गांधी दौलत देश की दोहों में गांधी दर्शन

हिंदी व्याकरण के अनुसार छाँदिक सौंदर्य शास्त्र व अनुशासन पर इन पंक्तियों को परखें तो न सिर्फ़ यह बल्कि मेरी जानकारी में समस्त दोहे सभी कसौटियों पर खरे प्रतीत होते हैं।

Created By : ashok on :15-11-2021 14:39:34 खबर सुनें


ब्रजेश कानूनगो
लाठी को अपना लिया, बिसरा दिए विचार।
गांधी के घर कर रही, हिंसा फिर अधिकार।।
ये पंक्तियां कवि, व्यंग्यकार व दोहाकार ओम वर्मा की हैं जो उनकी सद्य प्रकाशित कृति 'गांधी दौलत देश कीÓ से उद्धृत की गई हैं। हिंदी व्याकरण के अनुसार छाँदिक सौंदर्य शास्त्र व अनुशासन पर इन पंक्तियों को परखें तो न सिर्फ़ यह बल्कि मेरी जानकारी में समस्त दोहे सभी कसौटियों पर खरे प्रतीत होते हैं। ओम वर्मा एक कुशल दोहाकार हैं जिन्होंने यह खण्ड काव्य दोहा विधा में रचकर बहुत श्रम साध्य कार्य किया है।
वर्तमान समय में वैसे ही साहित्य हाशिए पर आ गया है। और जब बात कविता की हो तो वहाँ भी काव्य, छाँदिक और अतुकांत कविता में बंँटा हुआ नजर आता है। यद्यपि अतुकांत समकालीन कविता में आंतरिक लय की बात की जाती है, वह होती भी है किंतु छाँदिक रचनाओं में लयात्मक अनुशासन स्पष्ट नजर आता है। छंद में यह अनुशासन व्याकरणीय और मात्राओं की गणना, पंक्ति के वजन आदि जैसे मानदंडों की वजह से मुखर हो उठता है। नवगीत जैसी नई विधा में भी कुछ हद तक यह दिखता है। आज स्थिति तो यह है कि छाँदिक अनुशासन का पालन बहुत कम रचनाकार कर पाते हैं। खास तौर से 'दोहाÓ जैसी विधा में तो रचनाओं में इस अनुशासन का उल्लंघन खुले तौर पर बहुत आम हो गया है।
ऐसे में जब कवि, व्यंग्यकार ओम वर्मा 'गांधी दौलत देश कीÓ जैसा खण्ड काव्य लेकर आते हैं तो यह बहुत महत्वपूर्ण घटना कही जा सकती है। ओम वर्मा जी का यह सृजन कई कारणों से उल्लेखनीय कहा जा सकता है। पहला तो यह कि यह दोहा छंद में पूरी तरह शिल्पगत अनुशासन के अधीन रचा गया है। दूसरा महात्मा गांधी के जीवन चरित्र या उनकी आत्मकथा का हिंदी में 786 दोहों में ईमानदारी से किया गया रूपांतर है। तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कारण कवि की 'गांधी विचारÓ के प्रति अपनी आस्था और उसे जन जन तक सहज सरल भाषा में पहुंचाने की आकांक्षा का होना भी है।
किताब की विषय वस्तु या महात्मा गांधी के जीवन और विचारों पर चर्चा यहांँ करना महज दोहराव होगा। इतना अवश्य कहा जा सकता है कि जिन्होंने महात्मा गांधी की आत्म कथा पढ़ी है उन्हें छंद में किताब का पुनर्पाठ पुन: उनका स्मरण कराता है। नई पीढ़ी को गांधीजी के जीवन, संघर्षों और स्वतंत्रता संग्राम के महानायक के विचारों को जानने समझने का काव्यात्मक अवसर इस किताब को पढ़कर उपलब्ध होता है।
इस महत्वपूर्ण किताब के आखिरी दोहे में ओम वर्मा जी के भीतर का व्यंग्यकार व्यथित हो कह उठता है-
छापा हमने नोट पर, दिल पर बनी न छाप।
जिस दिल में यह छाप हो, वहाँ न पनपे पाप।।
महात्मा गांधी पर विपुल साहित्य की उपलब्धता के बावजूद ओम वर्मा जी की यह पहल नवोन्मेषी भी कही जा सकती है और उनका दुस्साहस भी। दुस्साहस इस मायने में कि जिस दौर में अतीत के महापुरुषों के विचारों, अस्तित्व व कृतित्व को नष्ट भ्रष्ट किए जाने के कुत्सित प्रयास हो रहे हैं तब ओम वर्मा की यह किताब विचारहीनता के घटाटोप में उम्मीद का उजाला फैलाने का प्रयास करती है।

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