मुफ्त घोषणाओं पर रोक की मांग वाली याचिका का ‘आप’ ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर किया विरोध

‘आप’ पार्टी ने फ्री घोषणाओं पर रोक की मांग वाली जनहित याचिका का विरोध किया है। आम आदमी पार्टी ने कहा कि वंचित वर्ग को फ्री पानी बिजली ट्रांसपोर्ट शिक्षा स्वास्थ्य आदि की सुविधाएं देना मुफ्त रेवड़ी बांटना नहीं बोला जा सकता।

Created By : Shiv Kumar on :09-08-2022 15:57:23 सुप्रीम कोर्ट खबर सुनें

एजेंसी, नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालर्य में आम आदमी पार्टी ने अर्जी दाखिल कर मुफ्त रेवड़ियां बांटने पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका का विरोध किया है। ‘आप’ ने कहा है कि वंचित वर्ग को बिजली, मुफ्त पानी, शिक्षा, ट्रांसपोर्ट, स्वास्थ्य आदि की सुविधाएं देना मुफ्त रेवड़ी बांटना नहीं कहा जा सकता। पार्टी ने उच्चतम न्यायालय से लंबित मामले में पक्षकार बनाने व पक्ष रखने की इजाजत देने का अनुरोध किया है।सुप्रीम कोर्ट में बीजेपी प्रवक्ता व वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की जनहित याचिका लंबित है। जिसमें राजनैतिक पार्टियों द्वारा चुनाव के वक्त मतदाताओं को लुभाने के लिए फ्री उपहार की घोषणाओं का मुद्दा उठाया गया है। याचिका में मांग है कि ऐसे ऐलान करने वाले दलों पर कार्रवाई हो उनके चुनाव चिन्ह जब्त करने व मान्यता रद करने का चुनाव आयोग को अधिकार दिया जाए।

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कोर्ट ने दिए विशेषज्ञ समिति गठित करने के संकेत
उच्चतम न्यायालय ने तीन अगस्त को इस याचिका पर संज्ञान लेते हुए फ्री घोषणाओं के प्रभावों पर विचार करने के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने के संकेत दिए थे व तमाम संबंधित पक्षकारों से इस बारे में सुझाव मांगे थे। उच्चतम न्यायालय के इस आदेश के बाद ‘आप’ पहला दल है जिसने उच्चतम न्यायालय में अर्जी दाखिल कर पक्षकार बनाए जाने की गुहार लगाई है व अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका का विरोध किया है।


आम आदमी पार्टी ने उठाए ये सवाल
आम आदमी पार्टी ने दाखिल अर्जी में अश्वनी कुमार उपाध्याय की याचिका के औचित्य पर प्रश्न उठाते हुए कहा है कि पार्टी को याचिका पर प्राथमिक आपत्ति है। अदालत को अश्विनी कुमार उपाध्याय की तरफ से दाखिल याचिका पर विचार नहीं करना चाहिए। क्योंकि याचिकाकर्ता के सत्ताधारी दल भाजपा से रिश्ते हैंं। याचिकाकर्ता राजनैतिक उद्देश्य से जनहित याचिका दाखिल करता है। याचिका में फ्री रेवड़ियों के नाम पर आर्थिक विकास के एक निश्चित माडल को निशाना बनाया जा रहा है जिसमें सरकारी धन का प्रयोग जनता के सामाजिक व कल्याणकारी उपायों के लिए किया जाता है।

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‘आप’ की दलीलें
‘आप’ ने ये भी कहा कि याचिका में राजकोषीय घाटे पर चिंता जताई गई है पर इसमें बड़े उद्योगों, व्यापारों को केंद्र व कई राज्य सरकारों द्वारा टैक्स में छूट देने व अन्य तरह की रुटीन में दी जाने वाली सब्सिडी की फ्री रेवड़ियों से होने वाले बड़े वित्तीय घाटे को नजरअंदाज किया गया है। राष्ट्र की आर्थिक सेहत सुधारने का जिम्मा याचिकाकर्ता सिर्फ वंचित वर्ग पर डाल रहा है। याचिका दाखिल करने के पीछे सियासी मकसद है। क्योंकि इसमें की गई मांग वित्तीय घाटे के बारे में या फ्री रेवड़ियों पर रोक की नहीं है, बल्कि मांग की गई है कि सियासी पार्टियों को फ्री रेवड़ियों की नीतियां घोषित करने से रोका जाए। ऐसी मांग करते वक्त याचिकाकर्ता ने संविधान में दिए गए सामाजिक व कल्याणकारी एजेंडे के सिद्धांत की अनदेखी की है। आप पार्टी ने अर्जी में कहा है कि वंचित वर्ग के सामाजिक आर्थिक कल्याण के लिए लाई जाने वाली योजनाओं को फ्री रेवड़ियां नहीं बोला जा सकता है। ये कहा कि यह मसला कोर्ट के विचार का नहीं है बेहतर है कि इस नीतिगत मसले को केंद्र व राज्यों की चुनी हुई सरकारों पर छोड़ दिया जाए।

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विशेषज्ञ समिति में प्रतिनिधि शामिल करने की मांग
‘आप’ ने कहा है कि यदि अदालत तीन अगस्त के आदेश के अनुसार इस पर विचार के लिए एक विशेषज्ञ समिति के गठन का इच्छुक है तो उस विशेषज्ञ समिति में केंद्र सरकार का एक प्रतिनिधि, तमाम राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों का एक प्रतिनिधि, देश की हर मान्यता प्राप्त पार्टी का एक-एक प्रतिनिधि, एक प्रतिनिधि वित्त आयोग का, एक प्रतिनिधि रिजर्व बैंक आफ इंडिया का, एक प्रतिनिधि नीति आयोग का, एक प्रतिनिधि चुनाव आयोग का, एक एक प्रतिनिधि प्रत्येक राज्य व केंद्र शासित प्रदेश की नीति निमार्ता संस्थाओं का और एससी, एसटी, आर्थिक रूप से कमजोर व अल्पसंख्यकों के बीच काम करने वाले गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि इसमें शामिल होने चाहिए।

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