दलों से ज्यादा निर्दलीयों पर जताया भरोसा

हरियाणा में जिला परिषद और पंचायत समितियों के चुनाव में भाजपा को काफी करारा झटका लगा है। उसके सिर्फ 21 प्रतिशत ही उम्मीदवारों को सफलता मिली है। अंबाला, गुरुग्राम, पानीपत और रेवाड़ी में भाजपा का प्रदर्शन काफी लचर रहा है।

Created By : ashok on :29-11-2022 15:07:24 संजय मग्गू खबर सुनें

संजय मग्गू
हरियाणा में जिला परिषद और पंचायत समितियों के चुनाव में भाजपा को काफी करारा झटका लगा है। उसके सिर्फ 21 प्रतिशत ही उम्मीदवारों को सफलता मिली है। अंबाला, गुरुग्राम, पानीपत और रेवाड़ी में भाजपा का प्रदर्शन काफी लचर रहा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि 22 जिला परिषदों की 411 सीटों में से 357 पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने सफलता प्राप्त की है। भाजपा को सिर्फ 22 सीटों, इनेलो को 13, आप को 15 और बसपा को 4 सीटों पर सफलता मिलने का मतलब यही है कि अब मतदाता चाहे ग्रामीण हों या शहरी, उनका राजनीतिक दलों से मोह भंग हो रहा है। वे अब राजनीतिक दलों के लंबे-चौड़े वायदों से ऊब चुके हैं।

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उन्हें अब इन दलों पर रत्तीभर भी विश्वास नहीं रह गया है। अगर कोई राष्ट्रीय कही जाने वाली पार्टी के उम्मीदवार 411 सीटों में से सिर्फ 22 पर ही अपनी सफलता का परचम लहरा सकें, तो इसे क्या कहा जाएगा। वैसे भाजपा ने सात जिलों में 102 सीटों पर पार्टी सिंबल पर चुनाव लड़ा था, लेकिन सफलता केवल 22 सीटों पर ही मिली। जिला परिषद और पंचायत समितियों के चुनाव कांग्रेस ने अपने सिंबल पर नहीं लड़ा था। उसने अपने उम्मीदवारों को निर्दलीय के रूप में उतारा था। अब इन निर्दलीयों को लेकर भाजपा, कांग्रेस और अन्य दलों ने अपनी-अपनी दावेदारी पेश करनी शुरू कर दी है। निर्दलीयों को लेकर पेश की जा रही दावेदारी से भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है कि कौन किस पार्टी से जुड़ा हुआ है, यह साफ नहीं हो पा रहा है। जिला परिषद और पंचायत समितियों के चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि इस बार का चुनाव पर स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ महंगाई, बेरोजगारी, नशाखोरी, अपराध जैसे मुद्दे हावी रहे।

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राजनीतिक दलों ने चुनाव के दौरान जो वायदे किए, कसमें खाईं, मतदाताओं ने उसे नकार दिया है। राजनीतिक दलों की जगह उन्होंने उन लोगों पर भरोसा जताया है जो किसी भी दल से जुड़े नहीं थे। यह उन राजनीतिक दलों के लिए एक संकेत हो, जो किसी चेहरे को आगे करके चुनाव जीतने के आदी रहे हैं। अब लोग काम को प्रमुखता देने लगे हैं। उनके लिए चेहरा कोई मायने नहीं रखता है। यदि आज चुने गए निर्दलीयों ने मतदाताओं की इच्छा के अनुरूप कार्य नहीं किया, तो अगली बार मतदाता उन्हें भी दरकिनार करने में देरी नहीं लगाएंगे। इस चुनाव परिणाम से राजनीतिक दलों को सबक लेना चाहिए।

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