शिवाजी महाराज को कैसे पसंद कर सकते हैं संकीर्ण सोच वाले लोग

मध्ययुगीन भारत के सर्व समाज के लोकप्रिय शासक छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम को लेकर अक्सर कोई न कोई विवाद खड़ा करने की कोशिश की जाती रही है। शिवाजी के नाम का राजनीतिक लाभ तो सभी उठाना चाहते हैं, परन्तु उनके शासन करने की शैली, उनकी उदारता, धर्म निरपेक्ष मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर सभी पर्दा भी डालना चाहते हैं।

Created By : ashok on :29-11-2022 14:59:56 तनवीर जाफरी खबर सुनें

तनवीर जाफरी
मध्ययुगीन भारत के सर्व समाज के लोकप्रिय शासक छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम को लेकर अक्सर कोई न कोई विवाद खड़ा करने की कोशिश की जाती रही है। शिवाजी के नाम का राजनीतिक लाभ तो सभी उठाना चाहते हैं, परन्तु उनके शासन करने की शैली, उनकी उदारता, धर्म निरपेक्ष मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर सभी पर्दा भी डालना चाहते हैं। इसके बजाय शिवाजी महाराज के जीवन व उनके व्यक्तित्व को अपने अपने राजनीतिक लाभ के मद्देनजर अनेक नेता व राजनीतिक दल अपने ही तरीके से परिभाषित करने की कोशिश करते रहते हैं। शब्दों के हेर फेर से उनके वृहद मकसद पर पर्दा डालकर कुछ संकीर्ण विचारों वाले संगठन व इनसे जुड़े नेता शिवाजी को भी अपने 'संकीर्ण' विचार के फ्रÞेम में फिट करना चाहते हैं। उपलब्ध दस्तावेज व इतिहास के स्वर्णिम पन्ने इन संकीर्ण सोच रखने वालों की इन कोशिशों पर हमेशा पानी फेर देते हैं। तभी यह अतिवादी संकीर्ण लोग इतिहास बदलने की मुहिम चलाने लगते हैं और वास्तविक इतिहास को झुठलाने में लग जाते हैं।

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शिवाजी के नाम पर छिड़ा ताजा विवाद महाराष्ट्र के राजयपाल व आरएसएस के समर्पित प्रचारक रहे भगत सिंह कोश्यारी द्वारा दिये गये एक बयान को लेकर छिड़ा है जिसमें उन्होंने शिवाजी को 'पुराना आदर्श' और बाबासाहेब आम्बेडकर व केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को 'नया आदर्श' बताया। इतना ही नहीं, भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने कथित तौर पर यह भी कहा कि शिवाजी ने मुगल बादशाह औरंगजेब से पांच बार 'माफी मांगी' थी। शिवाजी के अपमान का यह मामला अब मुंबई उच्च न्यायालय तक पहुँच गया है, जहाँ एक याचिका दायर कर कोश्यारी को राज्यपाल पद से हटाने की मांग की गई है। साथ ही इसी याचिका में राज्यपाल कोश्यारी व भाजपा प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी के विरुद्ध एफआईआर दर्ज करने की मांग भी की गई है। शिवाजी के तेरहवें वंशज उदयन राजे भोंसले ने तो यहाँ तक कहा है कि कोश्यारी एक 'थर्ड क्लास' व्यक्ति हैं। इसे राज्यपाल पद से हटाकर राजभवन से बाहर करना चाहिए। वह यहाँ बैठने के काबिल नहीं। इसे राजभवन से निकालकर वृद्धाश्रम भेज देना चाहिए।


कोश्यारी अथवा किसी अन्य भाजपा अथवा संघ परिवार के नेता द्वारा शिवाजी ही नहीं, देश के किसी भी शासक अथवा नेता के उदारवादी व धर्म निरपेक्ष पक्ष पर पर्दा डालना और उसी घुमा फिराकर अतिवादी हिंदूवादी बताना इनकी दूरगामी रणनीति का एक हिस्सा है। जिस संघ व भाजपा के लोग पौराणिक कथाओं के महापुरुषों को अनंत काल तक के लिए मानव आदर्श मानते हों, उनका मध्ययुगीन भारतीय इतिहास के महान नायक को पुराना आदर्श बताना आश्चर्य का विषय है। याद कीजिये वरिष्ठ भाजपा नेता लाल कृष्ण अडवाणी ने पाकिस्तान में जिन्ना की मजार पर जाने के बाद उन्हें 'धर्म निरपेक्ष' नेता बताकर अपना पूरा राजनीतिक करियर समाप्त कर लिया। इतना ही नहीं, बल्कि टीपू सुल्तान जैसे देशभक्त, उदारवादी व धर्मनिरपेक्ष शासक को बदनाम करने में भी यह अपनी पूरी ऊर्जा लगा देते हैं। इनके आदर्श केवल वही हैं जो घोर अतिवादी हिंदुत्व पर विश्वास करने वाले हैं। भले ही वे अंग्रेजों के चापलूस ही क्यों न रहे हों।

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इतिहासकारों ने सप्रमाण लिखा है कि शिवाजी ने 1645 में पहली बार 'हिंदवी स्वराज्य' शब्द का प्रयोग किया था। इस हिंदवी स्वराज्य का अर्थ विदेशी ताकतों से छुटकारा पाना और अपना यानी हिन्द के लोगों का राज्य स्थापित करना था न कि हिन्दू राष्ट्र बनाना। शिवाजी धर्म की राजनीति में विश्वास नहीं करते थे। वे धर्मनिरपेक्ष थे और उन्होंने अपने राज्य को धर्मनिरपेक्ष राज्य घोषित किया था। शिवाजी का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप इन्हें भला कैसे नजर आएगा क्योंकि शिवाजी ने तो अपनी राजधानी रायगढ़ में अपने महल के ठीक सामने एक भव्य मस्जिद का निर्माण केवल इस मकसद से करवाया था ताकि उनके मुस्लिम सैनिक, कर्मचारी तथा मुस्लिम रिआया (प्रजा) को नमाज अदा करने में आसानी हो। अपने इसी महल की दूसरी तरफ अपने पूजा पाठ के लिए जगदीश्वर मंदिर का निर्माण कराया था। जब गुजरात में एक चर्च पर आक्रमण हुआ और चर्च क्षतिग्रस्त हुआ, उस समय शिवाजी ने ईसाई पादरी फादर अंब्रोज की आर्थिक सहायता कर चर्च के पुनरुद्धार में उनकी मदद की। मस्जिदों, चर्चों को गिराने व उन पर हमला करने कराने वालों से भला शिवाजी का यह 'राजधर्म ' निभाना कैसे सहन हो सकता है?


शिवाजी की सेना में न केवल बड़ी संख्या में मुसलमान शामिल थे, बल्कि उनके अफसरों और कमांडरों में भी बहुत सारे लोग मुसलमान थे। शिवाजी के सबसे विश्वासपात्र सहयोगी एवं उनके निजी सचिव का नाम मुल्ला हैदर था। शिवाजी के सारे गुप्त दस्तावेज मुल्ला हैदर की सुपुर्दगी में ही रहा करते थे तथा शिवाजी का सारा पत्र व्यवहार भी उन्हीं के जिम्मे था। मुल्ला हैदर शिवाजी की मृत्यु होने तक उन्हीं के साथ रहे। पूना महजर जिसमें शिवाजी के दरबार की कार्रवाइयां दर्ज हैं, उसमें 1657 ई. में शिवाजी द्वारा अफसरों और जजों की नियुक्ति किए जाने का भी उल्लेख किया गया है। शिवाजी की सरकार में जिन मुस्लिम काजियों और नायब काजियों को नियुक्त किया गया था, उनके नामों का जिक्र भी पूना महजर में मिलता है। जब शिवाजी के दरबार में मुस्लिम प्रजा के मुकद्दमे सुनवाई के लिए आते थे तो शिवाजी मुस्लिम काजियों से सलाह लेने के बाद ही फैसला देते थे। मुसलमानों से नफरत करने वाले कुछ लोग उस समय शिवाजी की सेना में भी थे जिन्हें शिवाजी का मुसलमानों पर भरोसा करना रास नहीं आता था। वे उनके विरुद्ध साजिशें भी रचते रहते थे।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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