<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.deshrojana.com/editorial/category-21" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>देश रोजाना RSS Feed Generator</generator>
                <title>सम्पादकीय - देश रोजाना</title>
                <link>https://www.deshrojana.com/category/21/rss</link>
                <description>सम्पादकीय RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>काश  कि बेटी की फीस के लिए किसी रमाबाई को न दौड़ना पड़े</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="93" height="94" /></p>
<h5><strong>संजय मग्गू </strong></h5>
<p>कोई भी स्त्री अगर सबसे ज्यादा किसी को प्यार करती है, तो वह है उसकी संतान। मां अपनी संतान के लिए कुछ भी कर सकती है। किसी भी तरह का कष्ट उठा सकती है। जरूरत पड़ने पर वह अपने बच्चों के लिए किसी से भी भिड़ सकती है। दुनिया में मां और संतान का ही एक ऐसा रिश्ता है जो निस्वार्थ होता है। इसमें किसी प्रकार की लालसा या लोभ नहीं होता है। वैसे तो दुनिया भर की मांओ ने समय-समय पर अपनी संतान के लिए ऐसे काम किए हैं जो इतिहास बन गए।</p>
<p>  </p>
<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2026-09/anand-panchang_1621684090.jpg" alt="anand-panchang_1621684090" width="1200" height="1013" /></p>
<p>26 अगस्त को महाराष्ट्र</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/i-wish-that-no-ramabai-has-to-run-for-her/article-4099"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="93" height="94"></img></p>
<h5><strong>संजय मग्गू </strong></h5>
<p>कोई भी स्त्री अगर सबसे ज्यादा किसी को प्यार करती है, तो वह है उसकी संतान। मां अपनी संतान के लिए कुछ भी कर सकती है। किसी भी तरह का कष्ट उठा सकती है। जरूरत पड़ने पर वह अपने बच्चों के लिए किसी से भी भिड़ सकती है। दुनिया में मां और संतान का ही एक ऐसा रिश्ता है जो निस्वार्थ होता है। इसमें किसी प्रकार की लालसा या लोभ नहीं होता है। वैसे तो दुनिया भर की मांओ ने समय-समय पर अपनी संतान के लिए ऐसे काम किए हैं जो इतिहास बन गए।</p>
<p> </p>
<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2026-09/anand-panchang_1621684090.jpg" alt="anand-panchang_1621684090" width="1280" height="1013"></img></p>
<p>26 अगस्त को महाराष्ट्र के बीड जिले की 47 वर्षीय रमाबाई रणवीर ने अपनी बेटी की फीस जुटाने के लिए मैराथन में भाग लिया और दौड़ जीतकर तीन हजार रुपये हासिल कर लिया। बीड जिले में 29 अगस्त 2026 को खोलेश्वर एजुकेशनल कॉम्प्लेक्स के अमृत जयंती वर्ष के मौके पर 'अमृत दौड़' (मैराथन) का आयोजन किया गया था। इस दौड़ में रमाबाई ने हिस्सा लिया और साड़ी पहनकर दौड़ीं। इस दौड़ में भाग लेने वाले लोगों के पास हर तरह की सुविधाएं थीं, लेकिन साड़ी में दौड़ने वाली रमाबाई के सामने बस एक ही लक्ष्य था कि उन्हें अपनी छोटी बेटी की फीस के लिए यह दौड़ जीतनी है। दौड़ते समय जब चप्पल फिसलने लगी, तो चप्पल को हाथ में लेकर दौड़ीं और मैराथन जीत लिया। रमाबाई का मैराथन जीतना उतनी बड़ी घटना नहीं है जितनी कि उस दौड़ में हिस्सा लेने का कारण है। एक तरह से यह उस व्यवस्था के मुंह पर करारा तमाचा है, जो यह कहते हुए नहीं थकती है कि उनके राज्य में बच्चों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है।</p>
<p>यह सवाल भी उठना लाजिमी है कि जरूरतमंद छात्रों के लिए घोषित छात्रवृत्तियां, फीस माफी, मुफ्त किताबें और छात्रावास जैसी सुविधाएं अगर राज्य सरकार दे रही है तो वह हासिल किसे हो रही है? तमाम सुविधाएं हासिल करने वालों की सूची में रमाबाई रणवीर की बेटी शामिल क्यों नहीं है? यह सही है कि महाराष्ट्र सरकार ने रमाबाई की आर्थिक मदद करने का आश्वासन दिया है, लेकिन ऐसी नौबत ही क्यों आई कि एक 47 वर्षीय मां को अपनी बेटी की फीस और कापी-किताबों के लिए दौड़ना पड़ा। ऐसी स्थिति तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए स्वीकार्य नहीं होना चाहिए। संतोष की बात यह है कि रमाबाई को शिक्षा का महत्व ज्ञात है। वह इतनी परेशानी के बावजूद अपनी दोनों बेटियों को उचित शिक्षा देने को संघर्षरत हैं। पति की मौत के बाद भी जिस तरह वह अपनी बेटियों का भविष्य सुधारने की कोशिश में लगी हुई हैं, वह निस्संदेह प्रणम्य है। लेकिन उनकी दौड़ की घटना को यों ही कुछ दिनों बाद भुला देना, उचित नहीं है।</p>
<p>एक लोकतांत्रिक और संवेदनशील व्यवस्था के लिए उचित यही है कि वह ऐसी व्यवस्था करे कि भविष्य में किसी भी मां को अपनी संतान को पढ़ाने के लिए इस तरह का साहस न करना पड़े। शिक्षा के प्रति समर्पित एक मां की यह साहसिक मिसाल तो हो सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए लज्जाजनक भी है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/i-wish-that-no-ramabai-has-to-run-for-her/article-4099</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/i-wish-that-no-ramabai-has-to-run-for-her/article-4099</guid>
                <pubDate>Fri, 04 Sep 2026 13:45:07 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg"                         length="90226"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जलवायु परिवर्तन की चेतावनी सुनो, अभी समय है चेत जाओ</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="134" height="136" /></p>
<h5><strong>संजय मग्गू</strong></h5>
<p>यह प्रकृति की द्वंद्वात्मकता ही है कि पृथ्वी के एक हिस्से में इन दिनों आग बरस रही है, जंगल जल रहे हैं और वहीं दूसरी ओर भारी बारिश के चलते जल प्रलय हो रही है। यूरोप में आल्पस पर्वत जल रहा है। यूरोप के वनों में आग लग रही है। ऐसा लगता है कि अग्नि ने यूरोप के जंगलों में अपना डेरा जमा लिया है। यूरोप में अगस्त के दूसरे पखवाड़े की शुरुआत तक यूरोप में पिछले साल की तुलना में इस बार ढाई गुना ज्यादा जंगल स्वाहा हो गए। यूरोप तपती हुई गर्म भट्टी की तरह हो</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/listen-to-the-warning-of-climate-change-now-is-the/article-4043"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="134" height="136"></img></p>
<h5><strong>संजय मग्गू</strong></h5>
<p>यह प्रकृति की द्वंद्वात्मकता ही है कि पृथ्वी के एक हिस्से में इन दिनों आग बरस रही है, जंगल जल रहे हैं और वहीं दूसरी ओर भारी बारिश के चलते जल प्रलय हो रही है। यूरोप में आल्पस पर्वत जल रहा है। यूरोप के वनों में आग लग रही है। ऐसा लगता है कि अग्नि ने यूरोप के जंगलों में अपना डेरा जमा लिया है। यूरोप में अगस्त के दूसरे पखवाड़े की शुरुआत तक यूरोप में पिछले साल की तुलना में इस बार ढाई गुना ज्यादा जंगल स्वाहा हो गए। यूरोप तपती हुई गर्म भट्टी की तरह हो गया है। लोग गर्मी के मारे बदहाल हैं। यूरोप के देशों में अगस्त महीने की शुरुआत में ही गर्मी के चलते काफी संख्या में लोगों के मरने की खबरें आई थीं। तब लोगों से यह अपील की गई थी कि वह दोपहर के समय घर से बाहर निकलने से परहेज करें। वहीं, हिमालय क्षेत्र में जल प्रलय की स्थिति है। अगस्त के आखिरी दिनों में तिब्बत में ग्लेशियर के पिघलने से नेपाल में आया सैलाब प्रकृति की इसी द्वंद्वात्मकता को साबित कर रहा है। एक तरफ तो यूरोप जलती भट्टी की तरह गर्म हो रहा है, वहीं एशिया में स्थित हिमालयी क्षेत्र में बरसात और टूटते ग्लेशियरों ने भारी तबाही मचा रखी है। यूरोप और एशिया की यह दोनों स्थितियां एक दूसरे से अलग नहीं हैं। इन दोनों स्थितियों का आपस में बहुत गहरा संबंध है। ऐसा नहीं है कि अमेरिका, एशिया या यूरोप में जंगलों में आग नहीं लगती रही है। गर्मी के दिनों में हिमालयी क्षेत्रों में वनों में आग लगने की घटनाएं सदियों से होती रही हैं। लेकिन तब और अब के हालात में काफी अंतर है। हिमालयी क्षेत्रों में मानव हस्तक्षेप से पहले आग लगने की घटनाएं होती रही हैं, लेकिन तब प्रकृति आग को बुझाने की व्यवस्था स्वयं कर लेती थी। लेकिन जब से हर क्षेत्र में मानव हस्तक्षेप बढ़ा है, प्रकृति ने रौद्र रूप धारण करना शुरू कर दिया है। चार-पांच दशक पहले तक जलवायु विनियम में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका महासागर निभाते रहे हैं।</p>
<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2026-09/earth-global-warming.jpeg" alt="earth global warming" width="1280" height="852"></img> </p>
<p>जलवायु विनियमन प्रकृति की वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा पृथ्वी का पारिस्थितिक तंत्र तापमान, मौसम और वायुमंडल में गैसों के संतुलन को बनाए रखता है। वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का 91 प्रतिशत हिस्सा तो समुद्र ही सोख लेते थे। लेकिन जब से कार्बन उत्सर्जन असीमित हो गया, तब से समुद्र भी गर्म होने लगे और उनके अवशोषण की क्षमता भी कम हो गई। नतीजा यह हुआ कि समुद्र में भी जलीय जीवों का जीवनचक्र गड़बड़ा गया। कई जलीय जीव-जंतु तो विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए और बहुत सारे विलुप्त हो गए। इसी का नतीजा है कि कहीं बहुत अधिक बरसात हो रही है, तो कहीं सूखा पड़ा हुआ है। कहीं हाड को कंपा देने वाली ठंड पड़ रही है, तो कहीं इतनी गर्म पड़ रही है कि लोगों का जीवन दुश्वार हो गया है।  जलवायु परिवर्तन का यह प्रारंभिक चरण है। जैसे जैसे हालात बदलते जाएंगे, इंसानी जीवन खतरे में पड़ता जाएगा। जलवायु परिवर्तन हर जगह चेतावनी दे रहा है। यदि अभी नहीं संभले, तो दोबारा मौका नहीं मिलने वाला है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/listen-to-the-warning-of-climate-change-now-is-the/article-4043</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/listen-to-the-warning-of-climate-change-now-is-the/article-4043</guid>
                <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 11:49:45 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg"                         length="90226"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भाजपा के गले की फांस बनता जा रहा आरक्षण मुद्दा</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="105" height="106" /></p>
<h4><strong>संजय मग्गू</strong></h4>
<p>आरक्षण का मामला आजादी के बाद से ही चुनावी वैतरणी पार उतरने का एक बहुत बेहतरीन जरिया रहा है। आरक्षण के मुद्दे को ढाल बनाकर चुनाव जीते जाते रहे हैं। आज भी हालात बदले नहीं हैं, लेकिन इन दिनों जो हालात हैं, उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि भाजपा आरक्षण के मुद्दे पर फंसती हुई दिखाई दे रही है। दिल्ली से लेकर शहर और ग्रामीण इलाकों में आरक्षण हटाओ आंदोलन की चर्चा हो रही है। उस पर जब 27 अगस्त को भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा आरक्षण हटाओ आंदोलन के प्रतिनिधियों से</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/reservation-issue-is-becoming-a-thorn-in-the-neck-of/article-4017"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="105" height="106"></img></p>
<h4><strong>संजय मग्गू</strong></h4>
<p>आरक्षण का मामला आजादी के बाद से ही चुनावी वैतरणी पार उतरने का एक बहुत बेहतरीन जरिया रहा है। आरक्षण के मुद्दे को ढाल बनाकर चुनाव जीते जाते रहे हैं। आज भी हालात बदले नहीं हैं, लेकिन इन दिनों जो हालात हैं, उसको देखते हुए कहा जा सकता है कि भाजपा आरक्षण के मुद्दे पर फंसती हुई दिखाई दे रही है। दिल्ली से लेकर शहर और ग्रामीण इलाकों में आरक्षण हटाओ आंदोलन की चर्चा हो रही है। उस पर जब 27 अगस्त को भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा आरक्षण हटाओ आंदोलन के प्रतिनिधियों से जब मिलने पहुंचे, तो उन लोगों में जो आरक्षण को बरकरार रखना चाहते हैं, उनमें यह आशंका जरूर पैदा हुई कि कहीं भाजपा आरक्षण हटाने की तैयारी में तो नहीं है। भाजपा इन दिनों दो नावों पर सवार दिखाई देती है। वह खुलकर आरक्षण का समर्थन कर सकती है, न आरक्षण का विरोध। दोनों में से किसी एक के पक्ष में जाने पर उसका चुनावी समीकरण गड़बड़ा जाने की आशंका है। अगले साल सात राज्यों गोवा, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर, उत्तर प्रदेश, गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होने हैं। भाजपा न अपने दलित वोटबैंक को नाराज कर सकती है, न सवर्ण वोट बैंक को। यही वजह है कि भाजपा के ज्यादातर नेता इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। वह कुछ भी बोलने से कतराते हैं। वैसे भी भाजपा पिछले दस वर्षों में बड़ी मुश्किल से अपने ऊपर लगे सवर्ण पाटी का टैग हटाने में सफल हुई है। गैर-जाटव दलित, गैर-यादव ओबीसी और अति पिछड़ा वर्ग नया वोट बैंक है जिसने उसे उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में निर्णायक बढ़त दिलाई है। इन समुदायों की मांग आरक्षण को कम करने की नहीं, बल्कि उसे और अधिक न्यायपूर्ण और बारीक करने की है।</p>
<p>सुप्रीम कोर्ट ने जब एससी-एसटी के भीतर सब-क्लासिफिकेशन और क्रीमी लेयर की बात की, तो भाजपा के लिए यह एक मौका भी था और एक खतरा भी। अगर वह इसका समर्थन करती है तो अति वंचित समुदायों में भरोसा बढ़ेगा, लेकिन जाटव और पासी जैसी प्रभावशाली दलित जातियों को लगेगा कि उनका हक छीना जा रहा है।  इतना ही नहीं, यूजीसी के नए नियमों का मामला भाजपा के गले की फांस बन गया है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में एससी-एसटी और ओबीसी के लिए शिकायत प्रकोष्ठ, भेदभाव रोकने के सख्त नियम और प्रवेश व नियुक्तियों में आरक्षण के कड़ाई से पालन के निर्देशों ने सामान्य वर्ग के शिक्षकों और छात्रों में भारी रोष पैदा कर दिया है। वे इसे शिक्षा में सरकारी दखल और योग्यता के खिलाफ बता रहे हैं और सीधे भाजपा सरकार को घेर रहे हैं। वहीं दलित-पिछड़े संगठनों का आरोप है कि सरकार इन नियमों को कागज पर तो ला रही है, पर जमीन पर लागू कराने की इच्छाशक्ति नहीं दिखा रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन खुद असमंजस में है कि किसे खुश करे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/reservation-issue-is-becoming-a-thorn-in-the-neck-of/article-4017</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/reservation-issue-is-becoming-a-thorn-in-the-neck-of/article-4017</guid>
                <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 13:03:38 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg"                         length="90226"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>डिजिटल युग ने जितना दिया, उससे कहीं ज्यादा छीन लिया</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="106" height="108" /></p>
<h5><strong>संजय मग्गू</strong></h5>
<p>हमारे समाज में बातचीत की परंपरा लगभग खत्म होती जा रही है। लोगों को अकसर यह भ्रम होता है कि वह परिवार के साथ हैं। लेकिन सच तो यह है कि वह परिवार के संपर्क में हैं, परिवार के साथ नहीं। आफिस हो या घर, सब जगह आमने-सामने बात करने के अवसर कम होते जा रहे हैं। अगर आफिस में ही किसी सहकर्मी से कुछ पूछा या निर्देश देना हो, तो हम ह्वाट्सएप या ई मेल पर कुछ शब्द टाइप करके भेज देते हैं। वह भी काम चलाऊ लिमिटेड वर्ड्स। एकदम मशीनी अंदाज में। क्या यह बेहतर नहीं</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/sanjay-maggu-the-digital-age-took-away-more-than-it/article-3988"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="106" height="108"></img></p>
<h5><strong>संजय मग्गू</strong></h5>
<p>हमारे समाज में बातचीत की परंपरा लगभग खत्म होती जा रही है। लोगों को अकसर यह भ्रम होता है कि वह परिवार के साथ हैं। लेकिन सच तो यह है कि वह परिवार के संपर्क में हैं, परिवार के साथ नहीं। आफिस हो या घर, सब जगह आमने-सामने बात करने के अवसर कम होते जा रहे हैं। अगर आफिस में ही किसी सहकर्मी से कुछ पूछा या निर्देश देना हो, तो हम ह्वाट्सएप या ई मेल पर कुछ शब्द टाइप करके भेज देते हैं। वह भी काम चलाऊ लिमिटेड वर्ड्स। एकदम मशीनी अंदाज में। क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम उसे मैसेज फारवर्ड करने की जगह फोन पर या आमने-सामने बात कर लें। बातचीत करते समय शब्दों की लय-गति, उच्चारण, चेहरे की भाव भंगिमा यह बता देती है कि सामने वाला क्या कहना चाहता है? बातचीत में जो आत्मीयता झलकती है, वह उन नीरस शब्दों में कहां होती है। बेजान शब्द भावों को व्यक्त नहीं करते हैं, केवल अर्थ बताते हैं।</p>
<p>यह सच है कि आज हम डिजिटल युग में जी रहे हैं। संवाद के नए-नए तरीके ईजाद हो गए हैं। लेकिन मैसेज को फारवर्ड करने की प्रवृत्ति ने मानवीय संवेदना को बहुत नुकसान पहुंचाया है। पति आफिस से निकलते समय अपनी पत्नी को मैसेज करता है, लेट आऊंगा। इन दो शब्दों को लिखने की जगह यदि वह अपनी पत्नी को फोन करके बात कर लेता, तो शायद इन दो शब्दों से कहीं ज्यादा बातचीत होती। दोनों एक दूसरे से बातचीत करके एक आत्मीयता महसूस करते। डिजिटल युग में प्रवेश करने से पहले रिश्ते काफी मजबूत हुआ करते थे। लोग खूब बतियाते थे, गप्पे मारते थे। यार-दोस्तों के साथ बैठकर शाम को धौल-धप्पा भी कर लिया करते थे। एक बाइंडिंग बन जाती थी, जुड़ाव मजबूत हो जाता था। अगर पति-पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन या यार-दोस्त दूर हैं, तो उस जमाने में चिट्ठियां लिखी जाती थीं। उन चिट्ठियों में एक खुशबू आती थी। प्यार की, समर्पण की, आत्मीय होने की। अब तो चिट्ठियों का जमाना गुजर गया। डाक विभाग ने भी पोस्टकार्ड, अंतरदेशीय और लिफाफे की बिक्री बहुत कम या बिल्कुल बंद कर दी है। लोग चिट्ठी पाने के बाद उसे सहेजकर रखते थे। कई बार तो चिट्ठियां लिखी जाते समय लिखने वाले की मनोदशा तक बयान कर देती थीं। पोस्टकार्ड या अंतरदेशीय पर गिरे आंसू के धब्बे अपनी कहानी कह जाते थे। लिखावट सुख-दुख की कहानी को बयां कर देती थी। लेकिन अब वह सब कुछ जैसे डिजिटल युग में बिला गया है। मैसेज तो फारवर्ड किए जा सकते हैं लेकिन भावनाओं को कैसे फारवर्ड किया जाए, यह डिजिटल युग में अभी संभव नहीं हो पाया है। अब तो प्रेम, गुस्सा, नफरत, सुख-दुख को व्यक्त करने के लिए ईमोजी आ गए हैं। दुखी हैं, तो दुखी वाला ईमोजी फारवर्ड कर दीजिए। आपके कर्तव्य की इतिश्री हो गई। खुश हैं, तो हंसता हुआ एक चेहरा भेज दीजिए। मानो अगला इस हंसते हुए चेहरे को देखकर खुश हो जाएगा। डिजिटल युग ने हमें जितना दिया है, उससे कहीं ज्यादा हमसे छीन लिया है। डिजिटल युग ने हमारी भावनाओं को नपुंसक बनाकर रख दिया है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/sanjay-maggu-the-digital-age-took-away-more-than-it/article-3988</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/sanjay-maggu-the-digital-age-took-away-more-than-it/article-3988</guid>
                <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 16:15:50 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg"                         length="90226"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्राकृतिक आपदाओं के सामने विज्ञान की ताकत फेल:  संजय मग्गू</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="95" height="97" /></p>
<h5><strong>संजय मग्गू </strong></h5>
<p>विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है। शरीर के भीतर छिपे वायरस को देखने और खोजने से लेकर अंतरिक्ष में ग्रहों और उपग्रहों की निगरानी करने तक में विज्ञान सक्षम है। अब तो हजारों किमी दूर बैठ डॉक्टर आपरेशन तक करता है। मोबाइल से दुनिया के किसी भी कोने में प्रियजन हों, उनसे बात करते हुए लाइव देखा जा सकता है। यह विज्ञान की ताकत है। विज्ञान ने पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया है। आध्यात्मिक क्षेत्र में भी विज्ञान ने हस्तक्षेप किया है। बहुत सारी प्राचीन मान्यताएं और परंपराएं विज्ञान ने बदलकर रख दी हैं। इसके बावजूद</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/the-power-of-science-fails-in-the-face-of-natural/article-3943"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="95" height="97"></img></p>
<h5><strong>संजय मग्गू </strong></h5>
<p>विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है। शरीर के भीतर छिपे वायरस को देखने और खोजने से लेकर अंतरिक्ष में ग्रहों और उपग्रहों की निगरानी करने तक में विज्ञान सक्षम है। अब तो हजारों किमी दूर बैठ डॉक्टर आपरेशन तक करता है। मोबाइल से दुनिया के किसी भी कोने में प्रियजन हों, उनसे बात करते हुए लाइव देखा जा सकता है। यह विज्ञान की ताकत है। विज्ञान ने पूरी दुनिया को बदलकर रख दिया है। आध्यात्मिक क्षेत्र में भी विज्ञान ने हस्तक्षेप किया है। बहुत सारी प्राचीन मान्यताएं और परंपराएं विज्ञान ने बदलकर रख दी हैं। इसके बावजूद विज्ञान अभी इतना शक्तिशाली नहीं हुआ है कि वह प्रकृति में होने वाली घटनाओं को रोक दे।</p>
<p>इसमें संदेह नहीं कि विज्ञान की वजह से मानव जीवन बहुत ही सरल हो गया है। लेकिन सच बात यह है कि वह अभी प्रकृति पर विजय पाने में सक्षम नहीं हुआ है। आज सेटेलाइट से तस्वीरें और वीडियो देखकर विज्ञान यह बता रहा है कि तिब्बत में ग्लेशियर फटने की घटना क्यों हुई? लेकिन यदि विज्ञान इतना सक्षम होता तो वह एक दिन पहले बता देता कि अमुक समय और अमुक दिन यहां का ग्लेशियर फटने वाला है। तो फिर सैकड़ों लोगों को अपनी जान से हाथ नहीं धोना पड़ता है। हजारों लोग नेपाल में आए सैलाब में लापता नहीं हुए होते। जिन घरों में आज मातम छाया हुआ है, उनके घरों में आज खुशियां मनाई जा रही होती।</p>
<p>विज्ञान ने यह तो बता दिया है कि तिब्बत में ग्लेशियर के टूटकर नीचे गिरने का कारण ग्लोबल वार्मिंग है। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग की वजह भी यही विज्ञान ही है। वैज्ञानिक और औद्योगिक प्रगति की वजह से दुनिया भर के भाग्य विधाताओं और उद्योगपतियों ने प्रकृति के स्वास्थ्य के बारे में सोचने की जरूरत ही नहीं समझी। जहां अपना फायदा दिखा, उन्होंने प्रकृति का भरपूर दोहन किया। दुनिया भर के समुद्रों को अपने स्वार्थ के लिए खंगाल डाला। नदियों को प्रदूषित कर दिया। पहाड़ों का सीना चीर कर बस्तियां बसाईं, लंबी-चौड़ी सड़कें बनाईं। धार्मिक स्थलों को पर्यटन स्थलों में बदला। पहाड़ और मैदान में सदियों से जो जंगल फलते-फूलते चले आ रहे थे, उन्हें नेस्तनाबूत भी हम इंसानों ने कर दिया। नतीजा क्या हुआ? नतीजा यह हुआ कि प्रकृति में असंतुलन पैदा हुआ।</p>
<p>ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या पैदा हुई। धरती का तापमान बढ़ा। नदियां और समुद्र कचरे के ढेर हो गए। ऐसी स्थिति में जल में रहने वाली न जाने कितनी प्रजातियां  दुनिया से ही विलुप्त हो गईं, हजारों प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं। हम इंसान विज्ञान की ताकत के बल पर चंद्रमा और मंगल ग्रह पर मानव बस्तियां बसाने का सपना देख रहे हैं। यह सपना पूरा होगा भी या नहीं, अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है। लेकिन जिस पृथ्वी पर मानव जीवन है, उस पृथ्वी को हमने अपने कर्मों से नरक बनाकर रख दिया है। यदि मंगल और चंद्रमा पर मानव बस्तियां बस भी गईं, तो इस बार की क्या गारंटी है कि इन ग्रहों और उपग्रहों को नरक नहीं बना देंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/the-power-of-science-fails-in-the-face-of-natural/article-3943</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/the-power-of-science-fails-in-the-face-of-natural/article-3943</guid>
                <pubDate>Mon, 31 Aug 2026 16:12:03 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg"                         length="90226"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>हिमालय की चेतावनी को समझिए, नहीं तो तबाही निश्चित: संजय मग्गू</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="92" height="94" /></p>
<h5><strong>संजय मग्गू</strong></h5>
<p>पहाड़ का अपना स्वभाव होता है। यदि उसके मामले में ज्यादा हस्तक्षेप किया जाए, तो वह उग्र रूप धारण कर लेता है। बुधवार को नेपाल की ओर बेहद ऊंचाई पर ल्हेंडे खोला नदी के उद्गम स्थल पर स्थित तिब्बत का सर्क ग्लेशियर का एक बहुत विशाल हिस्सा टूटकर चार हजार फीट नीचे घाटी में आ गिरा। इससे भोटकोशी नदी की सहायक ल्हेंडे खोला नदी का प्रवाह रुक गया। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह दुनिया के सामने है। बुधवार को ग्लेशियर टूटने से आई भीषण बाढ़ में नेपाल में 547 और तिब्बत में पांच लोगों की मौत हो</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/understand-the-warnings-of-the-himalayas-otherwise-destruction-is-certain/article-3864"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="92" height="94"></img></p>
<h5><strong>संजय मग्गू</strong></h5>
<p>पहाड़ का अपना स्वभाव होता है। यदि उसके मामले में ज्यादा हस्तक्षेप किया जाए, तो वह उग्र रूप धारण कर लेता है। बुधवार को नेपाल की ओर बेहद ऊंचाई पर ल्हेंडे खोला नदी के उद्गम स्थल पर स्थित तिब्बत का सर्क ग्लेशियर का एक बहुत विशाल हिस्सा टूटकर चार हजार फीट नीचे घाटी में आ गिरा। इससे भोटकोशी नदी की सहायक ल्हेंडे खोला नदी का प्रवाह रुक गया। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह दुनिया के सामने है। बुधवार को ग्लेशियर टूटने से आई भीषण बाढ़ में नेपाल में 547 और तिब्बत में पांच लोगों की मौत हो चुकी है। दोनों देशों में 1,000 से ज्यादा लोग अब भी लापता हैं। आज भी भोटकोशी नदी के ऊपरी हिस्से में बनी झील फट गई है। इस झील में शुक्रवार को 25 लाख क्यूबिक पानी जमा हो गया था।</p>
<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2026-08/hill.jpg" alt="hill" width="1280" height="720"></img></p>
<p>वैज्ञानिक इस तरह की घटनाओं को जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम से जोड़कर देख रहे हैं। नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ का कारण आइस रॉक एवलांच और ग्लेशियर का टूटना माना जा रहा है। पिछले तीन-चार दशक से हिमालय संकेतों से बार-बार अपना प्रतिरोध जता चुका है। उत्तराखंड के केदारनाथ में जून 2013 में हुई भयंकर तबाही हिमालय का एक सशक्त प्रतिरोध था। इस भयंकर तबाही के बावजूद भारत, तिब्बत और नेपाल आदि के भाग्य विधाताओं ने हिमालय के विरोध को समझने की जरूरत नहीं समझी। पिछले कुछ दशक से देशी और विदेशी वैज्ञानिक, पर्यावरणविद् यह कहते चले आ रहे हैं कि दुनिया भर की पर्वत शृंखलाओं में हिमालय की प्रकृति कुछ भिन्न है। वह अन्य पर्वतों जैसा नहीं है। पर्यावरणविदों ने कई बार चेतावनी दी है कि हिमालय क्षेत्र में लगातार बढ़ते हस्तक्षेप को सहन करने की स्थिति में हिमालय नहीं रह गया है। लगातार बढ़ती मानवीय गतिविधियों को हिमालय क्षेत्र बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। इन चेतावनियों के बावजूद हम नहीं संभले, हमारा हस्तक्षेप लगातार बढ़ता जा रहा है और उसी का नतीजा है कि 26 अगस्त को नेपाल को ग्लेशियर के एक बड़े हिस्से के टूटने से जन-धन की हानि सहनी पड़ी। हर साल बरसात के दिनों में देश के हिमालयी क्षेत्र में बार-बार बादल फटने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।</p>
<p>देहरादून स्थित वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान समेत तीन संस्थानों ने रिसर्च करके बताया है कि हिमालय की 221 झीलें ऐसी हैं जो किसी भी समय नेपाल से भी अधिक तबाही भारत में ला सकती हैं। सच कहा जाए, तो  जब से इंसानों ने पर्वतीय क्षेत्र में धार्मिक स्थलों को तीर्थाटन की जगह पर्यटन में बदलने का प्रयास करना शुरू कर दिया है, तभी से पर्वतीय क्षेत्रों में आपदाएं बढ़ी हैं। हिमालय की पहाड़ियों को काटकर चौड़ी-चौड़ी सड़कें बनाना, पेड़ों को काट करके पहाड़ों को नंगा कर देना, डायनामाइट लगाकर पहाड़ियों में विस्फोट करना, घातक साबित होता जा रहा है। इससे पर्वत भी गर्म हो रहे हैं। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने से पहाड़ों पर बने ग्लेशियर पिघल रहे हैं। बुधवार को नेपाल में मची तबाही के पीछे भी ग्लोबल वार्मिंग ही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/understand-the-warnings-of-the-himalayas-otherwise-destruction-is-certain/article-3864</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/understand-the-warnings-of-the-himalayas-otherwise-destruction-is-certain/article-3864</guid>
                <pubDate>Sat, 29 Aug 2026 14:40:00 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg"                         length="90226"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जेन जेड को समझना होगा, रातोंरात नहीं बदलता सिस्टम: संजय मग्गू</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="103" height="105" /></p>
<h6><strong>  संजय मग्गू</strong></h6>
<p>मुझे भारत की सबसे प्रसिद्ध फिल्म ‘शोले’ का एक डॉयलाग याद आ रहा है। फिल्म में गब्बर सिंह कहता है कि पचास-पचास कोस की दूर किसी गांव में जब कोई बच्चा रोता है, तो मां कहती है, बेटा चुप हो जा, नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा। आज जेन जेड की हालत यही है। वह गब्बर सिंह की तरह सरकार को डरा रहा है, राजनीतिक दलों के दिलों की धड़कन बढ़ा रहा है। आज की तारीख में हालत यह है कि केंद्र और राज्यों की सरकारें जेन जेड का नाम से कांप रही हैं।  अब तो जेन अल्फा</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/gen-z-has-to-understand-that-the-system-does-not/article-3489"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="103" height="105"></img></p>
<h6><strong> संजय मग्गू</strong></h6>
<p>मुझे भारत की सबसे प्रसिद्ध फिल्म ‘शोले’ का एक डॉयलाग याद आ रहा है। फिल्म में गब्बर सिंह कहता है कि पचास-पचास कोस की दूर किसी गांव में जब कोई बच्चा रोता है, तो मां कहती है, बेटा चुप हो जा, नहीं तो गब्बर सिंह आ जाएगा। आज जेन जेड की हालत यही है। वह गब्बर सिंह की तरह सरकार को डरा रहा है, राजनीतिक दलों के दिलों की धड़कन बढ़ा रहा है। आज की तारीख में हालत यह है कि केंद्र और राज्यों की सरकारें जेन जेड का नाम से कांप रही हैं।  अब तो जेन अल्फा भी अपना रंग दिखा रहे हैं। जेन जेड और जेन अल्फा ने पिछले दो महीनों में जो आतंक कायम किया है, उतना आतंक तो गब्बर सिंह का भी रामगढ़ वालों पर नहीं था। मीडिया हो या सोशल मीडिया, जेन जेड के कसीदे काढ़ने में लगा हुआ है। लिखा जा रहा है कि जेन जेड ने जो कमाल कर दिखाया है, वह पिछले बारह सालों में कोई नहीं कर पाया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आधी रात को इंस्टाग्राम पर जेन जेड से बात करने को मजबूर हो गए हैं। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को भी मजबूर होकर जेन जेड को देशभक्त और सबसे ईमानदार बताना पड़ रहा है, तो इसके पीछे यही डर है कि कहीं जेन जेड फिर न उठकर खड़ा हो जाए। कांग्रेस तो काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन से पहले ही जेन जेड को लुभाना शुरू कर दिया था। जब सीजेपी का आंदोलन सफल हुआ, तो हर दल जेन जेड को दुलराने में लग गया।</p>
<p>क्या सत्ताधारी और क्या विपक्ष, सबका एक ही ध्येय बन गया है कि अधिक से अधिक जेन जेड और भावी मतदाता जेन अल्फा को अपने पक्ष में किया जाए। एलओपी राहुल गांधी इस मामले में फिलहाल सबसे ज्यादा सक्रिय दिखाई पड़ रहे हैं। वह सिस्टम में सुधार लाने की बात कहते हुए सरकार से इसकी मांग कर रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिस्टम बदलना इतना आसान है? राहुल गांधी और जेन जेड के कह देने भर से या केंद्र और राज्य सरकारों के इच्छा मात्र से सिस्टम बदल जाएगा? क्या शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही आ जाएगी। नहीं, यह कोई बच्चों का खेल नहीं है। यह जेन जेड का धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांगना जैसा नहीं है।</p>
<p>सिस्टम कोई एक दिन में नहीं बनता है। दशकों लगते हैं, तब कहीं जाकर कोई सिस्टम खड़ा हो पाता है, वह भी देश को संचालित करने जैसा सिस्टम। इसमें सुधार या बदलाव भी करिश्माई अंदाज में रातोंरात नहीं होने वाला है। जेन जेड में जो अधीरता पिछले कुछ दिनों से देखी जा रही है, वह कई बार डराती है। जब कोई आंदोलन हीरोइज्म का शिकार हो जाता है, तो उसमें कई तरह की विसंगतियां पैदा होने लगती हैं। युवाओं का असंतोष, आक्रोश और जवाबदेही की मांग करना जायज है। लेकिन जेन जेड को किसी भय का प्रतीक मत बनाइए। उनके जायज कामों की सराहना कीजिए, लेकिन यदि वह गलत करते हैं, तो उनकी आलोचना करने से भी मत हिचकिए। उन्हें सामान्य युवा रहने दीजिए, रॉबिनहुड मत बनाइए। नहीं तो वह अपने जायज मुद्दों से भटक जाएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/gen-z-has-to-understand-that-the-system-does-not/article-3489</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/gen-z-has-to-understand-that-the-system-does-not/article-3489</guid>
                <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 13:57:14 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg"                         length="90226"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अपने सपनों को भविष्य पर नहीं टालना चाहता जेन जी: संजय मग्गू</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="102" height="104" /></p>
<h6><strong>संजय मग्गू</strong></h6>
<p>वैसे तो सपने सभी देखते हैं। हमारी पीढ़ी के भी सपने थे। हमसे पूर्व की पीढ़ी के भी कुछ न कुछ सपने जरूर रहे होंगे। हमारी अगली पीढ़ी के भी कुछ सपने हैं। हर पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से अलग हटकर सपने देखती है और उसे पूरा करने का प्रयास करती है। जेन जी के भी सपने हैं। हमारी पीढ़ी और जेन जी पीढ़ी के बीच मौलिक अंतर यह है कि यह पीढ़ी तकनीकी क्रांति के दौरान पैदा हुई है। इसके सामने सूचनाओं का अथाह भंडार है। सूचनाओं का विस्फोट हर क्षण होता रहता है, इस वजह से</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/gen-z-doesnt-want-to-postpone-his-dreams-to-the-future/article-3488"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="102" height="104"></img></p>
<h6><strong>संजय मग्गू</strong></h6>
<p>वैसे तो सपने सभी देखते हैं। हमारी पीढ़ी के भी सपने थे। हमसे पूर्व की पीढ़ी के भी कुछ न कुछ सपने जरूर रहे होंगे। हमारी अगली पीढ़ी के भी कुछ सपने हैं। हर पीढ़ी अपनी पूर्ववर्ती पीढ़ी से अलग हटकर सपने देखती है और उसे पूरा करने का प्रयास करती है। जेन जी के भी सपने हैं। हमारी पीढ़ी और जेन जी पीढ़ी के बीच मौलिक अंतर यह है कि यह पीढ़ी तकनीकी क्रांति के दौरान पैदा हुई है। इसके सामने सूचनाओं का अथाह भंडार है। सूचनाओं का विस्फोट हर क्षण होता रहता है, इस वजह से यह पीढ़ी हमारी पीढ़ी से कहीं ज्यादा सजग है, नई-नई जानकारियों से लैस है। इस पीढ़ी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह अपने शहर, राज्य या देश पर ही नजर नहीं रखती है। यह पूरी दुनिया पर नजर रखती है। दुनिया में कहीं भी होने वाली घटना के बारे में यदि जानने की जरूरत हुई, तो वह पूरी जानकारी हासिल करती है। आधी अधूरी जानकारी रखना उसे पसंद नहीं है। यही वजह है कि वह पूरे दम खम और आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखती है। वह अपनी तुलना दूसरे देशों के युवाओं से करते हैं। मुझे कितनी स्वतंत्रता प्राप्त है, रोजगार, नौकरी, शिक्षा, चिकित्सा सुविधा हमें कितनी हासिल है और दुनिया के अन्य देशों में युवाओं को कितनी हासिल है। यह सब कुछ जानते हैं। यह तुलना ही उन्हें अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग बनाती है।</p>
<p>ज्ञान, जानकारी और ऊर्जा का समागम उन्हें गति प्रदान करता है। वह अपने पीछे रह गए लोगों के इंतजार में अपना समय बरबाद नहीं करते हैं। जो व्यक्ति, विचारधारा, राजनीतिक दल उनके मकसद में सहायक नहीं लगता है, वह उसको छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं। जेन जी के सामने दिक्कत यह है कि उसने कांग्रेस का शासनकाल नहीं देखा है। पढ़ा-सुना जरूर है, लेकिन व्यक्तिगत अनुभव उसे केवल भाजपा के शासनकाल का ही है। अगर वह दो शासनकाल की तुलना करना चाहे, तो उसके सामने केवल भाजपा का ही शासनकाल है। ऐसी स्थिति में अच्छा या बुरा जो भी आकलन करना है, वह भाजपा के ही संदर्भ में करेगा। वैसे तो इन दिनों देश का हर राजनीतिक दल जेन जी को अपने पाले में लाने को लालायित है। लेकिन उनकी आकांक्षाओं को समझने को कोई भी तैयार नहीं है। यह जेन जी परिश्रम करने से नहीं कतराती है। लेकिन भरपूर परिश्रम करने के बाद यदि बार-बार पेपरलीक होगा, शिक्षा व्यवस्था में तमाम तरह की खामियां ही खामियां दिखेंगी, तो वह इसे बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। वह अपने परिश्रम का फल चाहता है। वह गीता के कर्मफल का सिद्धांत नहीं मानता है। जब कर्म वह करेगा, तो फल हासिल करने का हक भी उसे ही है। वह बेचैन है, उसकी बेचैनी सपनों की पूर्ति में लगने वाले समय की वजह से है। वह अपने सपनों को जल्द से जल्द पूरा करना चाहता है। वह सपनों को टालने के पक्ष में कतई नहीं है। यही वजह है कि हमारी पीढ़ी के लोगों को जेन जेड उतावले लगते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/gen-z-doesnt-want-to-postpone-his-dreams-to-the-future/article-3488</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/gen-z-doesnt-want-to-postpone-his-dreams-to-the-future/article-3488</guid>
                <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 13:52:07 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg"                         length="90226"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बुजुर्गों से संस्कृति, इतिहास सीख सकते हैं युवा: संजय मग्गू</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="105" height="107" /></p>
<h6><strong>  संजय मग्गू</strong></h6>
<p>एक पुरानी कहावत है कि बनिये को मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है। यह कहावत दादा-दादी और पौत्र-पौत्रियों पर भी लागू होती है। बुजुर्गों में अकसर यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। यह मानव स्वभाव है। इसमें उत्तर-दक्षिण या पूरब-पश्चिम का भेद नहीं होता है। यह प्रवृत्ति हरियाणा में पाई जाती है, तो केरल के शहरों और गांवों में भी मिलेगी। इसको इस बात से भी समझा जा सकता है कि हर पीढ़ी अपनी पिछली और अगली पीढ़ी से वैचारिक और व्यावहारिक साम्यता नहीं रख पाती है। माता-पिता और पुत्र-पुत्री में संकोच, मत वैभिन्य, आदर जैसे तमाम</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/young-sanjay-maggu-can-learn-cultural-history-from-elders/article-3414"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="105" height="107"></img></p>
<h6><strong> संजय मग्गू</strong></h6>
<p>एक पुरानी कहावत है कि बनिये को मूल से ज्यादा ब्याज प्यारा होता है। यह कहावत दादा-दादी और पौत्र-पौत्रियों पर भी लागू होती है। बुजुर्गों में अकसर यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है। यह मानव स्वभाव है। इसमें उत्तर-दक्षिण या पूरब-पश्चिम का भेद नहीं होता है। यह प्रवृत्ति हरियाणा में पाई जाती है, तो केरल के शहरों और गांवों में भी मिलेगी। इसको इस बात से भी समझा जा सकता है कि हर पीढ़ी अपनी पिछली और अगली पीढ़ी से वैचारिक और व्यावहारिक साम्यता नहीं रख पाती है। माता-पिता और पुत्र-पुत्री में संकोच, मत वैभिन्य, आदर जैसे तमाम भाव सहज व्यवहार में बाधा बनते हैं। जनरेशन गैप के कारण व्यवहार में सहजता नहीं आ पाती है। संयुक्त परिवार में यह संबंध आसानी से परिलक्षित होता था, लेकिन एकल परिवार ने जहां माता-पिता और पुत्र-पुत्री के बीच प्रेमभाव और निकटता में दरार डाली है, तो पहली और तीसरी पीढ़ी के बीच भी संबंध बनने से रोक दिया है। नतीजा यह हो रहा है कि अब शहरों में वृद्धाश्रम की बढ़ती संख्या संबंधों में आई दरार को पूरी तरह प्रकट करती है। सच कहें, तो वृद्धाश्रम किसी भी बुजुर्ग के लिए अपने जीवन की सांध्य बेला में आश्रय स्थल ही नहीं, उनकी विवशता का प्रतीक है।</p>
<p>जब बुजुर्ग को अपने परिवार को सहारे की जरूरत होती है, इंद्रियां शिथिल होती है, ऐसी स्थिति में किसी बुजुर्ग को अपने परिवार से दूर रहने की पीड़ा झेलनी पड़े, तो वह कैसा महसूस करेगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। हर वृद्धाश्रम बुजुर्गों की विवशता का लहराता परचम है। ऐसी स्थिति में यदि देश के युवा चाहें तो इन बुजुर्गों की पीड़ा को कम कर सकते हैं। उन्हें इस बात को याद रखना होगा कि आज वह युवा हैं, ताकत है, जोश है, संकल्प है, ईमानदार प्रयास भी है। आज के बुजुर्ग भी किसी समय युवा थे। इन्होंने तो सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन ऐसा आएगा जब उनके ही परिजन उनसे पीछा छुड़ाकर उन्हें वृद्धाश्रम की राह दिखा देंगे। जो व्यवहार आज बुजुर्गों के साथ हो रहा है, कल आज के युवाओं के साथ नहीं होगा, इसकी क्या गारंटी है। यदि हो सके, तो युवाओं को अपने घर और वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गों के साथ कुछ समय बिताएं। वह इन बुजुर्गों से उनके जीवन भर में संचित अनुभवों को ग्रहण कर सकते हैं।</p>
<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2026-08/old-person.jpeg" alt="old person" width="1280" height="719"></img></p>
<p>बुजुर्ग अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में भी युवाओं के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकते हैं। अपने समय की संस्कृति, इतिहास, सभ्यता और उनके जीवन में आए बदलाव के कारणों पर जो प्रकाश डाल सकते हैं, वह किसी लाइब्रेरी की पुस्तकों में नहीं मिलेगा। बुजुर्गों के पास जो कुछ मिलेगा, वह खुद का भोगा हुआ यथार्थ, आंखों देखा हुआ बदलाव और गढ़ा गया इतिहास होगा। यदि युवाओं को इन सबकी जरूरत नहीं है, तो भी उन्हें बुजुर्गों के साथ कुछ समय जरूर व्यतीत करना चाहिए ताकि उन्हें अपने जीवन के अंतिम काल में यह महसूस हो सके कि कोई तो है जो उनके लिए चिंतित है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/young-sanjay-maggu-can-learn-cultural-history-from-elders/article-3414</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/young-sanjay-maggu-can-learn-cultural-history-from-elders/article-3414</guid>
                <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 13:51:22 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg"                         length="90226"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आनंद तो चहुंओर बिखरा पड़ा है, महसूस तो करो : संजय मग्गू</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="91" height="92" /></p>
<h6><strong>संजय मग्गू</strong></h6>
<p>महात्मा बुद्ध ने विक्षिप्त पट्टाचारा से भी तो यही कहा-मरण एक अविचल सत्य है, उससे बचा नहीं जा सकता है। कोई कितना ही दुखी क्यों न हो, मरण नहीं रुकता है। सो, कौन किसके लिए शोक करे। पट्टाचारा ने अपने घर से भागकर किशोरावस्था में पड़ोस में रहने वाले अपने प्रेमी के साथ विवाह किया था। पितृगृह को त्यागकर दूसरे शहर में गृहस्थी बसाई थी। चार साल में वह दो बच्चे की मां बनी थी। जब वह दूसरे बच्चे को जन्म देने वाली थी, तो वह अपने पति और दो साल के बेटे के साथ पितृगृह जा रही</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/happiness-is-scattered-everywhere-feel-it-sanjay-maggu/article-3397"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="91" height="92"></img></p>
<h6><strong>संजय मग्गू</strong></h6>
<p>महात्मा बुद्ध ने विक्षिप्त पट्टाचारा से भी तो यही कहा-मरण एक अविचल सत्य है, उससे बचा नहीं जा सकता है। कोई कितना ही दुखी क्यों न हो, मरण नहीं रुकता है। सो, कौन किसके लिए शोक करे। पट्टाचारा ने अपने घर से भागकर किशोरावस्था में पड़ोस में रहने वाले अपने प्रेमी के साथ विवाह किया था। पितृगृह को त्यागकर दूसरे शहर में गृहस्थी बसाई थी। चार साल में वह दो बच्चे की मां बनी थी। जब वह दूसरे बच्चे को जन्म देने वाली थी, तो वह अपने पति और दो साल के बेटे के साथ पितृगृह जा रही थी। रास्ते में ही प्रसव पीड़ा हुई और दूसरे पुत्र को जन्म दिया। आग जलाने के लिए लकड़ी लाने गए पति को सर्प ने डस लिया जिससे उसकी मौत हो गई थी। नवजात शिशु को सियार उठा ले गया और पहला बेटा नदी  में बह गया। एक ही घंटे में पति और दोनों पुत्र की मौत से पागल हो उठी थी पट्टाचारा। रोती-बिलखती पगलाई सी अपने पिता के घर पहुंची, तो पता चला कि माता-पिता की मौत हो चुकी है। जिस दिन वह अपने पिता के यहां पहुंची थी, उसके इकलौते भाई की मौत भी उसी दिन हुई थी। सास-ससुर भी बूढ़े हो चुके थे। नतीजा यह हुआ कि वह पागलों की तरह इधर उधर घूमने लगी। एक दिन महात्मा बुद्ध नगर में पधारे, तो कुछ लोगों ने पट्टाचारा को बुद्ध के सामने प्रस्तुत कर दिया। तथागत ने उसके शोक को समझा और उसे जीवन मरण, शोक-आनंद के बारे में बताया। उसका शोक खत्म हुआ, तो वह भिक्षुणी बन गई। हम सबकी हालत भी पट्टाचारा से अलग नहीं है। हमें जीवन में जब जब शोक मिला, दुख-तकलीफ मिली, उसका पूरा इतिहास हमारे पास मौजूद है। एक एक घटनाएं याद हैं, लेकिन आनंद में हम कब रहे, यह कतई याद नहीं है। हमारे मित्र ने हमें कब और क्या कड़वी बात कही थी, उसका एक-एक वाक्य, एक एक भंगिमा तक याद है। पति या पत्नी ने कब अवहेलना की थी, माता-पिता ने कब डांटा था, किस बात के लिए डांटा था, भले ही कई साल बीत गए हों, लेकिन पूरा वाकया ज्यों का त्यों याद है। विचारकों का कहना है कि इंसान हमेशा आनंद को खोजता है। वह आनंद खोजी है। लेकिन वास्तविक जीवन में इसके प्रमाण कतई नहीं मिलते हैं। ओशो कहते हैं कि यदि इंसान आनंद को खोजता फिरता, तो जीवन में आनंद की कुछ झलक तो होती। यदि आनंद किसी के पास होता, तो वह उसी तरह लोगों में बांटता फिरता जिस प्रकार अपने दुखों को बांटता फिरता है। आदमी अपने दुख तो दूसरों को बताकर अपने दिल को हलका कर लेता है, लेकिन सुख या आनंद के क्षणों को अकेले ही जीने की कोशिश करता है। आनंद में वह किसी को सहभागी नहीं बनाना चाहता है। आनंद तो बांटने की चीज है। ताकि दूसरे लोग भी हमारे आनंद से आनंदित हों। इंसान यह भूल चुका है कि आनंद तो प्रकृति में चारों ओर बिखरा पड़ा है। हवा की स्वर लहरियों में, पानी की कल-कल ध्वनि में, पक्षियों के कलरव में, पर्वतों के मौन में, समुद्र की गहराइयों में। बस, उसे महसूस करने की जरूरता है। उसे अपने में समाहित करने की कला आनी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/happiness-is-scattered-everywhere-feel-it-sanjay-maggu/article-3397</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/happiness-is-scattered-everywhere-feel-it-sanjay-maggu/article-3397</guid>
                <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 17:21:25 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg"                         length="90226"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अपने ही बुने जाल-जंजाल में उलझता जा रहा है इंसान: संजय मग्गू</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="106" height="108" /></p>
<p><strong>संजय मग्गू</strong></p>
<p>मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या उसके मन के भीतर छिपी बैठी अशांति है। इंसान कभी संतुष्ट नहीं होता है। उसके पास जितना है, उससे अधिक की लालसा में वह सदैव लगा रहता है। एक कमरे का मकान है, तो वह हर समय इसी जुगत में रहता है कि किसी तरह दो कमरे का मकान हो जाए। ज्यादा से ज्यादा धन, अधिक से अधिक शक्ति, सत्ता, ज्ञान के साथ ही साथ अधिकतम सुरक्षा उसके डीएनए में है। नृविज्ञानी यह बात साबित कर चुके हैं कि इंसान का विकास वानर से हुआ है। नर से वानर बनने की प्रक्रिया में</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/man-sanjay-maggu-is-getting-entangled-in-his-own-web/article-3324"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg" alt="sanjay-maggu" width="106" height="108"></img></p>
<p><strong>संजय मग्गू</strong></p>
<p>मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या उसके मन के भीतर छिपी बैठी अशांति है। इंसान कभी संतुष्ट नहीं होता है। उसके पास जितना है, उससे अधिक की लालसा में वह सदैव लगा रहता है। एक कमरे का मकान है, तो वह हर समय इसी जुगत में रहता है कि किसी तरह दो कमरे का मकान हो जाए। ज्यादा से ज्यादा धन, अधिक से अधिक शक्ति, सत्ता, ज्ञान के साथ ही साथ अधिकतम सुरक्षा उसके डीएनए में है। नृविज्ञानी यह बात साबित कर चुके हैं कि इंसान का विकास वानर से हुआ है। नर से वानर बनने की प्रक्रिया में बहुत सारे बदलाव आए। विभिन्न काल और परिस्थितियों में रहते-रहते उसके डीएनए में भी बदलाव आया। लेकिन एक चीज नहीं बदली, स्वयं के प्रति असंतोष। यदि संतोष ही होता, तो वह वानर से नर बनने की प्रक्रिया में पड़ता ही क्यों? इस प्रक्रिया के चलते उसने सीमाओं का अतिक्रमण किया। सीमाओं के अतिक्रमण के पीछे इंसान की अनंत इच्छाएं हैं। यह इच्छाएं ही हैं, जो उसे बार-बार  उकसाती हैं सीमाओं का अतिक्रमण करने को। वह हर समय किसी और की तरह बनने की होड़ में लगा रहता है। इसकी वजह से उसके मन में ईर्ष्या का जन्म होता है। ईर्ष्या उसे चैन से बैठने नहीं देती है। वहीं पर्वत हमेशा चैन से रहते हैं। वह किसी दूसरे की तरह नहीं होना चाहते हैं।</p>
<p>पर्वत का सबसे बड़ा गुण है धैर्य। वह करोड़ों साल से अचल, अविरल और गंभीर बने खड़े हैं। उनमें यह कतई लालसा नहीं है कि वह समुद्र जैसा बनें, मैदान जैसा बनें। वह पर्वत हैं, तो पर्वत ही बने रहना चाहते हैं। समुद्र की महानता उसकी गहराई में निहित है। उसकी गहराई को उठने वाली लहरें, ज्वार-भाटा भले ही थोड़ी देर के लिए चंचल कर देती हों, लेकिन वह अपनी गहराई को नहीं छोड़ता है। वह अपनी गहराई को कतई नहीं त्यागता है। उसके आगोश में जीव-जंतु आते हैं, ईंट-पत्थर आते हैं, इंसान द्वारा नदियों में फेंका गया कचरा आता है, इससे उसको कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह सबका समान रूप से स्वागत करता है। यही उसकी खूबी है। पर्वत और समुद्र अपने-अपने स्वभाव नहीं छोड़ते हैं। वह अपनी तुलना भी किसी से नहीं करते हैं। जैसे हैं, वैसे ही बने रहने में उनको खुशी मिलती है। लेकिन अपनी तुलना किसी दूसरे व्यक्ति से किए बिना जी ही नहीं सकता है।</p>
<p>इंसान अपने से ज्यादा किसी धनी को देखता है, तो वह दुनिया का सबसे धनी होना चाहता है। सबसे ज्यादा शक्तिशाली और प्रभावशाली होना चाहता है। यही चाहत इंसान को संघर्ष में ढकेलने के लिए पर्याप्त है। जब इंसान वानर से नर बना, तो उसके सामने दो तरह के संघर्ष खड़े हो गए। एक प्रकृति से उसका संघर्ष और दूसरा उसके द्वारा बनाए गए वर्गीय मानव समाज में दूसरे मानव से संघर्ष। इस दोहरे संघर्ष का नतीजा यह हुआ कि उसने जहां प्रकृति को बदल दिया, वहीं उसने वर्गीय मानव समाज में भी विभाजन के बीज बो दिए। अब इंसान अपने ही पैदा किए गए जाल-जंजाल में उलझता चला जा रहा है। इस जाल-जंजाल से मुक्ति का कोई मार्ग उसे सूझ नहीं  नहीं रहा है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/man-sanjay-maggu-is-getting-entangled-in-his-own-web/article-3324</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/man-sanjay-maggu-is-getting-entangled-in-his-own-web/article-3324</guid>
                <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 13:16:36 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2025-09/sanjay-maggu.jpeg"                         length="90226"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कांग्रेस ने थोड़ी  सी चूक किए कराए पर फेर सकती है पानी: संजय मग्गू</title>
                                    <description><![CDATA[<p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2026-07/img-20260726-wa0005.jpg" alt="IMG-20260726-WA0005" width="93" height="95" /></p>
<p><strong>    संजय मग्गू</strong></p>
<p>कांग्रेस ने अब रणनीति बनाकर उस पर अमल करना सीख लिया है। वैसे तो जंतर-मंतर पर चल रहा धरना-प्रदर्शन खत्म हो गया है। सारे युवा अपने-अपने घर पहुंच चुके हैं, लेकिन कांग्रेस ने पेपरलीक और छात्रों के मुद्दे को खत्म नहीं माना है। यही वजह है कि वह अब युवाओं की लड़ाई संसद में लड़ रही है। पैलेट गन के मुद्दे को लेकर कांग्रेस संसद में अड़ी हुई है और सीधे गृहमंत्री अमित शाह का इस्तीफा मांग रही है। इससे कांग्रेस देश के युवाओं को यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि वह युवाओं के साथ है।</p>...]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.deshrojana.com/top-news/congress-made-some-mistakes-but-can-turn-things-around-sanjay/article-3267"><img src="https://www.deshrojana.com/media/400/2026-07/img-20260726-wa0005.jpg" alt=""></a><br /><p><img src="https://www.deshrojana.com/media/2026-07/img-20260726-wa0005.jpg" alt="IMG-20260726-WA0005" width="93" height="95"></img></p>
<p><strong>  संजय मग्गू</strong></p>
<p>कांग्रेस ने अब रणनीति बनाकर उस पर अमल करना सीख लिया है। वैसे तो जंतर-मंतर पर चल रहा धरना-प्रदर्शन खत्म हो गया है। सारे युवा अपने-अपने घर पहुंच चुके हैं, लेकिन कांग्रेस ने पेपरलीक और छात्रों के मुद्दे को खत्म नहीं माना है। यही वजह है कि वह अब युवाओं की लड़ाई संसद में लड़ रही है। पैलेट गन के मुद्दे को लेकर कांग्रेस संसद में अड़ी हुई है और सीधे गृहमंत्री अमित शाह का इस्तीफा मांग रही है। इससे कांग्रेस देश के युवाओं को यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि वह युवाओं के साथ है। वह उनकी लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक लड़ रही है। अब सवाल यह है कि कांग्रेस यह लड़ाई कब तक लड़ेगी?</p>
<p>यदि कांग्रेस संसद सत्र तक ही युवाओं के मुद्दे को जिंदा रखती है, तो उसका लाभ कांग्रेस को बहुत सीमित मिल सकता है। लेकिन अगर वह संसद सत्र खत्म होने के बाद शिक्षा, रोजगार, पारदर्शिता और जवाबदेही जैसे मुद्दों को अपने एजेंडे में शामिल कर लेती है और इन मुद्दों को लेकर सड़क पर उतर जाती है, तो निश्चित रूप से कांग्रेस को फायदा होने वाला है। यह बात तो सभी जानते हैं कि देश के युवा जिस दल के समर्थन में होंगे, उस दल को सरकार बनाने कोई परेशानी नहीं होगी। पेपरलीक का मुद्दा सामने आने के बाद ही कांग्रेस ने अपने से युवाओं को जोड़ने के लिए ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम की शुरुआत की।</p>
<p>राहुल गांधी ने इस काम में बैकडोर से एनएसयूआई को लगाया। कोटा और देहरादून में पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को मंच से दूर रखकर केवल युवाओं की बात की। उनके ही मुद्दे उठाए। इसी बीच सीजेपी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपना विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया। कांग्रेस ने सीजेपी के मंच पर जाने से परहेज किया। वह नहीं चाहती थी कि छात्रों के आंदोलन को किसी सियासी दल का मुखौटा कहकर भाजपा को घेरने का मौका किया जाए। यदि सीजेपी के आंदोलन से शुरुआती दिनों में कांग्रेस जुड़ जाती तो छात्राओं का आंदोलन इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाता और अन्य आंदोलनों की तरह फुसफुसा जाता।</p>
<p>संसद मार्च के दौरान जैसे ही युवाओं पर लाठीचार्ज, पैलेट गन और आंसूगैस के गोले के इस्तेमाल  की खबर आई, कांग्रेस अपने सांसदों के साथ पीएम हाउस घेरने निकल पड़ी। बस, यही वह टर्निंग प्वाइंट था जिसने कांग्रेस को युवाओं के मुद्दे पर फ्रंट में ला दिया।</p>
<p>कांग्रेस को यह समझ में आ गया कि जितना जरूरी सड़क पर लड़ना है, उतना ही महत्वपूर्ण युवाओं के मुद्दे पर संसद में लड़ते हुए दिखना है। सो, कांग्रेस राहुल गांधी के नेतृत्व में पिछले कुछ दिनों से संसद में युवाओं के मुद्दे पर लड़ती हुई दिखाई दे रही है। अब यह कांग्रेस पर निर्भर करता है कि वह ‘छात्रों की गूंज’ को आगे बढ़ाते हैं या फिर ‘इति कर्तव्यम’ मानकर यहीं छोड़ देते हैं। यदि कांग्रेस इस मुद्दे को यहीं छोड़ देती है, तो बहुत बड़ी गलती करेगी। सभी जानते हैं कि भाजपा पिछले तीन बार लोकसभा चुनाव में युवाओं की ही अंगुली पकड़कर सत्ता में आई है। हालांकि 2024 में भाजपा की पकड़ युवाओं पर थोड़ी ढीली पड़ती थी। अब तो भाजपा के हाथ से युवाओं की बागडोर निकलती हुई दिखाई दे रही है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>टॉप न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.deshrojana.com/top-news/congress-made-some-mistakes-but-can-turn-things-around-sanjay/article-3267</link>
                <guid>https://www.deshrojana.com/top-news/congress-made-some-mistakes-but-can-turn-things-around-sanjay/article-3267</guid>
                <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 15:30:46 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.deshrojana.com/media/2026-07/img-20260726-wa0005.jpg"                         length="33012"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[NELOFER HASHMI]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        