अस्तित्व को सदियों तक सम्हालती है कला

कला हमेशा से हमारे बीच रही है। कला ही है जिसके माध्यम से हम एक दूसरे को समझ पाते हैं, समझने का प्रयास करते हैं। कला ही है जो इतिहास को हमारे समक्ष बहुत ही बारीकी से प्रस्तुत करने का प्रयास करती है। कला अपने साथ समाज और संस्कार को संभाल कर रखती है, जो सदियों बीत जाने के बाद भी थाती के रूप में हमारे पास होती है।

Created By : ashok on :03-10-2022 14:53:11 पंकज तिवारी खबर सुनें

पंकज तिवारी
कला हमेशा से हमारे बीच रही है। कला ही है जिसके माध्यम से हम एक दूसरे को समझ पाते हैं, समझने का प्रयास करते हैं। कला ही है जो इतिहास को हमारे समक्ष बहुत ही बारीकी से प्रस्तुत करने का प्रयास करती है। कला अपने साथ समाज और संस्कार को संभाल कर रखती है, जो सदियों बीत जाने के बाद भी थाती के रूप में हमारे पास होती है। जब कई-कई पीढ़ियां नष्ट हो चुकी होती हैं और कहीं खुदाई में या अनायास ही कुछ प्राप्त हो जाने पर, जब वर्तमान को भूत के लिपि का ज्ञान नहीं होता तो रहन-सहन से, वातावरण से, कृतियों में प्रयुक्त पृष्ठभूमि से इतिहास के परिस्थितियों से परिचित करवाती है।
कला समाज में एक को दूसरे से जोड़ने का भी कार्य करती है। इतिहास को अपनी पूरी बात बताने हेतु खुद को कई पृष्ठों में फैलाना होता है जबकि कला में रेखाएं सब कुछ पलक झपकते ही स्पष्ट कर देती हैं। कई-कई जगह लिपियां आज तक नहीं पढ़ी जा सकीं, जबकि वहीं के चित्र लोगों से खूब बतियाते हैं। कृतियों में अपनापन सा होता है। आखिर पुराने कृतियों को देखने जब हम किसी संग्रहालय या गुफाओं में जाते हैं, तो वहां ऐसा क्या है कि हम दीवारों पर उकेरे एक-एक आकृतियों को घंटों निहारा करते हैं। कुछ तो है जो हमें अपना सा लगता है, जहां से हम बहुत कुछ प्राप्त कर लेना चाहते हैं जिससे जुड़कर हमें खुशी होती है। तमाम प्राचीन कृतियां जिसमें से कुछ तो लगभग खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं, वहां भी जाकर महसूसना क्या जुड़ाव को नहीं दर्शाता है।
जैन, बौद्ध और सनातन संस्कृतियों पर आधारित चित्रों को देखकर आखिर क्या है कि हमें अपना लगने लगता है। कला हमें हमारे विरासत से मिलवाती है। पुरखों से, उनके द्वारा किए अच्छे-बुरे कार्यों से अवगत करवाती है। उन्हें अच्छे से समझ सकने का मौका उत्पन्न करवाती है। कला हमें हमारे मिट्टी और महक के पास ले जाती है। कला हमारी सोई हुई संवेदनाओं को जगाने का प्रयास करती है। कला कण-कण में व्याप्त है। कला भाव प्रधान है, कला सौंदर्य प्रधान है, पर बिना भाव और सौंदर्य के चीजों में भी कला है मतलब कला हर जगह हैं। जीवन में जो कुछ भी घट रहा होता है, सब कुछ कला है। क्रूरता, कोमलता मूर्तता-अमूर्तता, खूबसूरती- बदसूरती तो ग्राही के दृष्टि पर निर्भर करता है इससे कलाकार के दर्शन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
उसका कार्य होता है सृजन, जो वो बाकायदा कर रहा होता है। उसका प्रभाव कितना और किस पर होगा, उसका भी ज्ञान उसे नहीं होता। कलाकृतियां चाहे प्राकृतिक हों या कृतिम, मूर्तन हो या अमूर्तन, मूल्यवान जरूर होती हैं। यह अलग बात है कि सही मूल्यांकन करने वाला उस समय मौजूद है या नहीं। कलाकार जिस समय सृजन कर रहा होता है स्व को भूल चुका होता है। किसी प्रवाह में बहते हुए बहुत दूर निकल चुका होता है और जब सफर पूरा करके वापस स्व को प्राप्त करता है तो जरूरी नहीं कि अपने ही बनाए कृति को वो समझ पा रहा हो या उसके नजदीक भी पहुंच पा रहा हो।
सर्जक अपने सृजन के बाद आम दर्शक हो जाता है तथा औरों की भांति सृजन के प्रभाव को नए सिरे से बिल्कुल अनभिज्ञ की भांति ग्रहण करता है। कलाकार अपने सृजन के माध्यम से अपनी भावनाओं को समाज तक प्रेषित करने का प्रयास करता है और इसी बहाने लोगों में सामाजिक संबंधों को मजबूत करने का प्रयास भी करता है। ज्ञान-विज्ञान, ग्राही-दाता हर जगह कला ही तो है। कलाकृतियां आईना हैं वर्तमान का जो अपने में अतीत भी समेटे हुए हैं, जो भविष्य भी समेटने हेतु तत्पर है। सभ्यताओं के आदान-प्रदान में भी कला महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।
कला किसी भी सभ्यता में अभिन्न अंग बन कर उपस्थित होती है। सभ्यता जन्मती है और नष्ट हो जाती है। ऐसा कई बार हुआ है। पर उस सभ्यता की कला जाते-जाते जाती है और जाने से पहले नष्ट हुई सभ्यता से बहुत कुछ, आने वालों को सौंप जाती है। इसके कई प्रमाण भी मौजूद हैं। कला हमारे जीवन के प्रमुख आवश्यकताओं में से एक है। बात भारत के कला की करें तो यहां विचार, धर्म, संस्कृति, दर्शन, विधि-विधान, लगभग हर जरूरी पहलू कला में संग्रहित है। जो संपन्नता को दर्शाती है। भारत के लगभग सभी भागों में लोकशैली, लोकरीति में ही सही पर कला का सृजन जरूर हुआ है। आधुनिक कला में हम भले ही संघर्ष करते हुए नजर आ रहे हों, पर लोककला में हम सम्पन्न हैं। इतनी विविधता, विशेषता, सम्पन्नता शायद ही कहीं देखने को मिले। यही भारत की विशेषता है।
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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