भूखी-प्यासी जनता और मुप्त की रेवड़ी

गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान कल यानी 1 दिसंबर को है। गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान लगभग सभी पार्टियों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए लंबे चौड़े वायदे किए।

Created By : ashok on :01-12-2022 15:22:49 संजय मग्गू खबर सुनें

संजय मग्गू
गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान कल यानी 1 दिसंबर को है। गुजरात में चुनाव प्रचार के दौरान लगभग सभी पार्टियों ने मतदाताओं को लुभाने के लिए लंबे चौड़े वायदे किए। मुफ्त रेवड़ी क विरोध करने वाली भाजपा ने भी वही किया, जो आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने किया। सवाल यह है कि क्या सचमुच मुफ्त की योजनाएं लोगों की आर्थिक स्थिति में बदलाव लाती हैं या उन्हें निकम्मा बना देती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि मुफ्त की रेवड़ी बांटने से राज्यों का खजाना खाली हो जाता है।

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इसका राज्य की अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ता है। चलिए, मान लिया कि मुफ्त की रेवड़ी बांटने से राज्य बरबादी की ओर अग्रसर होता है। फिर प्रधानमंत्री कोरोना काल के बाद से लेकर अब तक देश के 80 करोड़ लोगों को पांच किलो चावल मुफ्त देने की घोषणा को अपनी उपलब्धि क्यों बताते हैं? क्या अस्सी करोड़ लोगों को हर महीने पांच किलो चावल देने से अर्थव्यवस्था पर बोझ नहीं पड़ता? अब मुफ्त रेवड़ी का मामला सुप्रीमकोर्ट में है। जो भी फैसला होगा, वह पता चलेगा ही, लेकिन कल्याणकारी राज्य की अवधारणा में बहुत कुछ ऐसा करना पड़ता है, जो अर्थशास्त्र के सिद्धांतों और नीतियों के खिलाफ होता है। देश के सबसे पिछड़े जिलों में ओडिसा का कालाहांडी गिना जाता है। इसकी आबादी लगभग 16 लाख है। करीब एक चौथाई आबादी आदिवासी समुदाय की है। कभी देश का अभिशाप कहे जाने वाले कालाहांडी को ध्यान में रखते हुए यदि वर्ष 2000 में जनता दल बीजू के तत्कालीन मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने गरीबों को दो रुपये प्रति किलो चावल देने की घोषणा नहीं की होती, तो शायद कालाहांडी की तस्वीर नहीं बदली होती।

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इससे पहले तक कालाहांडी में भूख से मरने वालों की देश में सबसे ज्यादा संख्या थी। लोग अपनी बहन-बेटियों को चालीस रुपये और एक साड़ी के बदले अमीरों को बेच रहे थे। कालाहांडी का शायद ही कोई ऐसा गांव हो जिसमें भूख से मरने वालों की अच्छी खासी तादाद न हो। जब देश के किसी भी इलाके में जनकल्याणकारी योजनाएं चलाई जाती हैं, तो यह सच है कि उसका दबाव राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है, लेकिन एक अच्छी खासी आबादी भूखों मरने से बच जाती है। जैसा कि कालाहांडी में हुआ। ऐसा नहीं है कि उत्तर प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिसा जैसे तमाम राज्यों में जनकल्याणकारी योजनाएं चलाने से सबकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी हो गई। इन राज्यों में सरकार से गेहूं, चावल और अन्य वस्तुएं मिलने पर इन पर खर्च होने वाला पैसा बचाकर लोग अमीर हो गए।

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नहीं, उनकी स्थिति वैसी की वैसी ही रही, लेकिन वे भूखों मरने से बच गए। आप कल्पना करके देखिए, जब करोड़ों लोगों की कोरोना काल में नौकरी चली गई थी। लोग दाने-दाने को मोहताज थे, उस समय अगर केंद्र और राज्य सरकारों ने अपने खजाने के मुंह न खोले होते, तो उन लोगों की क्या दशा होती, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। हां, राजनीतिक सत्ता इसका लाभ चुनावों के दौरान भुनाने से भी नहीं चूकती है।

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