चिप्स के लिए लड़ते अमेरिका और चीन

शक्तिशाली चिपों का उपयोग सेना में करके अपने सैनिकों को सुरक्षित और दूसरे देशों को ज्यादा से ज्यादा क्षति पहुंचाई जा सकती है। इस चिप कारोबार की सबसे बड़ी विडंबना यह है

Created By : ashok on :15-01-2023 15:33:51 संजय मग्गू खबर सुनें

चिप्स के लिए लड़ते अमेरिका और चीन
संजय मग्गू
आप जानते हैं कि प्रथम और द्वितीय विश्व महायुद्ध होने का कारण क्या था? बाजार का बंटवारा। जब बाजार का बंटवारा बातचीत, समझौते या संधियों से नहीं हो पाया, तो एकमात्र रास्ता बचा युद्ध। दोनों विश्व महायुद््धों की शुरुआत से पहले कुछ मामूली सी घटनाएं हुईं और देखते ही देखते दुनिया भर के देश इस पक्ष या उस पक्ष में आकर खड़े होते गए। उसने विश्व महायुद्ध का रूप ले लिया। इन दिनों भी एशिया प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच एक अघोषित चिप (सेमीकंडक्टर्स) युद्ध चल रहा है।

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भारत भी निकट भविष्य में इस युद्ध का एक महा योद्धा हो सकता है। लेकिन उस भूमिका में आने उसे समय लगेगा। सवाल यह है कि इस छोटे से सिलिकॉन चिप यानी सेमीकंडक्टर्स की क्या खासियत है जिसके लिए चीन और अमेरिका जैसे देश एक दूसरे के साथ शह और मात का खेल खेल रहे हैं। दरअसल, सेमीकंडक्टर्स ही वह वस्तु है जो इन दिनों हमारे जीवन को नियंत्रित कर रहा है। जिसके पास जितनी ज्यादा शक्तिशाली और सबसे छोटी चिप होगी, वह देश वैश्विक अर्थव्यवस्था पर राज करेगा। इन दिनों दुनिया भर के देश इस जतन में लगे हुए हैं

कि छोटी से छोटी चिप को कितना शक्तिशाली बनाया जाए जिसका उपयोग सैनिकों के हथियारों, उपग्रहों को छोड़ने, मोबाइल, रेफ्रीजरेटर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आदि में किया जाता है। शक्तिशाली चिपों का उपयोग सेना में करके अपने सैनिकों को सुरक्षित और दूसरे देशों को ज्यादा से ज्यादा क्षति पहुंचाई जा सकती है। इस चिप कारोबार की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इन ज्यादातर चिपों की डिजाइन अमेरिका में तैयार होती है। सेमीकंडक्टर्स बनते ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में और इसको एसेंबल यानी जोड़ने का काम चीन में होता है। सबसे बड़ी बात यह है कि सेमीकंडक्टर्स का आविष्कार अमेरिका में हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे इस पर से उसका एकाधिकार खत्म होता गया और दूसरे देश भी उसके मुकाबले में आ गए।

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इन देशों ने अपने यहां सेमीकंडक्टर्स बनाने वाली कंपनियों और उद्योगों को प्रोत्साहन दिया, सब्सिडी दी, दूसरी तरह की सुविधाएं दी और नतीजा यह हुआ कि इस मामले में वे आगे बढ़ती गई और अमेरिका का वर्चस्व एक तरह से खत्म होता गया। पूर्वी एशिया सेमीकंडक्टर्स के मैन्यूफैक्चरिंग हब के रूप में उभरता चला गया। दुनिया में सबसे ज्यादा चिप्स का निर्माण ताइवान में होता है। ताइवान को वहां के शासक स्वशासित मानते हैं, जबकि चीन का दावा है कि ताइवान चीन का ही हिस्सा है।

अमेरिका गाहे-बगाहे ताइवान के मामले में दखल देता रहता है जिसकी वजह से चीन बौखलाया रहता है। पिछले साल ही अमेरिका की सीनेटर नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा को लेकर कितना बवाल हुआ था, यह बतान की जरूरत नहीं है। अमेरिका और चीन के बीच काफी बयानबाजी हुई थी। एक बार तो ऐसा लगा था कि पूर्वी एशिया में दो महाशक्तियां टकराने वाली हैं। लेकिन यूक्रेन और रूस के बीच चल रहे युद्ध के परिणाम को देखते हुए दोनों महाशक्तियों ने अपने-अपने कदम पीछे खींच लिए थे। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि सेमीकंडक्टर्स के कारोबार में अभी अमेरिका का पलड़ा भारी है।

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