धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिका की चिंता

अमेरिकी सरकार की एजेसी `यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन आॅन इंटरनेशनल रीलिजियस फ्रीडम` ने इस सूची से भारत को बाहर रखने पर अपनी ही सरकारके सामने विरोध प्रकट किया है।

Created By : Manuj on :07-12-2022 12:25:10 संजय मग्गू खबर सुनें

धार्मिक स्वतंत्रता पर अमेरिका की चिंता
संजय मग्गू
अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने उन बारह देशों की एक सूची जारी की है जिनमें धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन किया जा रहा है। सबसे पहले तो उन देशों बारे में जान लिया जाए। ये बारह देश हैं, लातिन अमेरिकी देश क्यूबा और निकारागुआ, रूस, चीन, उत्तर कोरिया, सऊदी अरब, ईरान, इरीट्र्यिा, पाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और म्यांमार।

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विशेष निगरानी वाले देशों में अल्जीरिया, सेंट्र्ल अफरीकन रिपब्लिक, कोमोरोस और वियतनाम। हालांकि अमेरिकी सरकार की एजेसी 'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन आॅन इंटरनेशनल रीलिजियस फ्रीडम' ने इस सूची से भारत को बाहर रखने पर अपनी ही सरकारके सामने विरोध प्रकट किया है। यह भी सही है कि इसी साल जून महीने में जब अमेरिकी एजेंसी ने विशेष निगरानी वाले देश में भारत का नाम रखने की बात कही थी, तब भारत ने इसका भरपूर विरोध किया था। उसने अमेरिकी आयोग के मानकों को भी कठघर में खड़ा किया था।

यह तो थी भारत की बात। भारत का विरोध अपनी जगह जायज और न्यायूपर्ण था। लेकिन जिन देशों को धार्मिक आजादी के उल्लंघन वाली सूची में रखा गया है, अगर उन देशों की अमेरिका के साथ संबंधों की पड़ताल की जाए, तो यह सूची कितनी पक्षपात पूर्ण है, इसका खुलासा हो जाता है। सबसे पहले क्यूबा की बात की जाए। पिछले साठ-सत्तर सालों से क्यूबा में अमेरिका की नाक के नीचे कम्युनिस्ट शासन कायम है और अमेरिका लाख प्रयास के बावजूद फिदेल कास्त्रो और अन्य कम्युनिस्ट शासकों का कुछ नहीं बिगाड़ पाया।

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अमेरिका के मुकाबले में एक पिद्दी सा देश हमेशा अमेरिका की आंख की किरकिरी रहा है। चीन, रूस, उत्तर कोरिया, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, वियतनाम के बारे में अमेरिका का रवैया क्या है? यह दुनिया जानती है। रूस, चीन और उत्तर कोरिया में कथित रूप से कम्युनिस्ट शासन है। अमेरिका का सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी भी रूस और चीन हैं। नाटो देशों के खिलाफ खड़े होने वाले रूस और चीन को अगर इस सूची में शामिल नहीं किया जाता तो आश्चर्य होता। एक बात और। यदि भारत सशक्त न होता और अमेरिका के साथ राजनीतिक, व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध प्रगाढ़ न होते, तो निश्चित रूप से भारत का नाम भी इन बारह देशों की सूची में शामिल होता।

अमेरिकी एजेंसी 'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन आॅन इंटरनेशनल रीलिजियस फ्रीडम' तो अपनी सरकार से मांग भी यही कर रही है। जहां तक सऊदी अरब, ईरान की बात है, तो पेट्रोलियम पदार्थों के उत्पादन और सप्लाई को लेकर आए दिन अमेरिका से इन देशों का टकराव होता रहता है। ओपेक देशों की मनमानी और कच्चे तेल के उत्पादन और कीमतों पर नियंत्रण के चलते इनको पसंद नहीं करता है। 'यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन आॅन इंटरनेशनल रीलिजियस फ्रीडम' के कमिश्नर स्टीवन स्नेक का आरोप है कि सऊदी अरब में दूसरे धर्म के लोगों को धार्मिक आजादी नहीं दी जा रही है। अमेरिका की इस सूची को लेकर विवाद पैदा हो गया है। भारत भी सूची की सत्यता पर विश्वास नहीं कर पा रहा है।

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