चर्चित होने का साधन बन गया है विवादित बयान

हमारे देश में धर्म-कर्म, नैतिकता-मर्यादा, मान-सम्मान, आदर-सत्कार, परोपकार-शिष्टाचार, सरलता व मृदुभाषी होने आदि की जितनी ज्यादा बातें की जाती हैं, इन बातों का उतना ढिंढोरा दुनिया के और किसी देश में नहीं पीटा जाता।

Created By : ashok on :01-12-2022 14:37:54 निर्मल रानी खबर सुनें

निर्मल रानी
हमारे देश में धर्म-कर्म, नैतिकता-मर्यादा, मान-सम्मान, आदर-सत्कार, परोपकार-शिष्टाचार, सरलता व मृदुभाषी होने आदि की जितनी ज्यादा बातें की जाती हैं, इन बातों का उतना ढिंढोरा दुनिया के और किसी देश में नहीं पीटा जाता। जगह जगह होने वाले प्रवचन के आयोजनों में लाखों लोग शिरकत करते हैं। तमाम बड़े नेता अपने पद व प्रसिद्धि व नाम के अनुसार अच्छी खासी भीड़ जनसभाओं में इकट्ठी करते हैं। उधर देश की भोली भाली जनता कुछ अच्छी, ज्ञानवर्धक, संस्कारपूर्ण व सकारात्मक बातें सुनने के लिए वहां पहुंचकर उनके आयोजनों व सभाओं को सफल बना देती है। इसी भीड़ पर उन प्रवचन कर्ताओं व नेताओं को 'गर्व' भी होता है। वे बड़े फख्र से बयान भी करते हैं कि मेरे अमुक आयोजन में इतने लोग मुझे देखने सुनने आये। वे इसी भीड़ को अपने अनुयाइयों व समर्थकों की भीड़ भी बता डालते हैं। तो क्या जनता को उसकी उपस्थिति के बदले में कुछ सकारात्मक सुनने को भी मिलता है? क्या वे इन्हें कुछ ज्ञान अथवा मार्गदर्शन भी देकर जाते हैं? जो बच्चे अपने अभिभावकों के साथ उनकी बातें सुनने आते हैं, क्या उन्हें कुछ ऐसा ज्ञान प्राप्त होता है जो उनके भविष्य निर्माण में सहायक साबित हो? क्या युवाओं को इनके भाषणों व प्रवचनों से मर्यादा व नैतिकता का कुछ सबक सीखने को मिलता है?

ये भी पढ़ें

समस्या का कारण जानो, तब सुलझाओ


वास्तविकता तो यही है कि जैसे जैसे हमारे देश के 'विश्व गुरु' होने के दावों को जोर शोर से प्रचारित किया जा रहा है और इसे हवा दी जा रही है, उसी तेजी से शीर्ष स्तर के तथाकथित 'विशिष्ट ' लोगों द्वारा अपने बेतुके, अनैतिक, निरर्थक, गैर जिम्मेदाराना यहां तक कि 'विष वमन ' करने वाले बयानों की गोया बौछार सी की जाने लगी है। अनेक तथाकथित 'विशिष्ट' लोग अपने अनुयाइयों व समर्थकों के बीच ऐसी बेहूदी बातें बोलने लगे हैं, जो उनके पद व उसकी गरिमा के कतई अनुरूप नहीं होती। ऐसे में यह सोचना स्वभाविक हो जाता है कि क्या अमुक व्यक्ति इस योग्य था कि उसी अमुक उच्च पद अथवा रुतबे तक जनता द्वारा पहुँचाया जाता? कहीं उसके समर्थकों व अनुयायियों को धोखा तो नहीं हो गया? क्या उन्होंने किसी बदजुबान, अमर्यादित व भड़काऊ व्यक्ति के साथ खड़े होकर व उसे समर्थन देकर, उस पर विश्वास कर गलती की?


महाराष्ट्र के ठाणे में गत दिनों एक योग प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित हुआ था। इसमें बाबा रामदेव ने औरतों के कपड़ों को लेकर निहायत बेहूदी व अमर्यादित टिप्पणी कर डाली। उन्होंने कहा कि औरतें साड़ी में अच्छी लगती हैं। वे सूट-सलवार में अच्छी लगती हैं और मेरा विचार है कि अगर वह कुछ न पहने तो बिना कपड़ों के भी अच्छी लगती हैं। उनकी इस टिप्पणी के समय मंच पर उनके साथ सत्ता के कई प्रमुख नेताओं के पुरुष-महिला परिजन भी मौजूद थे। रामदेव की इस आपत्तिजनक टिप्पणी का भारी विरोध हो रहा है। कुछ लोगों ने बाबा रामदेव से अपने बयान के लिए देश से माफी मांगने को कहा है। कुछ ने उनके सामाजिक बहिष्कार की अपील की जबकि कई लोगों ने रामदेव के इस बयान को उनकी कामुकता व पितृसत्ता का प्रतीक बताया। उनके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की मांग की। सोशल मीडिया पर अनेक लोग बाबा रामदेव को जून 2011 की वह घड़ी याद दिला रहे हैं, जब रामदेव प्रात:काल राम लीला ग्राउंड से महिला के ही लिबास, शलवार सूट में भागते हुए पकड़े गए थे। उस समय उन्होंने महिला के दुपट्टे से अपनी दाढ़ी छिपा रखी थी। तब महिलाओं के लिबास ने ही इनको 'रण छोड़ कर' भागने में मदद की थी। हालांकि महिलाओं पर अपनी अभद्र टिप्पणी के मात्र 72 घंटे के भीतर ही चतुर रामदेव ने खेद व्यक्त किया है और अपनी टिप्पणी के लिए माफी भी मांगी।

ये भी पढ़ें

कुप्रथाओं के मूल में है अज्ञान


कुछ समय पूर्व हरियाणा के करनाल में एक पत्रकार ने रामदेव से पेट्रोल-डीजल के बढ़ रहे दामों पर इन्हीं का पूर्व में दिया गया बयान याद दिलाते हुए सवाल पूछा तो उन्होंने गुस्से में पत्रकार से कहा कि तेरे सवाल का जवाब नहीं देता, पूंछ पाड़ेगा मेरी'? आगे कहा, तेरे प्रश्न बहुत हो गए। तू अब चुप हो जा और हां मैंने ऐसा कहा था अब क्या पूंछ पाड़ेगा मेरी? इस तरह के न जाने कितने घटिया किस्म के बोल कभी महिलाओं व उनके पहनावे को लेकर, कभी एलोपैथिक व वैक्सीन आदि की विश्वसनीयता को लेकर यह देते रहे हैं। आश्चर्य है कि स्वयं को योगाचार्य व संन्यासी बताने वाले रामदेव अपनी भाषा की मर्यादा की व गरिमा बनाए नहीं रख पाते? असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जिन्होंने कांग्रेस से राजनीति का ‘क ख ग’ तो जरूर सीखा। परन्तु भाजपा में जाने के बाद अपनी वफादारी साबित कर मुख्यमंत्री पद पर कायम रहने की जद्दोजहद में उसी नेहरू-गाँधी परिवार के विरुद्ध अनाप शनाप बोलकर सुर्खियां बटोरते रहते हैं। भाजपा में गए ऐसे कई नए नवेले भाजपाई हैं जिनके लिए अपनी वफादारी सिद्ध करने का यही एकमात्र माध्यम रह गया है। गत दिनों गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने राहुल गांधी के चेहरे की तुलना सद्दाम हुसैन से कर साम्प्रदायिक कार्ड खेलने का घिनौना प्रयास किया। मुख्यमंत्री पद पर बैठा व्यक्ति इतनी हल्की व तुच्छ टिपण्णी करेगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह देश का दुर्भाग्य व राजनीति के गिरते स्तर की इंतेहा है कि ऐसा व्यक्ति देश के प्रमुख राज्य का मुख्यमंत्री होते हुए अपने ही पूर्व 'आका ' के लिए ऐसा छिछोरा बयान दे रहा है? दुर्भाग्यवश अमर्यादित व गैर जिम्मेदाराना भाषाओं का खेल देश के सर्वोच्च स्तर पर खेला जा रहा है। धर्म, जाति, लिंग विशेष के लोगों को निशाना बनाना उन्हें अपमानित करना गोया एक चलन सा बन चुका है। और चूंकि सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग या तो स्वयं इस नकारात्मक प्रवृति में भागीदार हैं अथवा उनका संरक्षण प्राप्त है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

Share On