हैवानियत की सारी हदें पार करता `इंसान`

किसी पशु या उसके द्वारा की जा रही हैवानियत की मिसाल देना इसलिए भी बेमानी है क्योंकि किसी पशु द्वारा अपने स्वभावानुसार पशुता दिखाना या किसी जानवर द्वारा अपना पाशविक स्वभाव या पशुवृत्ति दर्शाना उसकी मनोवृत्ति में शामिल है।

Created By : Manuj on :24-11-2022 11:07:14 निर्मल रानी खबर सुनें
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निर्मल रानी

हैवानियत की सारी हदें पार करता 'इंसान'


क्रूरता की जब कभी बात होती है तो लोग 'जानवरों' जैसे व्यवहार की मिसाल देते हैं। परन्तु इंसान जैसा 'बुद्धिमान' समझे जाने वाले 'प्राणी' के हवाले से कुछ ऐसी घटनायें सामने आने लगी हैं, गोया अब इंसानों की क्रूरतम 'कारगुजारी ' के लिए 'पशुओं जैसी क्रूरता' या 'हैवानियत' की बात करने जैसी उपमायें भी छोटी मालूम होने लगी हैं।

किसी पशु या उसके द्वारा की जा रही हैवानियत की मिसाल देना इसलिए भी बेमानी है क्योंकि किसी पशु द्वारा अपने स्वभावानुसार पशुता दिखाना या किसी जानवर द्वारा अपना पाशविक स्वभाव या पशुवृत्ति दर्शाना उसकी मनोवृत्ति में शामिल है। वे किसी नियम कानून के अधीन नहीं आते बल्कि उनका सम्पूर्ण आचरण वैसा ही होता है, जैसा प्रकृति ने उन्हें बख़्शा है। इंसान को तो प्रकृति का 'सर्वश्रेष्ठ प्राणी' माना जाता है। अपनी बुद्धि के सदुपयोग से यही 'अशरफ-उल-मखलूकात' आज चाँद और मंगल के रास्ते नाप रहा है। इस संसार में समाज के गरीब व पिछड़े लोगों की सहायता के लिए अनेक बड़े से बड़े संगठन बनाकर मानव ने अपने कोमल हृदयी होने का सुबूत दिया है। पूरा वैश्विक समाज किसी न किसी रूप में एक दूसरे पर निर्भर है। गोया इसी मानवीय सदबुद्धि, विश्वास और सहयोग की बदौलत ही दुनिया आगे बढ़ रही है।

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इसी मानव समाज में ऐसी क्रूरतम प्रवृति के लोग भी पाये जाने लगे हैं जिनके आगे पशुओं की पशुता और राक्षसों का राक्षसीपन भी फीका पड़ जाये। मनुष्य द्वारा मनुष्य की ही हत्या किये जाने की घटनाएं तो प्राचीन काल से होती आ रही हैं। सत्य-असत्य की लड़ाई के नाम पर, युद्ध और धर्म युद्ध के नाम पर, आन-बान-शान के लिए, जर-जोरू और जमीन की खातिर, ऊंच-नीच, धर्म-जाति आदि को लेकर मानव समाज एक दूसरे के खून का हमेशा से ही प्यासा रहा है। आज के दौर में जबकि तथाकथित धर्म का बोलबाला है, प्रवचनकर्ताओं की पूरी फौज दिन-रात समाज को ज्ञान और नैतिकता का पाठ पढ़ाती रहती है।

धार्मिक समागमों में भीड़ पहले से कई गुना बढ़ती जा रही है। देश में एक से बढ़कर एक लोकप्रिय, प्रेरक, लोगों को जीने की कला और सफल जीवन जीने के गुण सिखाते रहते हैं। दूसरी ओर इंसान है कि अपने आचरण, कृत्यों व सोच विचारों के लिहाज से बद से भी बदतर होता जा रहा है। बलात्कार, मासूम बच्चियों से बलात्कार, सामूहिक बलात्कार, और इन सबके साथ ऐसी वहशियाना हरकतें करना कि पीड़िता तड़प तड़प कर जान दे दे? ऐसे कुकृत्य तो जानवर भी करते नहीं दिखे। इंसानों को जिंदा जला देना, किसी व्यक्ति को वाहन में बाँधकर उसे सड़कों पर घसीटना, इतनी बेरहमी आखिर कोई इंसान कैसे कर सकता है?

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अब तो इन्सान, इंसान को मारकर उसकी लाशों के टुकड़े करने में भी पीछे नहीं रहा। राजधानी दिल्ली में एक व्यक्ति ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रही अपनी एक महिला मित्र की न केवल हत्या कर दी, बल्कि उसके शरीर को 35 टुकड़ों में काट कर उन अंगों को 18 दिनों तक हत्यारा दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में नालों व तालाबों में फेंकता रहा। दिल्ली का ही तंदूर काण्ड तो देश कभी भूल ही नहीं सकता, जबकि एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी को मार कर उसकी लाश के टुकड़े कर उन्हें तंदूर में जला दिया था। कोई बाप ने अपनी ही जवान बेटी की गोली मारकर हत्या कर उसकी लाश बड़ी बेरहमी से एक सूटकेस में ठूंस कर यमुना एक्सप्रेस वे पर सड़क किनारे फेंक गया। बंगाल में एक नेवी अधिकारी को उसकी पत्नी और बेटे ने मिलकर पहले तो जान से मारा, फिर बाथरूम में उसकी लाश रखकर आरी से उसके शरीर के छह टुकड़े किये और उन्हें इलाके के विभिन्न हिस्सों में फेंक दिया।

पति-पत्नी और लिव इन रिलेशन में होने वाली हत्याओं का तो सीधा अर्थ है भरोसे और विश्वास की हत्या। पिता-पुत्र -मां-बहन-भाई-बहनोई-साले आदि संबंधों के मध्य होने वाली हत्याओं का अर्थ है रिश्तों का कत्ल। आज के युग में तो रिश्तों और भरोसों का कत्ल गोया सामान्य घटना बनती जा रही है।
कभी कभी तो विचार आता है कि ऐसी घटनाओं में प्राय: एक दो चार सिरफिरे व क्रूर प्रवृति के लोग ऐसे कारनामे अंजाम दे डालते हैं। यदि यहाँ अधिक लोग होते तो शायद ऐसी घटना न घटती। ऐसे विचार भी तब बेमानी नजर आने लगते हैं, जब हम दंगाइयों की सामूहिक भीड़ की क्रूरता पर नजर डालते हैं। याद कीजिए, 1984 में एक धर्म विशेष के लोगों को किस बेरहमी से कत्ल किया गया था। भीड़ जिंदा लोगों को टाँगें पकड़ कर मारते और खींचते हुए जगह जगह इंसानों की जलती चिताओं में फेंक रही थी। गले में जलते हुए टायर डालकर हत्याएं हो रही थीं।

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लोगों को उनके घरों में आग लगाकर जिंदा जलाया जा रहा था। आम लोग तो क्या पुलिसकर्मी भी इन्हें बचाने नहीं आ रहे थे। 2002 का गुजरात याद कीजिये। कैसे ट्रेन के डिब्बे में आग लगाकर दंगाइयों ने 59 लोगों को जिंदा जला दिया था। उसके बाद गुजरात के बड़े क्षेत्र में दंगाइयों द्वारा महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार, महिलाओं का स्तन काटा जाना, उनके पेट फाड़ कर बच्चा बाहर निकालना, शरीर के टुकड़े-टुकड़े करना, धर्म विशेष की पूरी की पूरी बस्ती आग के हवाले कर देना और ऐसी न जाने कितने जुल्म धर्म के नाम पर धर्मांध भीड़ द्वारा दिल्ली, गुजरात जैसी कई जगहों पर किये जाते रहे हैं।


कुछ अति शरारती तत्व हमारे ही समाज में ऐसे भी हैं जो केवल अपने राजनीतिक लाभ के लिए अपने आकाओं के इशारे पर ऐसी क्रूरतम घटनाओं में अपराधी की धर्म-जाति देखकर ही प्रतिक्रिया करते हैं। यह चलन और भी बेहद खतरनाक है। यदि हत्यारा या जघन्य अपराधी उनकी अपनी बिरादरी या धर्म का है तो वे खामोश रहेंगे।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं।)

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