सूर्य की उपासना का अद्भुत पर्व है छठ

भारतीय जनजीवन की उत्सवधर्मिता विश्व में अन्यत्र दुर्लभ है। पश्चिम में तो यह संभव ही नहीं है।  यह सब कुछ संभव केवल भारत में हो सकता है, क्योंकि भारत एक सनातनी राष्ट्र है।

Created By : ashok on :30-10-2022 14:53:40 गिरीश पंकज खबर सुनें

गिरीश पंकज
भारतीय जनजीवन की उत्सवधर्मिता विश्व में अन्यत्र दुर्लभ है। पश्चिम में तो यह संभव ही नहीं है। यह सब कुछ संभव केवल भारत में हो सकता है, क्योंकि भारत एक सनातनी राष्ट्र है। इसकी अनेक परंपराएं आदिकाल से चली आ रही हैं। ठीक है कि बीच में ऐसा दौर भी आया, जब बाहर से आक्रांता आते गए, साथ में उनकी भी कुछ संस्कृति चली और यहां समरस भी होती चली गई लेकिन सनातन संस्कृति नष्ट नहीं हुई। तमाम आधुनिकताओं के बीच भी भारतीय संस्कृति अब तक अक्षुण्ण है और भविष्य में भी रहेगी। ठीक है कि आधुनिकता के माया जाल में फँस कर नई पीढ़ी अपनी ही संस्कृति से कटती चली जा रही है, लेकिन अभी करोड़ों लोग अपनी परंपरा और संस्कृति को प्यार करते हैं और समय-समय पर उसमें डूबकर अपने सांस्कृतिक बोध को जीवंत बनाए रखते हैं।

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भारतीय लोकमानस उत्सव में डूब कर अपनी सारी परेशानियों से मुक्त हो जाता है। जीवन के नाना झंझावातों में रहते हुए भी उत्सव सभी के मन को जीवंत बनाए रखता है। जैसे अभी छठ पर्व की धूम है। उसी की मैं बात करूं, तो यह एक ऐसी अद्भुत परंपरा है, जिसका दुनिया में कहीं कोई सानी नहीं। यह और बात है कि यह पर्व बिहार में धूमधाम से मनाया जाता है। लेकिन यह भी सच है कि बिहार में रहने वाले लोग जो दूसरे राज्यों में जाकर बसे, वहाँ भी उन्होंने इस पर्व को बरकरार रखा। हम कह सकते हैं कि बिहार की संस्कृति आप पूरे देश भर में 'विहार' कर रही है, क्योंकि लगभग पूरे देश में बिहारी बंधुओं ने अपनी शाखाओं का विस्तार किया है। इन पंक्तियों के लेखक का सौभाग्य रहा है कि उसने बिहार में आकर छठ पर्व के प्रति समाज की ललक को निकट से देखा। पटना से लेकर नालंदा तक जहां कहीं भी नजर जाती है, सड़कों पर महिलाओं की भीड़-ही-भीड़ दिखाई देती है। ये महिलाएं अपने बच्चों की लंबी उम्र की कामना के लिए छठ माई का पूजन-अर्चन करती हैं। इसी भावना को मैंने एक गीत में ढालने की कोशिश की, जो कुछ इस प्रकार है। देखें - छठ मैया की पावन-पूजा, करें सभी नर-नार। सूरज की लाली-सा चमके, उन सबका घर-बार। 'नहाय-खाय' है प्रथम दिवस, दूजे दिन 'खरना' आये। तीसरे दिन फिर सांध्य-रवि को, सब जन अरघ चढ़ाये। चौथे दिन जब उगा सूर्य तो, पारण का पल आये। सूर्य देवता सन्तानों पर, कृपा करें हर बार। छठ मैया की पावन पूजा, करें सभी नर- नार। करे निर्जला-व्रत नारी सब, होय मनोरथ सिद्ध। छठ माई की पूजा का फल, मिलता लोक-प्रसिद्ध । चार दिनों की कठिन साधना, फल दे सदा अपार। छठ मैया की पावन पूजा, करें सभी नर-नार। सूरज की लाली-सा चमके, उन सबका घर-बार।
उगते और डूबते सूर्य को भी नमन!


सबसे बड़ी बात यह है कि इस महापर्व के दौरान माताएं अपनी संतानों की दीर्घायु और सफलता की कामना के लिए छत्तीस घंटे का निर्जला उपवास रखती हैं। सूर्य की आराधना करती हंै। इस पर्व की एक महान विशेषता यह भी है कि इसमें सिर्फ उगते सूर्य को ही नमन नहीं किया जाता, डूबते सूर्य को भी प्रणाम किया जाता है। सूर्य का हमारे जीवन में क्या महत्व है, यह सब उस समय पता चलता है जब हम अंधेरे को देखकर व्याकुल हो जाते हैं और उजाले की कामना करते हैं। यह कामना पुराणों में वर्णित है, 'तमसो मा ज्योतिर्गमय।' सूर्य के महत्व को रेखांकित करने वाली मेरी कुछ काव्यात्मक पंक्तियां हैं, जो मैं यहां देना चाहता हूं : उगते ओ सूर्य तुमको, है मेरा शत-शत नमन। तुम सदा लड़ते हो तम से, और करते हो उजाला। देवता हो विश्व के तुम, हो हमारा इक शिवाला। तुम हमारे देव करते हो-सदा तम का दहन।

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उगते ओ सूर्य तुमको,
है मेरा शत-शत नमन । शक्ति के भंडार तुम हो ,
विश्व के तुम ही जनक। इस जगत की आत्मा तुम,
तेज हो तुम इक चमक। हर किरण तेरी अनोखी,
ताप जिसमें है गहन। उगते ओ सूर्य तुमको,
है मेरा शत-शत नमन। तुम पवनसुत के गुरु हो,
तुम धरा के प्राण हो। हर भयावह तिमिर में तुम,
हम सभी के त्राण हो। तुम कृपा हम पर करो,
सीमित रहे तेरी तपन। उगते ओ सूर्य तुमको,
है मेरा शत-शत नमन। अरुण हो, तुम भानु भी हो
मित्र औ आदित्य तुम। तुम ही मारिच, भास्कर भी,
वीर, निर्जर नित्य तुम। तुम हो उज्ज्वल तेजधारी,
तुम रहो सब पर प्रसन। उगते ओ सूर्य तुमको
है मेरा शत-शत नमन!

लेकिन डूबते सूरज को भी सदा प्रणाम करते हैं। सूरज से हम सब कहते हैं कि करके तुमने काम उत्तम,फिर किया प्रस्थान। दूसरे जग का भी तुमको है हमेशा ध्यान। तुम सदा चलते रहे, लेते नहीं विश्राम। है यही संदेश तेरा, काम सब मन से करो। है अगर अंधियार तो फिर, बढ़ के सारा तम हरो। आए हो गर इस धरा पर, होय बेहतर काम। डूबते सूरज को है मेरा, सदा परनाम। सूर्य और क्या करता है?' भेद से तुम दूर हो, सबको लुटाया प्यार। हम सभी जन मानते हैं, आपका आभार। आप जाएँ पर दुबारा, आएँगे इस धाम। डूबते सूरज को है मेरा, सदा परनाम।

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इस तरह से हम देखते हैं कि छठ पर्व में माताएं न केवल पुत्रों के लिए निर्जला उपवास रखती हैं वरन इसी बहाने सूर्य की आराधना भी करती हैं। सूर्य को हमारे यहां हनुमान जी का शिष्य माना गया है। मिथिला, मगध, भोजपुरी संस्कृति में रचा बसा छठ पर्व एक सन्देश भी देता है। परिवार को जोड़ता है। बच्चों को यह संस्कार देता है कि वह अपनी जड़ों से जुड़े रहें। जो मां बच्चे के स्वास्थ्य के लिए छत्तीस घंटे निर्जला रखती है, क्या कोई बेटा अपनी उस मां के उपकार को भूल सकता है? माताएं यह उपवास प्रतिवर्ष रखती हैं। मां के इस ऋण से कोई भी बेटा उऋण नहीं हो सकता।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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