दीदी का दिल मांगे चंडीगढ़

सूबे में मंत्री मंड़ल विस्तार की चर्चाएं यदा कदा चलती रहती हैं। खासकर जब-जब मुखिया जी दिल्ली की तरफ आते हैं तो इन चर्चाओं को मनोहर पंख लग जाते हैं, तो वहीं माननीयों का भी दिल हिलोरे मारने लग जाता है तथा वे येन केन प्रकरेण मुखिया जी तक अपनी बात पहुंचाने की कुवत में जुट जाते हैं।

Created By : Pradeep on :20-11-2021 21:56:12 खबर सुनें

सूबे में मंत्री मंड़ल विस्तार की चर्चाएं यदा कदा चलती रहती हैं। खासकर जब-जब मुखिया जी दिल्ली की तरफ आते हैं तो इन चर्चाओं को मनोहर पंख लग जाते हैं, तो वहीं माननीयों का भी दिल हिलोरे मारने लग जाता है तथा वे येन केन प्रकरेण मुखिया जी तक अपनी बात पहुंचाने की कुवत में जुट जाते हैं। पिछले सप्ताह मुखिया पटौदी के आश्रम हरि मंदिर के संचालक महा मंड़लेश्वर स्वामी धर्मदेव के जन्मदिन समारोह में पहुंचे। मंच से पटौदी के विधायक सत्य प्रकाश जरावता ने बडख़ल की विधायक दीदी (सीमा त्रिखा) को महिमा मंडि़त करते हुए उनका ध्यान रखने के लिए कहा। जरावता जी के बाद स्वामी जी बोले तो उन्होंने भी मुखिया जी से सिफारिश करते हुए कहा कि वे बड़ी मेहनत से दीदी को विधायक बनवा कर लाए थे, तो दीदी के साथ-साथ उनका ध्यान भी रखें। अब जब मुखिया जी मंच पर आए तो उन्होंने दीदी से पूछा की वो क्या चाहती हैं तो दीदी ने मंच से बैठे-बैठे ही कहा चंडीगढ़ खैर दीदी के मन की मुराद पूरी होगी या नहीं ये तो आने वाला समय बताएगा लेकिन नेता जी की सहमति के बिना यह लगता तो मुश्किल है। वैसे दीदी को इस तरफ भी ध्यान देना होगा कि उनके क्षेत्र की जनता जैसे नाराज गी जता रही है कहीं वह अगली बार माननीय चुने जाने में भी बाधा न बन जाए।

पलवल वालों को भी है राज में भागीदारी की चाह
सूबे की मनोहर सरकार पार्ट-2 को दो वर्ष हो गए हैं, तथा बृज नगरी में शामिल पलवल जिले के माननीयों (विधायकों)की राज में भागीदारी की उम्मीदें भी लगातार बाट जोह रही हैं। सरकार के तीसरे साल में जिले के तीनों माननीय डिंपल बाबू, नायर साहब तथा प्रवीण बाबू के समर्थक चंड़ीगढ़ के सचिवालय में अपने नेताओं के दफ्तर की राह तलाश रहे हैं। उनकी उम्मीदें परवान चढ़ती हैं या नहीं, यह तो समय बताएगा पर वैसे पलवल वालों का उम्मीद करना कोई बेवजह भी नहीं है। इस की सबसे बड़ी वजह यह है कि लोग मानते हैं कि विपरीत हालात में उन्होंने जिले में लहलहा कर कमल की खेती की, जबकि सूबे के कई हिस्सों में कमल पूरीतरह से मुरझा गया था। हालांकि वैसे तो होडल के माननीय नायर साहब को चेयरमैन के रूपमें राज में भागीदारी तो मिली है, लेकिन इससे न तो जिले के लोग कोई बड़ा तोहफ ा मानते हैं तथा न ही सूबे की सरकार में मंत्री रह चुके नायर साहब। अब जबकि मंत्रीमंडल के विस्तार की चर्चाएं एकबार फिर तेज हैं तो माननीयों के साथ-साथ उनके झंड़ाबरदारों की की उम्मीदें भी बढऩे लगी हैं। वैसे जिले के लोगों को मनोहर पार्ट-1 का वह कार्यकाल अब भी याद है जब डिंपल बाबू का चंड़ीगढ़ में सचिवालय में दफ्तर हुआ करता था तथा सचिवालय व मुखिया जी के आवास में बृजनगरी की खनक सुनाई पड़ती थी।

नेता जी बोले, मैं तो सबको साथ लेकर चलता हूं
सूबे के मुखिया जी 18 नवंबर को देश भर के पहले श्री विश्वकर्मा कौशल विश्वविद्यालय के तीसरे स्थापना दिवस समारोह में पहुंचे। विश्वविद्यालय ने भव्य आयोजन किया था तथा मंच को भी भव्यता दी गई थी, लेकिन संसदमें फरीदाबाद-पलवल के प्रतिनिधि नेता जी (कृष्णपाल गुर्जर) की गैर मौजूदगी पंड़ाल में मौजूद लोगों को खल रही थी। हालांकि आयोजकों ने मंच पर नेता जी की फोटो तोल गाया था, लेकिन वैसे निमंत्रण पत्र नेता जी का नाम नहीं था। सियासी लोग इसके अलग-अलग मायने भी निकाल रहे थे, तथा पंड़ाल में भी इस पर चचाज़् चली। वैसे कुछ लोग इसके पीछे पृथला के नयनतारा के नेता जी के साथ संबंधों को भी लेकर जोड़ रहे थे। खैर उसी शाम को फरीदाबाद में संघ के एक बड़े पदाधिकारी रहे मिश्रा जी के परिवार में शादी के जश्न जिसमें कई नेता शामिल थे, में विश्वविद्यालय के उपकुलपति के समक्ष नेता जी ने अपनी नाराजगी जता दी। नेता जी ने नाराजगी जताते हुए कहा कि इस प्रकार का रवैया नाकाबिले बर्दाश्त है। वैसे नेता जी यह कहते हुए अपने बड़प्पन का संदेश भी दे गए कि वे तो सबको साथ लेकर चलते हैं। खैर राजनीति अपनी जगह लेकिन स्थानीय सांसद का किसी कार्यक्रम में मौजूद ना होना, वह भी क्षेत्र में रहते हुएखलता तो है।

खाकी वालों की भी मुश्किलें हुई आसान
प्रधानमंत्री जी ने 19 नवंबर को तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का एलान कर एक वर्ष से चल रहे किसान आंदोलन के समापन की इबारत लिख दी जिसका चहुं और स्वागत भी हुआ। स्वागत सभी ने कियाचाहे वह सत्ताधारी थे या विरोधी सियासी दल। हां, इतना जरूर हुआ कि विपक्षी सियासी दलों ने इसे सरकार का मजबूरी वाला कदम बताया तथा अपने व किसानों के संघर्ष की जीतबताया। वैसे एक बात तो यहां सिद्ध हो गई कि संघर्ष सदा विजयी की कहावत कोई यूंही नहीं दी जाती। खैर कोई किसी भी मन से करे, प्रधानमंत्री के कदम का स्वागत सभी कर रहे हैं। स्वागत करने वालों में जहां हलधर शामिल हैं तो खादी वाले (राजनीतिक दलोंके प्रतिनिधि) भी। वैसे इस खुशी में खाकी वाले (पुलिस) भी बराबर शरीक हैं, क्योंकि असली इम्तहान तो एक वर्ष से खाकी वालों का ही चल रहा था। एक तरफ जहां धरती पुत्रों को साधना, वहीं कुछ जिद्दी नेताओं के बिगडैल बोलों से खराब होते रहे माहौल को ठीक बनाने की कवायद करना। खाकी के एक बड़े अधिकारी ने तो खुशी जताते हुए यहां तक कह दिया कि कम से कम अब वो भी चैन से उठ-बैठ तो सकेंगे।

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