सत्ता में बैठे लोग कैसे समझ पाएंगे विस्थापन की पीड़ा

दक्षिण से लेकर उत्तर तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक नदियों पर जितने भी बांध बने हैं, उनका इतिहास उठाकर देख लीजिए। एक बहुत बड़ी आबादी अपनी जड़ से उखड़कर कहीं दूर बसने को अभिशप्त हुई है।

Created By : Manuj on :23-11-2022 14:16:15 संजय मग्गू खबर सुनें

संजय मग्गू

गुजरात चुनाव की सरगर्मियां काफी तेज हो गई हैं। भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है चुनाव जीतने के लिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के साथ-साथ केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री सहित अन्य नेताओं ने गुजरात में जैसे डेरा ही डाल दिया है। पीएम मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री शाह के लिए गुजरात का क्या महत्व है, यह राजनीति में थोड़ी सी भी दिलचस्पी रखने वाला हर व्यक्ति जानता और समझता है। भाजपा का पूरा अमला पिछले कई महीनों से गुजरात में ही लगा हुआ था।

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अगर पिछले चुनाव परिणाम के आधार बात करें, तो भाजपा के सामने इस बार और सीटें घट जाने का खतरा है। यही वजह है कि भाजपा अपना पूरा जोर गुजरात चुनाव जीतने पर लगा रही है। यदि गुजरात हाथ से निकल गया, तो इसका संदेश पूरे देश में भाजपा के खिलाफ जाएगा। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी कांग्रेस पर मेधा पाटकर को लेकर हमलावर हैं। मेधा पाटकर को वह गुजरात विरोधी साबित करने के प्रयास में हैं। मेधा पाटकर वह शख्सियत हैं जिन्होंने नर्मदा नदीं पर बनने वाले सरदार सरोवर बांध को लेकर लगभग 30-35 साल तक संघर्ष किया था।

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यह उनके संघर्ष का ही परिणाम था कि विस्थापितों को उनकी जमीन का उचित मुआवजा मिला था। अगर मेधा पाटकर के संघर्ष को लेकर आकलन किया जाए, तो उनका संघर्ष वास्तव में सरकार के खिलाफ था, सरकारी मशीनरी के खिलाफ था जो किसानों और आदिवासियों की जमीन तो लेना चाहती थी, लेकिन उसका उचित मुआवजा नहीं देना चाहती थी। पूरी दुनिया के लिए यह बात सत्य है कि जहां कहीं भी नदियों पर बिजली उत्पादन या अन्य कारणों से बांध बनाया जाता है, तो उस क्षेत्र की एक बड़ी आबादी विस्थापित हो जाती है। बांध क्षेत्र में जो भी गांव या कस्बे आते हैं, किसानों की जमीनें आती हैं, उनका अस्तित्व खत्म हो जाता है। दक्षिण से लेकर उत्तर तक, पूरब से लेकर पश्चिम तक नदियों पर जितने भी बांध बने हैं, उनका इतिहास उठाकर देख लीजिए।

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एक बहुत बड़ी आबादी अपनी जड़ से उखड़कर कहीं दूर बसने को अभिशप्त हुई है। उत्तराखंड में बनने वाले टिहरी बांध का मामला अभी ताजा है। पूरा का पूरा शहर ही बांध की भेंट चढ़ गया। टिहरी में बसने वाले लोगों के पूर्वज जिस जमीन में दफन थे, उसे मजबूरी में लोगों को छोड़कर दूसरी जगह पनाह लेनी पड़ी। इन विस्थापितों की पीड़ा को समझने के लिए राजनीति नहीं, मनुष्य का हृदय चाहिए। अपनी जमीन से बिछड़ने की पीड़ा उन लोगों से पूछिए जो हिंदुस्तान-पाकिस्तान बंटवारे के समय विस्थापित हुए थे। विस्थापन का दंश सिर्फ उसी पीढ़ी को नहीं भुगतना पड़ता है, जो पीढ़ी उस समय मौजूद होती है, बल्कि आने वाली कई पीढ़ियां उस पीड़ा को महसूस करती हैं।

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ऐसी स्थिति में सरदार सरोवर बांध के चलते विस्थापितों की लड़ाई लड़ने वाली मेधा पाटकर को मुद्दा बनाकर भाजपा कितना राजनीतिक फायदा उठा पाएगी, यह तो समय बताएगा। लेकिन भाजपा ने तो मेधा पाटकर और कांग्रेस के नेता राहुल गांधी के खिलाफ बाड़बंदी कर ही दी है। भाजपा मेधा पाटकर को गुजरात विरोधी साबित करने का हरसंभव प्रयास करेगी ही।

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