सभ्य किंतु अमानवीय वर्ग समाज

हमारे देश में भूखे को खाना खिलाना और प्यासे को पानी पिलाना बड़ा पुण्य का काम माना गया है। आज से चार दशक पहले तक सड़कों के किनारे धनी लोग पौशाला खुलवाते थे।

Created By : ashok on :10-11-2022 14:48:19 अशोक मिश्र खबर सुनें

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र
हमारे देश में भूखे को खाना खिलाना और प्यासे को पानी पिलाना बड़ा पुण्य का काम माना गया है। आज से चार दशक पहले तक सड़कों के किनारे धनी लोग पौशाला खुलवाते थे। कुछ मंदिरों और धर्मशालाओं में गरीबों और असहायों के लिए खाने की व्यवस्था की जाती थी। सिख धर्म के महान गुरुओं ने तो लंगर की व्यवस्था शुरू की थी जो आज भी अबाध गति से जारी है। लंगर में जाति, धर्म, भाषा, संप्रदाय आदिका कोई भेद नहीं किया जाता है। जो भी गुरु के द्वारे पहुंच गया, उसका स्वागत है। वह सम्मान के साथ लंगर छकता है। गुरुद्वारे और कुछ मंदिरों को छोड़कर अब लोगों ने परमार्थ के काम से हाथ खींच लिया है।

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मनुषयों और पशु-पक्षियों के लिए चल रही पौशालाएं अब दिखाई नहीं देती हैं। सड़कों और मोहल्लों में जहां कहीं भी सरकारी नल लगे हुए थे, उन्हें भी या बिगाड़ दिया जाता है या फिर जल संस्थान से मिलीभगत करके उस नल की सप्लाई ही रोक दी जाती है। इसका कारण यह है कि जब लोगों को सरकारी नल का पानी मुफ्त में मिलता रहेगा, तो लोग पानी की बोतल या पाउच क्यों खरीदेंगे। रेलवे और बस स्टेशनों पर भी ऐसा ही किया जाता है ताकि जरूरतमंद व्यक्ति मजबूर होकर पानी खरीदकर पिए। बाजार ने मानवीय गुणों और मूल्यों में ह्रास पैदाकर दिया है। लोग सिर्फ बेचने और खरीदने की मशीन बनकर रह गए हैं। सिर्फ पैसा कमाने की होड़ में लोग इंसानियत से कोसो दूर होते चले जा रहे हैं। यह समाज भी तो सभ्य किंतु अमानवीय वर्ग समाज में तब्दील होता जा रहा है। जरूरत इस बात की है कि इसे मानवीय मानव समाज में बदलने की है। जिसमें सभी इंसान इंसान की तरह रह सकें और अपना जीवन यापन कर सकें।

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