पशु से खेती बचाने में दम तोड़ रहे ‘हलकू’

उत्तर प्रदेश, हरियाणा के साथ कुछ अन्य राज्यों में पशुओं से फसल की सुरक्षा के लिए खेतों में मचान या झोपड़ी बनाकर रहने वाले किसानों को पाले के चलते अपनी जान गंवानी पड़ रही है।

Created By : ashok on :18-01-2023 15:51:40 संजय मग्गू खबर सुनें


संजय मग्गू


इन दिनों उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में रात में पाला गिर रहा है। रात का तापमान माइनस में चला गया है। ऐसे में बिना कोई मुकम्मल व्यवस्था किए घर के बाहर रात बिताना जानलेवा साबित हो सकता है, यह चिकित्सक काफी पहले से कहते चले आ रहे हैं। उत्तर प्रदेश, हरियाणा के साथ कुछ अन्य राज्यों में पशुओं से फसल की सुरक्षा के लिए खेतों में मचान या झोपड़ी बनाकर रहने वाले किसानों को पाले के चलते अपनी जान गंवानी पड़ रही है।

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उत्तर प्रदेश में अब तक काफी संख्या में लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। इसका कारण उत्तर भारत खासकर उत्तर प्रदेश में छुट्टा पशु हैं। 2019 में की गई पशुगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में 11.8 लाख छुट्टा पशु हैं। प्रदेश सरकार का दावा है कि उनके यहां 6,723 गौशालाएं हैं जिनमें करीब 9.58 लाख छुट्टा पशुओं को संरक्षित किया गया है। एक लाख 54 हजार छुट्टा पशुओं को मुख्यमंत्री निराश्रित/बेसहारा गोवंश सहभागिता योजना के तहत लोगों को सौंपा गया है जिन्हें 30 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से सरकार भुगतान भी करती है। मध्य प्रदेश और राजस्थान सरकार ने भी छुट्टा पशुओं के संबंध में कई योजनाएं चला रखी हैं।

छत्तीसगढ़ में तो सरकार ने गोबर और गाय का मूत्र खरीदने की योजना चला रखी है। यह समस्या कोई नई नहीं है। जिन लोगों ने कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी ‘पूस की रात’ को पढ़ा होगा, वह समझ सकता है कि छुट्टा पशुओं से जाड़े की रात में फसल को बचाना कितना कठिन होता है। प्रकृति और अपनी दुरावस्था से लड़कर एक छोटा किसान अपने फसल की रक्षा इन छुट्टा पशुओं से करता है।

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प्रेमचंद की कहानी का पात्र हलकू और उसका कुत्ता झबरा दोनों फसल की रखवाली के लिए खेत में रहते हैं। छुट्टा पशु जब हलकू की फसल चरने लगते हैं, तो झबरा भौंकता है, लेकिन हलकू नहीं उठता है और अगले दिन खेती-किसानी छोड़कर मजदूरी करने का फैसला करता है। यह समस्या छोटी जोत के किसानों के लिए मुसीबत बनता जा रहा है। जिन भी प्रदेशों में छोटी जोत के किसान हैं और छुट्टा पशुओं के संरक्षण की मुकम्मल व्यवस्था नहीं है,

उन प्रदेशों के किसान छुट्टा पशुओं से परेशान हैं। देश की अधिसंख्य गांवों में लगभग सत्तर फीसदी छोटे किसान रहते हैं। इन किसानों की आय बहुत कम होती है। ये अपने खेत के चारों ओर बाड़ भी नहीं लगा पाते हैं। इधर कुछ सालों से कई राज्यों में पशु मेले भी लगने बंद हो गए हैं। असल में इन पशु मेलों में बिकने वाले नर पशुओं को बूचरखानों के एजेंट खरीद कर वहां पहुंचा देते थे। लेकिन जब से विभिन्न राज्यों में अवैध बूचरखानों को बंद कर दिया गया है। इसकी वजह से लोगों ने नर पशुओं और बूढ़ी गाय-भैसों को छुट्टा छोड़ना शुरू कर दिया है। जिंदगी भर अपने दूध से लोगों की सेवा करने वाले पशु जब उम्रदराज हो जाते हैं, तो लोग इनसे छुटकारा पा लेने में ही भलाई समझते हैं। यह लोगों की गलत प्रवृत्ति है। इसका खामियाजा छोटे किसानों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है।

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