सब का हो संरक्षण इसलिए जरूरी आरक्षण

अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग को मिलने वाले आरक्षण के मुद्दे को लेकर कुछ लोग शुरू से नाक-भौं सिकोड़ते रहे हैं। खासकर सामान्य वर्ग के चंद लोग।

Created By : ashok on :27-11-2022 14:55:25 गिरीश पंकज खबर सुनें

गिरीश पंकज
अनुसूचित जाति, जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग को मिलने वाले आरक्षण के मुद्दे को लेकर कुछ लोग शुरू से नाक-भौं सिकोड़ते रहे हैं। खासकर सामान्य वर्ग के चंद लोग। उनका तर्क यही रहता रहा है कि अनुसूचित जाति और जनजातियों को आरक्षण योग्यता और आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाना चाहिए। बचपन में मैं भी ऐसा ही सोचा करता था। आदिवासियों को कुछ लोग सरकारी दामाद कहा करते थे। यह सोच का दिवालियापन था। लेकिन बाद में मुझे भी जब ज्ञान आया तो लगा, यह व्यवस्था तो सामाजिक न्याय की दृष्टि से गलत नहीं, बिल्कुल सही है। जो लोग किसी कारण प्रगति पथ पर पीछे रह गए, उनको भी आगे आने का अधिकार है। यह समाज का ही दायित्व है कि कमजोरों की मदद करे। उनको उनके अधिकारों से वंचित करना अन्याय होगा। आरक्षण विरोधी अकसर यह भूल जाते हैं कि वन प्रान्तर, ग्रामीण तथा शहरी परिवेश में रहने वाले लोगों के जनजीवन में काफी अंतर होता है। सुदूर वन क्षेत्रों में रहने वाले बच्चे या व्यक्ति शहरी क्षेत्र में रहने वाले व्यक्ति के मुकाबले कम सुविधाएं प्राप्त कर पाते हैं। शहरी बच्चे शानदार स्कूलों में पढ़ाई करते हैं, तमाम तरह की आधुनिक सुविधाओं से लैस रहते हैं और आज भी वनवासी बच्चे टूटे-फूटे भवनों के सरकारी स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करते हैं।

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स्वाभाविक है कि दोनों क्षेत्रों के बच्चों में कुछ तो मानसिक या कहें कि शैक्षणिक अंतर होगा। हालांकि ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों की प्रतिभाएं भी कम नहीं होती। वे कला, संगीत और खेल आदि के क्षेत्र में माहिर होते हैं। शिक्षा के मामले में तो यह स्थिति बिल्कुल साफ है कि उनको बेहतर शिक्षा नहीं मिल पाती। इसीलिए आदिवासी एवं अन्य पिछड़ी जातियों के बंधुओं को आरक्षण का लाभ देने का निर्णय किया गया। पर्याप्त सुविधाएं प्राप्त बच्चों के मुकाबले अल्प सुविधाओं में जीने वाले बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए आरक्षण तो देना ही चाहिए था। पिछड़ी जातियां विकास क्रम में निरन्तर पिछड़ती गईं इसलिए उनको भी आगे बढ़ाना जरूरी था क्योंकि वे सब सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी पिछड़ी हुई थी। वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा। शायद भविष्य में भी जारी रहे। लेकिन फिर यह मांग भी उठती रही कि सवर्ण निर्धनों को भी आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलना चाहिए, क्योंकि उनमें भी लाखों लोग ऐसे हैं, जो आर्थिक दृष्टि से बेहद कमजोर हैं। आज भी अनेक ब्राह्मण या अन्य जातियों के लोग आर्थिक कारणों से बेहद पिछड़े हुए हैं। उनको नौकरी नहीं मिलती। चाहे वह सामाजिक दृष्टि से हो या भौतिक दृष्टि से, अभाव जनित कुंठा के कारण वैमनस्य का भाव पनपने लगता है।


निर्धन सवर्णों ने कोई गुनाह नहीं किया। इनकी भी सुध ली जानी चाहिए। यह मांग वर्षों से उठती रही। अंतत: केंद्र सरकार के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी मुहर लगाई कि सामान्य वर्ग के निर्धनों को भी आरक्षण मिले, भले ही वह दस प्रतिशत ही क्यों न हो। सरकार के इस निर्णय से आर्थिक दृष्टि से कमजोर रहे सामान्य वर्ग के लोग खुश हुए। हालांकि इसके लिए सरकार ने कुछ मानदण्ड भी निर्धारित किए हैं। अब कुछ राजनीतिक दल इस निर्णय का विरोध कर रहे हैं, लेकिन जो विरोध कर रहे हैं। हद है कि वे सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर कर चुके हैं। हालाँकि उससे होगा कुछ नहीं, लेकिन याचिकाकर्ता तथा विरोध करने वाले राजनीतिक दल अनजाने में यह समझ नहीं पा रहे हैं कि अपना कितना अहित कर रहे हैं। वे सीधे-सीधे दस प्रतिशत सामान्य वर्ग के लोगों को नाराज भी कर रहे हैं, जो उनके वोटर भी हैं ।

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आर्थिक आधार महत्वपूर्ण
निजी तौर पर मेरा अपना मानना है कि आजादी के पचहत्तर वर्ष बीतने के बाद अब आरक्षण का आधार जाति या धर्म बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। धर्म तो कतई नहीं। आरक्षण में केवल आर्थिक आधार ही देखना चाहिए। जो आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं, उन्हें आरक्षण का लाभ मिले। हां, अनुसूचित जनजाति के लोगों को अभी आरक्षण का लाभ निरंतर प्राप्त होना चाहिए। जब तक वे पूरी तरह से सुविधापूर्ण और सक्षम न हो जाएँ। इनमें जो आरक्षण का लाभ प्राप्त करके ऊँचे-ऊँचे पदों पर पहुँच चुके हैं और जिनके बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल रही है, यानी जो क्रीमीलेयर में आ चुके हैं, उनको प्रमोशन आदि में आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। धीरे-धीरे हम ऐसा समाज विकसित करें कि देश में चतुर्दिक समृद्धि आ जाए और भविष्य में आरक्षण की आवश्यकता ही न पड़े। और अगर वर्तमान परिवेश में आरक्षण दिया जा रहा है, वह तो न्याय-संगत होना चाहिए।


जिनको जरूरत है, उन्हें उसका लाभ मिलना चाहिए। इसलिए चाहे वह वोट की राजनीति के लिए हुआ हो, दस प्रतिशत सामान्य निर्धनों को आरक्षण का लाभ देने का निर्णय सराहनीय कदम है। इस निर्णय का आरक्षण प्राप्त वर्ग भी स्वागत करे। उन्हें भी यह बात स्वीकार करनी चाहिए कि समाज में ऐसे लाखों लोग हैं, जो सवर्ण तो हैं, मगर अनेक सुविधाओं से वंचित है। कुछ इतने गरीब हैं कि अच्छे स्कूल में पढ़ नहीं पाते। बेहतर खान-पान भी उनके नसीब में नहीं। यही कारण है कि ऐसे लोग प्रतियोगी परीक्षाओं में पीछे रह जाते हैं। ऐसे दस प्रतिशत सवर्णों को आरक्षण का लाभ देना न्याय संगत निर्णय कहा जाएगा। इसका जो विरोध करे, उनसे पूछना चाहिए कि वे आखिर अपने समाज के एक कमजोर वर्ग के प्रति अन्याय क्यों कर रहे हैं? सवर्ण होना कोई अपराध नहीं। हर निर्धन को सुविधाएं प्राप्त करने का प्राकृतिक अधिकार है। चाहे वह किसी भी धर्म-जाति और वर्ग का क्यों न हो। सबका रक्षण जरूरी है। तभी आरक्षण न्यायपूर्ण कहलाएगा।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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