भागदौड़ भरी जिंदगी में स्वस्थ रहने के चार मंत्र

बुजुर्गों की संगत में निश्चित ही इनसान कुछ-न-कुछ रोज सीखता है। इन दिनों वर्षों के बाद मुझे भी मेरे दादाजी वैद्य पंडित श्री श्याम बिहारी जोशी के साथ बैठने-सीखने का सुखद सानिध्य मिल रहा है। यह मेरा परम सौभाग्य भी है कि मैं उनकी पौत्री हूँ।

Created By : ashok on :03-12-2022 15:26:17 डॉ. योगिता जोशी खबर सुनें

डॉ. योगिता जोशी
बुजुर्गों की संगत में निश्चित ही इनसान कुछ-न-कुछ रोज सीखता है। इन दिनों वर्षों के बाद मुझे भी मेरे दादाजी वैद्य पंडित श्री श्याम बिहारी जोशी के साथ बैठने-सीखने का सुखद सानिध्य मिल रहा है। यह मेरा परम सौभाग्य भी है कि मैं उनकी पौत्री हूँ। उनके साथ बैठते-बैठते अनायास ही जीवन की बहुत गूढ़ सीख मिल जाती है। उनके कई अनुभव आगे के लिए प्रेरणा बन जाते हैं और मन में उत्साह भर देते हैं। उनका 'ठीक है' कहना भी अपने भीतर के भरोसे को मजबूत कर देता है। कल यों ही कफ, वात एवं पित्त की समस्याओं पर चर्चा हो रही थी, जिसका सार मुझे लगा कि यह तो सभी के जीवन के लिए बहुत उपयोगी है इसलिए आप सभी से साझा करना ही चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार हमारे शरीर में तीन दोष पाए जाते हैं। इन्हें त्रिदोष भी कहा जाता है।

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निरोगी काया के लिए हमें इन तीनों में संतुलन बनाए रखना होता है। माना जाता है कि कफ के बिगड़ने से 28 रोग, वात के बिगड़ने से 80 रोग एवं पित्त के बिगड़ने से लगभग 46 से 50 रोग होते हैं। और जब एक साथ इन तीनों का संतुलन बिगड़ जाए तो 148 रोग हो जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य वागभट्ट ने अपनी पुस्तक अष्टांग हृदयम एवं अष्टांग संग्रहम में स्वस्थ जीवन के लगभग 7000 नियम बताए हैं, जिनमें से चार मूल मंत्र हैं, जो हम सबके लिए बहुत जरूरी हैं। इन चारों नियमों का पालन करने से हमारे शरीर में कफ, वात एवं पित्त का संतुलन बना रहता है।


आज इस भागदौड़ वाले मशीनी जीवन में इनसान के पास सबसे कम समय यदि है, तो वह है स्वयं के स्वास्थ्य के लिए। जो देखा जाए तो सबसे जरूरी है। हर कोई चाहता है कि वह सुखी रहे, निरोगी रहे। चाहते सभी हैं, पर करते कुछ एक ही है, एवं जो करते हैं, वे निश्चित ही फल भी पाते हैं। सभी योग गुरु भी इन्हें अपनाते हैं। बहुत छोटे-छोटे, आसान से, निहायती सस्ते उपाय हैं, जिन्हें अपनाकर सभी निरोगी काया का सुख प्राप्त कर सकते हैं। और यह सारे नियम पंचतत्व में से एक तत्व पानी पर केंद्रित हैं। ये चार उपाय निम्न प्रकार हैं।

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खाना खाते ही तुरंत पानी नहीं पीना चाहिए : आयुर्वेद में कहा गया है कि खाना खाने के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए। यदि बहुत जरूरी हो पीना तो ताजा फलों के रस, लस्सी, मट्ठा या शिकंजी आदि पी जा सकते हैं। कहा जाता है कि भोजन के अंत में पानी पीना जहर के समान होता है। सुबह-सुबह नाश्ते के बाद फलों का रस, दोपहर में खाने के बाद लस्सी या मट्ठा और रात को खाने के बाद दूध पीना श्रेष्ठकर होता है। इससे हमें वात की समस्या कभी नहीं होगी। हम अस्सी रोगों से बच जाएँगे।


घूँट-घूँट करके पानी पीना: हमारी आदत में शुमार है कि खड़े-खड़े बोतल से पानी सीधा गले में डाल लेते हैं। एक गिलास पानी लिया और एक साँस में गटक गए, परंतु यह बहुत गलत तरीका है पानी पीने का। हमें पानी भी गर्म दूध या चाय की तरह ही घूँट-घूँट करके पीना चाहिए। इस तरह पानी पीने से मुँह की लार पानी के साथ अंदर चली जाती है। जितनी ज्यादा घूँट पीएँगे, उतनी ही ज्यादा लार हमारे पेट में चली जाएगी। यह मुँह की लार क्षारीय होती है और पेट के अंदर अम्ल जमा होता रहता है। पेट के अंदर का अम्ल एवं क्षारीय लार के मिल जाने से पेट में अम्लता की शिकायत नहीं होती है, जिससे हमें पित्त की समस्या नहीं होती और हम छियालीस रोगों से बच जाते हैं।
ठंडा पानी नहीं पीना चाहिए: बर्फ वाला या फ्रिज का पानी हमें कभी भी नहीं पीना चाहिए। हमें कभी अपने पेट के तापमान से नीचे के तापमान का पानी नहीं पीना चाहिए क्योंकि हमारा शरीर तो गर्म होता है। इससे ठंडा पानी और पेट के अंदर के तापमान में विरोध शुरू हो जाता है एवं कफ, वात, पित्त का संतुलन बिगड़ जाता है। बहुत ज्यादा होने पर मटके में रखा पानी पीया जा सकता है।

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सुबह उठते ही सबसे पहले पानी पीना: उठते ही सबसे पहले दो-तीन गिलास पानी पीना चाहिए। ऐसा करने से पेट आसानी से साफ हो जाता है एवं रात भर से मुँह में जमी लार भी पेट में पानी के साथ अंदर चली जाती है। सुबह-सुबह पेट में एसिड भी ज्यादा होती है। पानी पीने से वह भी नियंत्रित हो जाती है एवं पानी से पेट की बड़ी आंत की सफाई भी हो जाती है। जिनका पेट सुबह-सुबह साफ हो जाता है, उनके जीवन में कभी कोई रोग नहीं हो सकता। जो व्यक्ति इन चारों नियमों का पालन करता है, वह कफ, वात एवं पित्त में संतुलन बनाए रखता है।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं।)

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