बोधि वृक्ष: सतगुरु मिलने से दूर होती है भवबाधा

गुरु नानक देव भी सतगुरु की बात किया करते थे और संत कबीरदास ने भी अपनी रचनाओं में सतगुरु का जिक्र किया है। एक गुरु वह भी है जो हमें पढ़ाता-लिखाता है। अब सवाल उठता है कि सतगुरु कौन है?

Created By : Shiv Kumar on :13-01-2022 18:24:45 प्रतीकात्मक तस्वीर खबर सुनें

अशोक मिश्र
सतगुरु की बात सिखों के पहले गुरु नानक देव जी भी करते थे और अपने प्रगतिशील विचारों के लिए प्रसिद्ध संत कबीरदास भी अपनी रचनाओं में सतगुरु की बात कह गए हैं। अब सवाल उठता है कि यह सतगुरु है कौन? एक गुरु तो वह होता है, जो हमें अक्षर ज्ञान देता है, पढ़ाता-लिखाता है। हमें योग्य नागरिक बनाता है। हम उससे शिक्षा ग्रहण करके समाज में उतरते हैं और नौकरी, व्यवसाय आदि करके सफल इनसान होने का रुतबा हासिल करते हैं।

यह गुरु हमें जीवन जीने के तरीके बताता है, समाज में कैसे रहना है, यह बताता है। लेकिन सतगुरु हमें आध्यात्मिक प्रेम की ओर ले जाता है। यह आध्यात्मिक प्रेम हमें सांसारिक दुखों से मुक्ति दिलाता है। सतगुरु ही हमें आत्मा और परमात्मा के विभिन्न स्वरूपों का परिचय कराता है। सतगुरु ही बताता है कि इस संपूर्ण संसार में जो कुछ भी है, वह प्रेम है। आत्मा प्रेम का ही एक स्वरूप है।

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परमात्मा भी प्रेम का महासागर है। इस महासागर का एक बूंद है आत्मा। आत्मा अपने जन्मकाल से ही प्रेममय है। आत्मा प्रेम से ही पैदा होती है और बाद में इसी प्रेम में इसका विलय हो जाता है। इस जन्म लेने और विलय होने के दौरान सतगुरु की कृपा से वह प्रेममय रह पाए तो अति उत्तम है। इस अगाध प्रेम का छककर पान करने की ओर सतगुरु ही प्रेरित करता है। आध्यात्मिक चेतना जाग्रत करके सतगुरु हमें प्रेम मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम इस मार्ग पर कितनी तेजी से और कितना सफर कर पाते हैं। यह मार्ग भी कोई आसान नहीं है।

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जरा सा चूक हुई नहीं कि सीधे सांसारिक जाल में उलझना तय है। यह उलझन ही हमारे आध्यात्मिक मार्ग का सबसे बड़ा रोड़ा है। इससे निजात पाने के लिए हमें हर हालत में सतगुरु की आवश्यकता होती है। जिन्हें सतगुरु मिल गया, वह इस भवसागर से पार हो जाते हैं। जिन्हें सतगुरु नहीं मिले, वह बार-बार इसी भवसागर में डूबता-उतराता है, भटकता रहता है।

अशोक मिश्र

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