व्यापक बदलाव देखने को मिलेगा। जब निर्णय प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, तो शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सुरक्षा, जल और स्वच्छता जैसे विषय अधिक प्राथमिकता के साथ सामने आते हैं। स्थानीय निकायों में महिलाओं के आरक्षण का अनुभव पहले ही यह दर्शा चुका है कि महिला प्रतिनिधित्व से नीतियां अधिक जन-केंद्रित और प्रभावी बनती हैं। अब यही प्रभाव संसद और विधानसभाओं के स्तर पर दिखाई देगा, जिससे विकास की दिशा अधिक संतुलित और समावेशी होगी।</p>
<p>इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि पिछले एक दशक में तैयार की गई है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में महिलाओं के सशक्तिकरण को एक व्यापक और जीवन-चक्र आधारित दृष्टिकोण से देखा गया है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान ने सामाजिक सोच में सकारात्मक बदलाव लाया है और लड़कियों की माध्यमिक स्तर की नामांकन दर 80.2 प्रतिशत तक पहुंची है। सुकन्या समृद्धि योजना के तहत 4.6 करोड़ से अधिक खाते खोले गए हैं, जो बेटियों के भविष्य को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी में लगातार वृद्धि इस बदलाव की स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करती है।</p>
<p>प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार ने महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए जो कदम उठाए हैं, वे देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। आज की महिला केवल घर तक सीमित नहीं है, बल्कि हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही है। नारी शक्ति वंदन अधिनियम इसी बदलाव को और गति देगा और भारत को एक सशक्त, समावेशी और प्रगतिशील राष्ट्र बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।</p>
<p>'जब नारी सशक्त होगी, तभी राष्ट्र सशक्त होगा" यही इस अधिनियम का मूल संदेश है।</p>
<img src="https://www.deshrojana.com/media/2026-04/img-20260415-wa0036.jpg" alt="IMG-20260415-WA0036" width="1251" height="1280"></img>
लेखिका - सुमन सैनी उपाध्यक्ष, हरियाणा राज्य बाल कल्याण परिषद् ।

<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 22:55:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Desh Rojana Bureau]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>नए साल 2026 में करें नशे पर प्रहार, युवा पीढ़ी को इससे बचाना समय की मांग </title>
                                    <description><![CDATA[<p>समाज के बदलते परिवेश में कुछ अलग करने की चाह, मानसिक तनाव, कम समय में अधिक कमाने, बेरोजगारी और बहुत से गैर जरूरी शौक ऐसे कारण है जो</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/yoth/the-need-of-the-hour-is-to-attack-drugs-in/article-263"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-12/cccccccccccccccccccccc.jpeg" alt=""></a><br /><p>समाज के बदलते परिवेश में कुछ अलग करने की चाह, मानसिक तनाव, कम समय में अधिक कमाने, बेरोजगारी और बहुत से गैर जरूरी शौक ऐसे कारण है जो नशे के प्रचलन को लगातार बढ़ा रहे हैं। इसका शिकार हमारी युवा पीढ़ी हो रही है। नशा करना युवाओं के लिए एक फैशन की तरह बन गया है जो दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। एक वक्त था जब नशे के लिए पंजाब ही जाना जाता था लेकिन अब हरियाणा व उसका नूंह जिला भी नशे की गिरफ्त में जकड़ते जा रहे हैं। दुर्भाग्य ये भी है कि यहां नशे से लड़ने के लिए पर्याप्त संसाधन और सुविधाएं मौजूद नहीं हैं।</p>
<p>भारत में हर साल लगभग 20 लाख लोग तंबाकू से होने वाली बीमारियों के कारण मर जाते है और लगभग 5 लाख लोग हर वर्ष शराब के कारण मर जाते है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 28 करोड़ लोग किसी न किसी मादक पदार्थ का सेवन कर रहे है जिनमे से 16 करोड़ लोग शराब और 12 करोड लोग अन्य मादक पदार्थों का सेवन कर रहे है। इस रिपोर्ट के ही अनुसार इनमे से लगभग 6 करोड लोग नशा छोड़ना चाहते है पर वो सुविधाएं न मिलने के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे है। जो पीड़ित नशा छोड़ना चाहते हैं उनके लिए ज़रूरी सुविधाएं नहीं होना चिंतनीय है। ये सरकार और प्रशासन का दायित्व है कि नशा छोड़ने वालों के लिए हर मुमकिन सहयोग दे। </p>
<p>करोड़ों बच्चे सूंघने वाले नशे कर रहे है जिनमे व्हाइटनर और सिलोचन जो की जूते चिपकाने पंचर बनाने और फर्नीचर बनाने में काम आता है, इनमे स्ट्रीट चाइल्ड बहुत ज्यादा है जो कि अधिकतर सूंघने वाले नशे करते है। ये मासूम बच्चे बड़े होकर असामाजिक तत्व बनते है और आपराधिक गतिविधियों में लिप्त रहते है। </p>
<p>यदि हम इस बात पर विचार करें की क्यों ये स्थिति आती है तो हम पाएंगे कि इसका मुख्य कारण नशे की समस्या के बारे में समाज में व्याप्त गलत धारणाएं है। हमारे समाज में नशे की समस्या को एक बुरी लत या एक सामाजिक बुराई के तौर पर देखा जाता है जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन 1964 में एडिक्शन को बीमारी घोषित कर चुका है।</p>
<p>हमारे समाज में जब कोई व्यक्ति एडिक्ट हो जाता है तो उसको ठीक करने के लिए सबसे पहले पीटा जाता है,जब पिटाई से काम नहीं होता तो फिर पूजा पाठ और बाबा भभूत से उसको ठीक करने की कोशिश की जाती है, जब ये सब तरीके असफल हो जाते है तो आखिरी में ये कहा जाता है कि इसकी शादी कर दो शादी के बाद ये ठीक हो जायेगा।<br />क्या हम किसी और बीमारी को ऐसे ठीक करने की कोशिश करते है ?</p>
<p>नशे की बीमारी में भी पीड़ित को अन्य बीमारियों की तरह ही उपचार की आवश्यकता होती है, कोई बीमार व्यक्ति अपना उपचार स्वयं नहीं कर सकता है जबकि हम शुरू से उसके दिमाग में ये बात भर देते है कि वो खुद ठीक हो सकता है वो बेचारा खुद ही अपना उपचार करता रहता है जिसका कोई नतीजा नहीं निकलता है।</p>
<p>अतः एकदम से नशे बंद करने के लिए चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता होती है और इसके बाद ही उनको साइकोलॉजिकल प्रोग्राम एवं काउन्सलिंग की मदद से ही नशे से दूर रखा जा सकता है।<br />किसी भी चिकित्सा शास्त्र में ऐसी कोई दवाई उपलब्ध नहीं है जिनको खिलाकर नशे छुड़वाए जा सकें।</p>
<p><br />नशे की लत में परिवार के सदस्यों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, किसी प्रियजन को नशे की लत में डूबते देखना बेहद दर्दनाक अनुभव होता है। आप उस व्यक्ति की कितनी परवाह करते हैं, यह तो स्वाभाविक है, लेकिन उनका व्यवहार आपको क्रोधित, असहाय, दोषी, भयभीत, अकेला, थका हुआ और निराश महसूस करा सकता है। अक्सर, लत से ग्रस्त व्यक्ति अपने द्वारा किए जा रहे विनाश से अनजान होता है, जिससे मदद प्राप्त करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो जाता है।  </p>
<p>नशा हर किसी को प्रभावित करता है। जीवनसाथी, माता-पिता, बच्चे और भाई-बहन। किसी व्यक्ति के नशे की लत से जुड़ी आदतों को लेकर लगातार चिंता और तनाव से दोस्तों और परिवार के सदस्यों पर मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से बुरा असर पड़ सकता है। तनाव बढ़ जाता है और झगड़े आम बात हो जाती है। उचित इलाज के बिना, नशा आपके घर, काम और पारिवारिक जीवन को तबाह कर सकता है।</p>
<p><br />नशे की लत से ग्रस्त व्यक्ति एक चलती-फिरती बम की तरह होता है। उनका अनियमित व्यवहार और तर्कहीन निर्णय परिवार के सदस्यों के साथ लगातार मतभेद का कारण बनते हैं। शराब या नशीली दवाओं को अपनी प्राथमिकता बनाकर, व्यसनी व्यक्ति दूसरों को अपराधबोध कराता है और भावनात्मक रूप से उनका शोषण करता है। मस्तिष्क पर नशीले पदार्थों के प्रभाव के कारण, उनमें क्रोध के प्रकोप की संभावना अधिक होती है।</p>
<p><br />मौजूदा समय में देश की कुल आबादी में 35 साल से कम उम्र के युवाओं की संख्या लगभग 65 फीसदी है। ऐसे में अगर युवाओं के बीच नशे का चलन बढ़ता है तो यह देश के लिए आने वाले समय में गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। युवाओं को नशे की लत से बचाने के लिए सरकारों  को व्यापक अभियान चलाने की विशेष जरूरत है।</p>
<p>नशे के खिलाफ सभी को लामबंद होना पड़ेगा वो चाहे सामाजिक संस्थाएं हो, राजनैतिक दल हो, आम नागरिक हो, प्रशासन हो , सभी को एक मंच पर आकर नशे के खिलाफ काम करना पड़ेगा तब जाकर कहीं नशे को खत्म या कम किया जा सकेगा। 1996 में हरियाणा के मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल ने नशे (शराब) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू की थी (1 जुलाई 1996 से)। यह उनके कार्यकाल का एक बड़ा कदम था, क्योंकि उन्होंने नशे को खत्म करने के वादे पर जनता से समर्थन लिया था। हालांकि, इस नीति के लागू होने के कुछ ही समय बाद अवैध शराब की तस्करी और राजस्व का नुकसान, जिसके कारण अंततः उनकी सरकार को इस फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ा और यह प्रतिबंध हटाना पड़ा। <br />आज फिर शराब बंदी और नशे बंदी के खिलाफ एकजुट होकर साहसिक कदम उठाया जाना चाहिए। मैं खुद 2026 के साल में नशे के खिलाफ नूंह में लोगों को जागरूक करने के लिए प्रतिबद्ध हूं। हाल ही में हुए शीतकालीन विधानसभा सत्र में मैंने नशे के मुद्दे को गंभीरता से सदन में उठाया था, क्योंकि नशे से पीड़ित लोगों को हम सभी की मदद की जरूरत है।</p>
<p>अगर समय रहते हुए हमने नशे का नाश नहीं किया तो नशा हमारे समाज का नाश कर देगा। आप सभी को नए साल की शुभकामनाएं और आप नए साल में ये प्रण लें कि कम से कम एक इंसान को नशे के चंगुल से बाहर निकालने में मदद करेंगे और समाज को नशे के खिलाफ जागरूक करेंगे। </p>
<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-12/cccccccccccccccccccccc.jpeg" alt="cccccccccccccccccccccc" width="550" height="531"></img></p>
<p> </p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>यूथ</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Dec 2025 17:35:56 +0530</pubDate>
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                <title>ऊसर में खिला फूल: दलित जीवन का संघर्ष</title>
                                    <description><![CDATA[<p>  प्रतिकूल परिस्थितियों में, जीवन की सारी उर्वर शक्तियों को निचोड़कर स्वयं को पल्लवित रखने का संघर्ष, ऊसर में फूल खिलने जैसा है। 'ऊसर' का अर्थ ही ऐसी ज़मीन है जो जीवन के लिए योग्य नहीं है, फिर भी कुछ कैक्टस जैसे उद्भिज उस ज़मीन से अपने जीवन का रस निचोड़कर खुद को जीवित रखते हैं और जीवटता का परिचय देते हैं। जालिम प्रसाद की आत्मकथा 'ऊसर में  फूल' भी ऐसे ही जीवन की कहानी है, जैसा मरुभूमि में कैक्टस का होता है।</p>]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/editorial/the-struggle-of-dalit-life-bloomed-in-the-bud/article-125"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-11/whatsapp-image-2025-11-11-at-4.22.01-pm.jpeg" alt=""></a><br /><p>  प्रतिकूल परिस्थितियों में, जीवन की सारी उर्वर शक्तियों को निचोड़कर स्वयं को पल्लवित रखने का संघर्ष, ऊसर में फूल खिलने जैसा है। 'ऊसर' का अर्थ ही ऐसी ज़मीन है जो जीवन के लिए योग्य नहीं है, फिर भी कुछ कैक्टस जैसे उद्भिज उस ज़मीन से अपने जीवन का रस निचोड़कर खुद को जीवित रखते हैं और जीवटता का परिचय देते हैं। जालिम प्रसाद की आत्मकथा 'ऊसर में  फूल' भी ऐसे ही जीवन की कहानी है, जैसा मरुभूमि में कैक्टस का होता है।</p>
<p> <img style="margin-left:auto;margin-right:auto;" src="https://www.deshrojana.com/media/2025-11/whatsapp-image-2025-11-11-at-4.21.59-pm.jpeg" alt="WhatsApp Image 2025-11-11 at 4.21.59 PM" width="731" height="521"></img><br />   <br />       लेखक जालिम प्रसाद, ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि उनकी आत्मकथा एक उपन्यास न होकर लघुकथाओं का संकलन है । यह कथन इस आत्मकथा की शैलीगत विशिष्टता को दर्शाता है, जिसे अद्वितीय कहा जा सकता है। यह आत्मकथा छोटे-छोटे प्रसंगों का प्रस्तुतीकरण है। आत्मकथा में जीवन के अनुभवों को छोटे-छोटे, शीर्षक-आधारित खंडों में बाँटा गया है जैसे ‘पढ़ता है तो क्या सिर पर चलेगा?’, ‘शिक्षण शुल्क के अभाव में नाम कट जाना’ आदि प्रसंग लेखक के अनुभव को दर्शाता है। यह शैली पाठक को लेखक के जीवन के प्रत्येक संघर्ष और उपलब्धि को एक अलग और पूर्ण कहानी के रूप में ग्रहण करने का अवसर देती है। समीक्षक नवल किशोर कुमार के अनुसार, लेखक की भाषा बेहद सरल और कथ्य बेहद सपाट है। यह शैली दलित साहित्य की ‘भोगे गए यथार्थ’ को सीधे, बिना किसी ‘मसाले’ के, पाठकों के सामने रखती है, जिससे प्रामाणिकता का बोध होता है। वरिष्ठ साहित्यकार अजय यतीश और युवा साहित्यकार अमित कुमार दोनों ने इस कृति को दलित साहित्य की परंपरा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप और स्वागत योग्य दस्तावेज माना है। जिससे यह आत्मकथा ओमप्रकाश वाल्मीकि, तुलसी राम, मोहनदास नैमिशराय जैसे दलित लेखकों की परंपरा में खड़ी होती है। यह भारतीय सामाजिक व्यवस्था के स्याह पक्ष और जाति दुर्व्यवस्था के प्रामाणिक दस्तावेज के रूप में सामने आती है। वरिष्ठ साहित्यकार अजय यतीश के अनुसार, यह लेखक के आंतरिक और बाह्य जीवन में भोगे गए संघर्षों और पीड़ित दलित की वेदना का दस्तावेज है। यह सिर्फ  एक व्यक्ति की नहीं, अपितु पूरे दलित समाज की कहानी मालूम पड़ती है, जिसमें आत्मविश्वास, आत्मसम्मान और स्वाभिमान का स्वर निहित है। समीक्षक ताराचंद कटारिया के शोधपत्र के आधार पर, अमित कुमार ने बताया है कि दलित आत्मकथाओं के तीन बुनियादी बिंदु विद्रोही चेतना, इतिहास बोध और भविष्य द्रष्टा इस कृति में अपने पूरे वैचारिकी के साथ मौजूद हैं। यह आत्मकथा चेतनाशील होने वाले दलितों की पहली पीढ़ी की सच्ची दास्तान है। समीक्षकों ने ज़ोर दिया है कि लेखक का संघर्ष जैसे छठी कक्षा में दाखिले के लिए ईंट ढोना और सफलता सिर्फ एक अकेले की नहीं, वरन पूरे समाज व समुदाय के लिए प्रेरणादायक है ।</p>
<p>         लेखक ने अपनी आत्मकथा में कठिन संघर्षों और खट्टे-मीठे अनुभवों का समावेश किया है, जो इसकी विषय-वस्तु को अत्यंत समृद्ध बनाते हैं। इसमें जातिगत शोषण के कई उदाहरण हैं, जैसे’पढ़ लिखकर वकील थोड़े बन जाएगा?’ जैसे ताने है साइकिल और रजाई-गद्दा रखने पर ईर्ष्या और धमकी तक दी जाती है। छोटी जाति का होने के कारण क्लास मॉनीटर न बन पाना लेखक के बालपन के मन को कटुता से भर देता है। शूद्रों के बीच भी छुआछूत का चलन जैसे मुद्दे को बेबाकी से उठाया गया है। । लेखक का बचपन और किशोरावस्था शारीरिक और मानसिक शोषण तथा अभाव में बीता था। इसमें शिक्षण शुल्क के अभाव में नाम कट जाने और रात में पढ़ने के लिए मिट्टी के तेल की कमी जैसे मार्मिक प्रसंग हैं दलित जीवन के घोर अभाव और मानसिक विषाद को दिखाया है। लेखक को भूत का भय और बोर्ड परीक्षा में पास होने के लिए खीर भोजन की मनौती जैसे अंधविश्वासों से भी जूझना पड़ा, जहाँ उन्होंने हिम्मत और साहस से काम लिया। कुल मिलाकर, ‘ऊसर में फूल’ अपनी अद्वितीय शैली लघुकथाओं का संकलन और दलित जीवन के यथार्थ, संघर्ष, और चेतना के गहन चित्रण के कारण दलित साहित्य की परंपरा में एक सशक्त और यादगार कृति है।<img style="float:left;" src="https://www.deshrojana.com/media/2025-11/whatsapp-image-2025-11-11-at-4.22.00-pm.jpeg" alt="WhatsApp Image 2025-11-11 at 4.22.00 PM" width="293" height="209"></img></p>
<p>         लेखक के जीवन में जातिगत भेदभाव के कई कटु अनुभव रहे है,’पढ़ता है तो क्या सिर पर चलेगा?’ जब लेखक पाँचवी कक्षा में थे और अख़बार पढ़ रहे थे, तो एक ग्रामीण बड़े आदमी ने आस-पड़ोस के लोगों को सुनाते हुए यह कहा था, 'चंद्रमन का लड़का अब अखबार पढ़ने लगा है'। एक बार पतले मेड़ पर से उतर जाने पर भी एक बड़े किसान ने उनसे पूछा था, ‘अब तुम पढ़ता है तो सिर पर चलेगा?’ ‘पढ़ लिखकर वकील थोड़े बन जाएगा?’ हल चलाते समय, खेत के मालिक खेमन ओझा ने लेखक को हतोत्साहित करते हुए कहा था कि ‘इसके बाप-दादा यही किये हैं और यह भी यही कर रहा है और आगे भी यही करना होगा'।  पढ़ लिखकर वकील थोड़े बन जाएगा?’ ‘पढ़कर लाट साहब नहीं बनेगा उठाना तो गोबर है’ एक सवर्ण सहपाठी की माँ ने लेखक की माँ से कहा था कि ‘तुम्हारा लड़का पढ़ लिखकर लाट साहब नहीं बनेगा। आखिर पढ़ लिखकर भी गोबर ही उठायेगा’। बाबा साहब ने हमें जो धारदार हथियार के रूप में शिक्षा दिया है उसे सवर्ण समाज उसके धार को कुंद कारने का भरसक प्रयास करता है। साइकिल से ईर्ष्या जैसे प्रसंग भी उठाया गया है।  जब लेखक डिग्री कॉलेज पढ़ने के लिए स्वच्छ वस्त्र पहनकर साइकिल से जाते थे, तो गाँव और दूसरे गाँव के लोग आपस में चर्चा करते थे कि ‘एक छोटी जाति का लड़का साइकिल पर बैठकर हम लोगों के सामने से सर से निकल जाता है। यह हम लोगों को अच्छा नहीं लगता’। रजाई-गद्दा से ईर्ष्या से भी उनको ईर्ष्या है। लेखक को दहेज में मिले रजाई-गद्दे को दरवाज़े पर धूप दिखाने पर, गाँव के एक दबंग राय साहब (दलसिंगार राय) ने सूचना भिजवाई थी कि ‘रजाई गद्दा को घर में रखे नहीं तो हम किसी दिन माचिस लगाकर जला देंगे’ दलित को शिक्षा प्राप्त करने का रास्ता भी आसान नहीं है। लेखक को शिक्षा प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ा। ‘छठी कक्षा के लिए ढोना पड़ा ईंट’ इंटर कॉलेज में दाखिले के लिए शिक्षण शुल्क, पंजीकरण शुल्क, किताब-कॉपी और स्कूल पोशाक की व्यवस्था न होने के कारण, लेखक एक ईंट भट्ठे पर गए और मुंशी को जवाब दिया कि ‘मुझे आगे पढ़ना है इसलिए मुझे ईंट ढोना है’। माध्यमिक विद्यालयों में अनुसूचित जाति के लिए छह आने शिक्षण शुल्क लगता था। यह फीस न देने के कारण लेखक का नाम अनेक बार कट जाता था । नाम कट जाने के बाद वह मजदूरी करके पैसा कमाते और दंड शुल्क एक आने के साथ अपना नाम फिर से लिखवाते थे। लेखक रात का बचा हुआ बासी खाना खाकर स्कूल जाते थे, क्योंकि माँ को सुबह जल्दी काम पर जाना होता था और घर में ताज़ा बनाने के लिए कुछ होता भी नहीं था। रात में पढ़ने के लिए एकमात्र सहारा ढिबरी (दीपक) था। तेल केवल खाना बनाने और खाने के समय तक ही जलता था, पढ़ने के लिए तेल नहीं अँटता था। इसलिए, लेखक एक पड़ोसी के यहाँ बाज़ार करने के बदले पढ़ते, लिखते और सोते थे, जहाँ रात भर दीपक जलता था। </p>
<p>         शिक्षक बन जाने के बाद लेखक शिक्षा और विद्यार्थियों के विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए। एक शिक्षक के रूप में जालिम प्रसाद की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ और नए प्रयोग रहे हैं। यह एक शिक्षण पद्धति है जिसमें विद्यार्थी इच्छानुसार आपस में एक दूसरे को अपना गुरु और शिष्य बनाते हैं और अपनी शैक्षिक समस्याओं का समाधान खुद करते हैं। इस पद्धति में कक्षा को चार भागों में बाँटकर विभिन्न प्रतियोगिताओं कविता पाठ, कहानी, प्रश्नोत्तर आदि का आयोजन किया जाता था। शिक्षक केवल संयोजक की भूमिका निभाते थे। लेखक ने पुस्तकालय में बुक बैंक की स्थापना करवाई, जहाँ मेधावी विद्यार्थी अपनी पुरानी पुस्तकें और सुंदर गृहकार्य की उत्तर पुस्तिकाएँ जमा करते थे। इनका उपयोग उन निर्धन बच्चों के लिए किया जाता था जो पुस्तकें या गाइड नहीं खरीद सकते थे। लेखक को 2013 में केंद्रीय विद्यालय संगठन वाराणसी संभाग द्वारा विशिष्ट शैक्षिक उपलब्धियों के लिए ‘संभागीय प्रोत्साहन पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। यह उनकी योग्यता का प्रमाण है। </p>
<p>          जालिम प्रसाद की आत्मकथा 'ऊसर में फूल' दलित साहित्य की परंपरा में एक सशक्त हस्तक्षेप के रूप में सामने आती है। यह कृति दलित साहित्य के तीन बुनियादी तत्वों ‘विद्रोही चेतना, इतिहास बोध और भविष्य द्रष्टा’ को पूरी वैचारिकी के साथ प्रस्तुत करती है ।लेखक ने स्वयं इसे उपन्यास न होकर लघुकथाओं का संकलन माना है । यह अनूठी शैली जिसका तात्पर्य छोटे-छोटे, शीर्षक-आधारित अनुभवों के संकलन से है। भोगे गए यथार्थ को सीधे और सपाट भाषा में व्यक्त करती है। यह कथ्य को मसालों में लपेटे बिना प्रस्तुत करती है, जिससे इसकी प्रामाणिकता और पठनीयता बढ़ जाती है ।आत्मकथा में लेखक के बचपन से लेकर युवावस्था तक के जातीय शोषण और उत्पीड़न के खट्टे-मीठे अनुभवों का विस्तृत वर्णन है। आत्मकथा का केंद्रीय संदेश डॉ. भीमराव आंबेडकर के त्रिसूत्रीय नारे ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ पर आधारित है । लेखक ने शिक्षा के बल पर ही गरीबी, अंधविश्वास और जाति को मात दी है। लेखक का यह जीवन ‘तुफानों में साहस और ऊसर में फूल खिलाने के समान है’ । उन्होंने बिना रिश्वत और सिफारिश के, केवल आरक्षण के आधार पर अधिकतम योग्यता होने के बावजूद प्राथमिक शिक्षक से सेवा शुरू कर, व्याख्याता और कार्यवाहक उपप्राचार्य तक का सफ़र तय किया। यह कृति वर्तमान और भविष्य की पीढ़ी को यह विश्वास दिलाती है कि ‘मंजिल के मार्ग में गरीबी, अंधविश्वास और जाति बाधक नहीं बनेगी’ और कठोर परिश्रम से जिंदगी में कुछ भी हासिल किया जा सकता है।<br /> <br />          'ऊसर में फूल' जातिवाद के विद्रूप चेहरे को बेनकाब करने वाला एक ऐसा संस्मरणात्मक दस्तावेज है, जो अपनी लघुकथा-शैली में, दलित समाज की पहली पीढ़ी के संघर्ष, स्वाभिमान और शिक्षा के माध्यम से प्राप्त हुई आर्थिक मजबूती एवं संवैधानिक स्वर्ग की प्राप्ति की कहानी कहता है।</p>
<p>पुस्तक: ऊसर में फूल <br />लेखक: जालिम प्रसाद<br />प्रकाशक: स्वतंत्र प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली <br />मूल्य : ₹299/-<br />वर्ष: 2025  <br />समीक्षक: अजय चौधरी</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 11 Nov 2025 16:35:02 +0530</pubDate>
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