‘कांग्रेस मुक्त भारत’ या ‘कांग्रेस युक्त भाजपा’

भारतीय जनता पार्टी  का शीर्ष नेतृत्व या यूं कहें कि नरेंद्र मोदी व अमित शाह की युगल जोड़ी भारत को ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ या यूं कहें कि "विपक्ष रहित भारत" बनाने के लिए साम दाम दंड भेद की नीति अपना कर अपने इस मिशन को जल्दी से जल्दी पूरा करना चाहती है।

Created By : Pradeep on :01-04-2022 15:16:17 प्रतीकात्मक तस्वीर खबर सुनें

भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व या यूं कहें कि नरेंद्र मोदी व अमित शाह की युगल जोड़ी भारत को ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ या यूं कहें कि विपक्ष रहित भारत बनाने के लिए साम दाम दंड भेद की नीति अपना कर अपने इस मिशन को जल्दी से जल्दी पूरा करना चाहती है वह इतनी जल्दी में है कि वे भाजपा की विथ ए डिफरेंस पार्टी की छवि को दरकिनार करके छह माह पहले कांग्रेस,बसपा व अन्य पार्टियों से भाजपा में शामिल किए गए नेताओं को मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री बना रहे हैं और ऐसे दूसरे बहुत से नेता मंत्रिपद हासिल कर रहे हैं।

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पूर्वोत्तर के मणिपुर में एन बीरेन सिंह के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही पहली बार भाजपा की वहां सरकार बन गई है। मजे की बात यह है कि बीरेन कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली पिछली सरकार में मंत्री पद संभाल चुके हैं। वे पिछले साल अक्‍टूबर में ही कांग्रेस से इस्‍तीफा देकर भाजपा से जुड़े थे। अमित शाह लगभग अपनी हर रैली में ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के नारे को दोहराते हैं। उनका दावा है कि वह पूरे देश से कांग्रेस के शासन को उखाड़ फेकेंगे और वे अपने इस मिशन में सफल भी हो रहे हैं। लेकिन अगर गौर से देखें तो मणिपुर में बीरेन सिंह तो एक उदाहरण है। पूरे देश में भाजपा कांग्रेसियों के सहारे जीत हासिल कर रही है, यानी ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के चक्कर में ‘कांग्रेस युक्त भाजपा’ बनती जा रही है।

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अगर हम उन राज्यों पर निगाह डालें जहां हाल ही में विधानसभा चुनाव संपन्न हुए हैं तो यह बात और स्पष्ट हो जाएगी। उत्तराखंड में कांग्रेसी रहे सतपाल महाराज, उनकी पत्नी अमृता रावत, पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, पूर्व विधानसभा अध्यक्ष यशपाल आर्य, पूर्व मंत्री हरकसिंह रावत, सुबोध उनियाल, प्रणव सिंह, केदार सिंह रावत, प्रदीप बत्रा, रेखा आर्य सभी कांग्रेसी से भाजपाई हुए हैं। उत्तराखंड मंत्रिमंडल में शामिल मंत्रियों में से अधिकांश वे हैं जो कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए हैं। ये सभी कांग्रेस के बड़े नेता रहे हैं। उत्तराखंड में भाजपा की जीत के बाद सोशल मीडिया पर एक चुटकुला भी चला कि जीत तो कांग्रेसियों को मिली है, बस चुनाव चिह्न बदल गया है।


ऐसे ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस में लंबे समय तकरहे नारायण दत्त तिवारी, रीता बहुगुणा जोशी, अमरपाल त्यागी, धीरेंद्र सिंह, रवि किशन समेत कई अन्य नेता भी भाजपाई हुए और इनमें से कई मंत्री भी बने। यूपी में योगी आदित्यनाथ की योगी-2 सरकार में दिनेश शर्मा की जगह बसपा से 5 साल पहले ही भाजपा में शामिल हुए बृजेश पाठक को डिप्टी सीएम बनाने से आम लोगों के साथ-साथ भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता भी हैरान हुए हैं। वे समझ ही नहीं पा रहे कि 5 साल पहले जो शख्स बीएसपी से बीजेपी में आया हो वह पार्टी के तमाम धुरंधरों को पीछे छोड़ते हुए इस मुकाम तक कैसे पहुंच गया लेकिन जब उनको बताया गया कि भाजपा में पहली बार ऐसा प्रयोग नहीं हुआ है। नरेंद्र मोदी व अमित शाह की जुगल जोड़ी इससे पहले भी ऐसा प्रयोग कई बार कर चुकी है। जब उनको उदाहरण के तौर पर बताया गया कि 2015 में कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हुए हिमंत बिस्वा सरमा महज 6 साल में असम के सीएम बन गए, इससे पहले जो असम के मुख्यमंत्री रहे सर्बानंद सोनोवाल भी असम गण परिषद से बीजेपी में आए थे। कर्नाटक के वर्तमान सीएम बासवराज बोम्मई 13 साल पहले भाजपाई बने थे।

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बंगाल में बीजेपी ने जिन शुभेंदु अधिकारी को नेता प्रतिपक्ष बना रखा है। उन्हें जब यह दर्जा मिला तब बीजेपी में अधिकारी को आए हुए सिर्फ 6 महीने ही हुए थे आज वे बंगाल में बीजेपी का चेहरा हैं।जन्मजात कांग्रेसी परिवार से ताल्लुक रखने वाले हरियाणा के चौधरी वीरेंद्र सिंह, मध्य प्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया, यूपी के जतिन प्रसाद, कौशल किशोर, रीता बहुगुणा, महाराष्ट्र के नारायण राणे के अलावा और बहुत से दूसरी पार्टी के नेताओं को भाजपा में शामिल करके भाजपा ने कांग्रेस मुक्त भारत या यूं कहें विपक्ष रहित भारत का अपना अभियान जारी रखा हुआ है। तब कार्यकर्ताओं व लोगों को थोड़ी राहत तो होती है लेकिन वे जब ऐसे दलबदलू चेहरों को बीजेपी में आगे बढ़ते और मजबूत होते देखते हैं तो उन्हें लगता है कि अब भाजपा बदल गई है या बदल रही है।

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गोवा में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस विधायक विजय पाई खोट, प्रवीण ज्यांते और पांडुरंग मदकाईकर भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने इन सभी नेताओं को विधानसभा का टिकट भी दे दिया। इसे लेकर पार्टी को आंतरिक विरोध का सामना करना पड़ा लेकिन ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ बनाने के चक्कर इसे नजरअंदाज़ कर दिया गया। अगर हम इससे पहले की बात करें तो अरुणाचल का उदाहरण सबसे क्लासिक है। यहां 2014 के विधानसभा चुनाव के बाद 60 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 42 विधायक जीतकर आए थे। आज वहां भाजपा का शासन है। उसके पास 47 विधायक हैं। इसमें से ज्यादातर कांग्रेस से आए हैं। पेमा खांडू ने पिछले साल सितंबर में कांग्रेस छोड़कर पीपुल्स पार्टी आॅफ अरुणाचल ज्वाइन किया और फिर दिसंबर में वे भाजपा में शामिल हुए। उनके पिता दोरजी खांडू कांग्रेस से प्रदेश से मुख्यमंत्री रहे चुके है।अब वे अरुणाचल में भाजपा के मुख्यमंत्री हैं।

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कुछ ऐसा ही हाल असम का भी है।असम भाजपा में कांग्रेस के हेमंत विश्व सरमा, पल्लब लोचन दास, जयंत मल्ल बरुआ, पीयूष हजारिका, राजन बोरठाकुर, अबु ताहिर बेपारी, बिनादा सैकिया, बोलिन चेतिया, प्रदान बरुआ और कृपानाथ मल्ल जैसे नेता शामिल हुए हैं। 2014 लोकसभा चुनाव की बात करते हैं। तब चौधरी वीरेंद्र सिंह, राव इंद्रजीत सिंह, जगदंबिका पाल, डी पुरंदेश्वरी, कृष्णा तीरथ समेत ढेर सारे कांग्रेसी नेता भाजपा में शामिल हुए थे। इसमें से कई मंत्री भी बने हैं। फिलहाल कभी ‘पार्टी विद डिफरेंस’ का नारा देने वाली भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आज ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के लिए इतना बेक़रार है कि उसे इस बात से फर्क नहीं पड़ रहा है कि इससे पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर क्या फर्क पड़ रहा है। कुछ समय पहले के एन गोविंदाचार्य ने कहा था कि ‘राजनीतिक दल आज सत्ता पाने का गिरोह बन कर रह गए हैं।

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दल-बदल इसी कुत्सित संस्कृति का रुप है।’ गोविंदाचार्य का जिक्र इसलिए ज़रूरी है क्योंकि वह लंबे समय तक भाजपा के थिंक टैंक माने जाते रहे हैं। वैसे जिस तरह से भाजपा में कांग्रेस के नेता शामिल हो रहे हैं उससे यह कलई भी खुलती है कि भाजपा कैडर आधारित पार्टी है और संघ इसके लिए नेता तैयार करता है। इसके अलावा भाजपा सदस्यता के मामले में दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करती है लेकिन जीत के लिए उसे कांग्रेस से नेता उधार लेने पड़ रहे हैं। यानी संघ भाजपा के लिए उतने तेज़ी से नेता नहीं तैयार कर पा रहा है जितना कि कांग्रेस मुक्त भारत बनाने के लिए ज़रूरी है। फिलहाल अगर हम एक पार्टी के रूप में भाजपा पर इसके प्रभाव देखें तो इसका सबसे ज्यादा बुरा असर कार्यकर्ताओं पर पड़ता है।


वे अपने आपको छला महसूस करता है। उन्हें लगता है कि लंबे समय तक पार्टी के लिए मेहनत वो करें और दूसरी पार्टी से कोई भी नेता आकर चुनाव जीत जाएगा, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री की कुर्सी भी पा लेगा। इसके अलावा भले ही कई राज्यों में पार्टी की सरकार तो बन जाएगी लेकिन संगठन तैयार नहीं हो पाएगा क्योंकि भाजपा ने सत्ता ऐसे नेताओं के सहारे प्राप्त की है जिनका जुड़ाव संगठन के साथ लंबे समय से नहीं है। यह सच है कि अन्य पार्टी भी ऐसा करती रहती हैं। ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। कांग्रेस भी ऐसा करती थी। हरियाणा में भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कुलदीप बिश्नोई की पार्टी के 5 विधायकों को अपनी ओर करके 5 साल अपनी सरकार चलायी। केंद्र में प्रधानमंत्री नरसिंह राव के नेतृत्व में रही कांग्रेस सरकार ने भी अजीत सिंह की लोकदल पार्टी व अन्य पार्टियों के सांसदों को तोड़ करके अपनी सरकार बचाई और चलाई थी। जनता दल-जनता पार्टी के समय में भी ऐसा हुआ। संसद में आपातकाल का विधेयक लाने वाले जगजीवन राम बाद में जनता सरकार में उपप्रधानमंत्री बने थे।

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कांग्रेस व अन्य पार्टियों ने भी पहले वही किया जो आज भाजपा कर रही है लेकिन इन पार्टियों के नेताओं ने कभी भी भाजपा की तरह अपनी पार्टी को विद ए डिफरेंस पार्टी नहीं बताया। भाजपा की इस कार्यशैली से जनसंघ से लेकर आज भारतीय जनता पार्टी से जुड़े और तन मन धन से अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले कर्मठ व निष्ठावान कार्यकर्ता मन से बहुत दुखी हैं, नाराज हैं। उनका कहना है फिर कांग्रेस और भाजपा में अंतर ही क्या रहा? असल में लोगों ने अपने जेहन में बीजेपी की ऐसी तस्वीर बिठा रखी है, जो आरआरएस के मुख्यालय नागपुर से नियंत्रित होती है जो अपने कैडर पर ही भरोसा करती है। जहां दूसरे दल या विचारधारा से आने वाले शख्स के लिए बहुत जगह नहीं होती। लेकिन जब भाजपा की युगल जोड़ी विपक्षी पार्टियों खासकर कांग्रेस के सत्ता लोलुप व महत्वकांक्षी नेताओं को भाजपा में शामिल ही नहीं करती बल्कि उन्हें अच्छा व सम्मानजनक पद भी प्रदान करती है तो लोगों खासकर भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को बहुत अचंभा होता है और दुख भी होता है। हमारा मानना है कि भाजपा यह सब एक रणनीति के तहत कर रही है।

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जहां भाजपा खुद मज़बूत नहीं है, वहां कांग्रेस समेत दूसरे दलों के नेताओं को अपनी ओर खींच रही है। इससे दो फायदे होते हैं। एक तो भाजपा मज़बूत होती है, उनके पक्ष में माहौल बनता है। वहीं दूसरी विपक्षी पार्टियां और कमज़ोर होती हैं। जहां तक बात कार्यकर्ताओं की है तो उनमें थोड़ी नाराज़गी होती है लेकिन अभी नरेंद्र मोदी के लहर के चलते जो भी नेता कांग्रेस या दूसरे दलों से आ रहे हैं, उनके पास किसी और दल में शामिल होने का विकल्प नहीं है। संघ को भी लगता होगा कि हिंदू राष्ट्र के लिए कब तक इंतज़ार करें। उधार के उम्मीदवारों को लेकर ही हिंदू राष्ट्र बना लेते हैं। जरा सोचिए बीजेपी में आए कांग्रेसी, सपाई और बसपाई मिलते होंगे तो वे कैसे मिलते होंगे, क्या कहते होंगे ? यह सोच कर हंसी आती हैं। क्या बीजेपी बैंक है? पांच सौ हज़ार के पुराने नोट की तरह दूसरे दलों से नेता बीजेपी में आए और नए नोट में बदल गए। अभी तक सब कहते थे कि कांग्रेस में भी भाजपाई है। पहली बार हो रहा है जब लोग कह सकते हैं कि भाजपा में भी कांग्रेसी हैं।


कैलाश शर्मा
मास्टर ऑफ जर्नलिज्म
राष्ट्रीय महासचिव
ऑल इंडिया पेरेंट्स एसोसिएशन

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