कैंसर की नकली दवाएं बेखबर स्थानीय प्रशासन

उफ! इतनी लापरवाही। सोनीपत के गन्नौर में पिछले कई सालों से फूड सप्लीमेंट के नाम पर कैंसर रोग की नकली दवाइयां बनाई जाती रहीं और खाद्य विभाग से लेकर चिकित्सा विभाग और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को भनक तक नहीं लगी। लापरवाही की हद होती है।

Created By : ashok on :17-11-2022 14:46:47 संजय मग्गू खबर सुनें

संजय मग्गू
उफ! इतनी लापरवाही। सोनीपत के गन्नौर में पिछले कई सालों से फूड सप्लीमेंट के नाम पर कैंसर रोग की नकली दवाइयां बनाई जाती रहीं और खाद्य विभाग से लेकर चिकित्सा विभाग और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों को भनक तक नहीं लगी। लापरवाही की हद होती है। जब आरोपियों ने वर्ष 2016 में फूड सप्लीमेंट बनाने के नाम पर लाइसेंस लिया, तब न तो स्थानीय अधिकारियों और न ही फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन ने फैक्ट्री तक जाकर यह देखने की जहमत नहीं की कि वहां फूड सप्लीमेंट ही बनता है या कुछ और। इतना ही नहीं, जब 2020 में देसी दवा बनाने का लाइसेंस लिया गया, तब भी राज्य आयुर्वेदिक प्राधिकारी ने ही फैक्ट्री का निरीक्षण करने की जरूरत समझी।

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एक लंबे समय तक फूड सप्लीमेंट के नाम पर कैंसर की नकली दवाएं बाजार में बिकती रही और केंद्र के साथ-साथ प्रदेश के अधिकारी-कर्मचारी सोते रहे। हालांकि इस मामले में सात आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं जो कैंसर की नकली दवाएं भारत में तो बेचते ही थे, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, चीन समेत एशिया के कई देशों में भेजते थे। इनका एक लंबा-चौड़ा नेटवर्क था जिसके सहारे वे करोड़ों रुपये की नकली दवाइयां बेच चुके थे। सोनीपत के गन्नौर में जितनी कैंसर की नकली दवाइयां बरामद की गई हैं, उनका मूल्य करोड़ों रुपये बताया जा रहा है। जिस रोग की नकली दवा आरोपी बनाकर बेच रहे थे, वह रोग सबसे खतरनाक माना जाता है। कैंसर के रोगी के लिए हर दवा का बहुत बड़ा महत्व है। कैंसर जितनी तेजी से फैलता है, उससे इसकी भयानकता का अंदाजा लगाया जा सकता है और ये नराधम ऐसे रोगियों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे थे।

यह मानवता के प्रति किया गया सबसे बड़ा अपराध है। जब कोई व्यक्ति किसी रोग से पीड़ित होता है, तो उसके लिए पृथ्वी पर भगवान के रूप में डाक्टर ही होता है। दवाएं उसके लिए जीवन रक्षक होती हैं। जब यही दवाएं जीवन भक्षक बन जाएं और पृथ्वी का भगवान नरपिशाच, तो ऐसे में मरीज किस पर विश्वास करें। नकली दवाओं के इस कारोबार में कुछ पृथ्वी के भगवान यानी डॉक्टर भी शामिल थे। सबसे ज्यादा अफसोस की बात यही है कि जिसे जीवन बचाना था, वही मरीज की जान लेने पर ऊतारू हो गया था।

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