काश, कभी हम सुन सकते पहाड़ का रुदन!

अभी हाल ही में जोशीमठ में जिस तरह से भू-धँसाव हो रहा है, उसे देखते हुए यह बिल्कुल साफ है कि हम पहाड़ को तथाकथित विकास का ओवरडोज दे रहे हैं,

Created By : ashok on :14-01-2023 16:21:08 गिरीश पंकज खबर सुनें


गिरीश पंकज

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विकास की हड़बड़ी में मानव समाज अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार रहा है और इस भ्रम में है कि वह विकास कर रहा है, विकास में सहभागी है, जबकि सच्चाई तो यह है कि वह विकास में नहीं, विनाश में सहभागी है। उत्तराखंड में समय-समय विनाश की जो लीलाएं हम देख रहे हैं, उससे भी कोई सबक नहीं ले पा रहे। अभी हाल ही में जोशीमठ में जिस तरह से भू-धँसाव हो रहा है, उसे देखते हुए यह बिल्कुल साफ है कि हम पहाड़ को तथाकथित विकास का ओवरडोज दे रहे हैं, जिसका नतीजा सामने है। सन 2013 में केदारनाथ की तबाही आई थी। तब तो हमें सबक ले लेना था कि हमें पहाड़ों के साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। नतीजा एक बार फिर सामने है।


उत्तराखंड में रहने वाले भू-वैज्ञानिक और दूसरे स्थानीय विशेषज्ञ बताते हैं कि भू-धंसाव का कारण यह कि वहां एक रास्ते से लगभग एक किलोमीटर धरती के नीचे से टनल निकाली जा रही है। बताइए, यह विशुद्ध रूप से मूर्खता नहीं यो और क्या है। पहाड़ पर स्थापित जोशीमठ अकसर बारिश को झेलता रहता है। वहां की जमीन में वैसे ही नमी की मात्रा हद से अधिक रहती है। ऐसे समय में आप जल विद्युत परियोजना के लिए वहां आ रहे हैं।

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और जब टनल बनेगी तो वहां बोरिंग करनी होगी। स्वाभाविक है कि धरती को ही छेदा जाएगा और जब बोरिंग की जाएगी, तो धरती में कंपन होगा ही। इसका एक कारण बोरिंग मशीन भी बनेगी। विद्युत परियोजना से जुड़े अधिकारी कहते हैं कि अभी हमारी टनल तपोवन से चार किलोमीटर दूर है। लेकिन आज नहीं तो कल तपोवन तब भी काम पहुंचेगा और स्वाभाविक है कि फिर वही बोरिंग होगी। और धीरे-धीरे जोशीमठ की जमीन कमजोर पड़ती जाएगी। मठ में लगातार पानी का रिसाव हो रहा है और इसके लिए जाहिर है कि जिम्मेदार टनल का काम ही है। लेकिन अधिकारियों ने किसी की नहीं सुनी। नतीजा सबके सामने है। सरकार और प्रशासन के लोग अपने ढर्रे से काम करते हैं। कई बार वे भू वैज्ञानिकों से भी बड़े हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि जल विद्युत परियोजना बनेगी, तो लाखों लोगों का भला होगा। लेकिन वे समझ नहीं पाते कि इसका क्या दुष्परिणाम होगा। इसलिए भू धँसाव के कारण घरों में आई दरारों को झेलते हुए जोशीमठ के लोगों ने सरकार से मांग की है कि यहां सारे निर्माण कार्य फौरन रोक दिए जाएं।


हालांकि कुछ काम रुक भी गया है। जोशीमठ के सैकड़ों घरों को खाली भी करा दिया गया है। लेकिन खतरा टला नहीं है। अभी सारे निर्माण कार्य रोक दिए जाने चाहिए। और परियोजना रद्द की जानी चाहिए। भूवैज्ञानिक इस बात का गहन सर्वे करें कि क्या आने वाले समय में क्या जोशीमठ को कोई बड़ा खतरा हो सकता है? यह क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से भी खतरे में है। और जैसा कि इन पंक्तियों के लेखक ने पढ़ा है कि इस खतरे की ओर अस्सी साल पहले ही आगाह कर दिया गया था कि यहां कभी भी भूस्खलन हो सकता है। भूकंप आ सकता है, जमीन धंस सकती है, लेकिन किसी ने भू वैज्ञानिकों की नहीं सुनी।
पहाड़ से लेकर धरती तक विनाश!
विकास की हड़बड़ी में हमने पहाड़ से लेकर धरती तक विनाश का रास्ता अपना लिया है। फोरलेन और सिक्स लेन सड़कों के व्यामोह में हमने सैकड़ों गाँवों की खेती नष्ट कर दी। बड़े-बड़े संयंत्र लगाने के लिए वहाँ की जमीनों का अधिग्रहण किया। यह और बात है कि आज भी अनेक ग्रामीण मुआवजे के लिए भटक रहे हैं, संघर्ष कर रहे हैं। फिर चाहे वह छत्तीसगढ़ हो, बिहार हो या कोई और राज्य। ग्रामीणों को धोखा देकर उनकी जमीन हड़पना विकास का नया हथकंडा हो गया है। विकास के तथाकथित मसीहा धरती से लेकर पहाड़ तक अपनी अज्ञानता का ही परिचय दे रहे हैं। धरती और पहाड़ दोनों की सहने की अपनी सीमा है।

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हद से ज्यादा दबाव ये दोनों बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे। इसलिए समय विवेक के साथ धीरे-धीरे विकास के सोपान तय करने का है। मेरा क्या, हर भू वैज्ञानिकों का मानना है कि पहाड़ को अधिक छेड़ने से बचना चाहिए। न वहां टनल बनाने की कोशिश करनी चाहिए, न कोई बड़ी विद्युत परियोजना लाने की कोशिश होनी चाहिए। जो कुछ भी हो, वह सतह पर हो। ऐसी तकनीक विकसित की जानी चाहिए कि हमारे पहाड़ शांति के साथ खड़े रहें। कम से कम पहाड़ों पर बहुत अधिकाधिक निर्माण कार्य को फौरन रोका जाना चाहिए।
बहरहाल, अपनी पीड़ा काव्यात्मक तरीके से भी कुछ इस तरह कहने की कोशिश की है कि पहाड़ को अगर तुम छेड़ोगे तो पहाड़ तुम्हें नहीं छोड़ेगा। खंड-खंड कर देगा एक दिन तुम सब को। जैसे सीता की पुकार पर फट गई थी धरती, उसी तरह प्रकृति की चीत्कार से फट पड़ेगा पहाड़। समा जाएँगे उसमें न जाने कितने जोशीमठ, इसलिए सावधान! पहाड़ को पहाड़ रहने दो । उसे नोट छापने की मशीन मत बनाओ मत चलाओ। पहाड़ की छाती पर कुदाल वरना एक दिन बुरा होगा तुम सब का हाल! अभी तो सिर्फ घरों में आई हैं

दरारें। कल को न जाने कितने घर भरभरा कर गिर जाएँगे ताश के पत्तों की तरह।
तथाकथित विकास और अधिकाधिक धन की लालसा में ये जो तुम बना रहे हो न नई-नई परियोजनाएं और गगनचुंबी इमारतें, एक दिन ले डूबेगी सब को रह-रहकर चेताता रहता है पहाड़, चिंघाड़ता है घायल शेर की तरह। सावधान करता है तुमको। विनाश की छिटपुट वारदात के साथ। मगर अरे ओ मनुष्य! अकसर ही तुम कहाँ समझ पाते हो कोई बात। अक्ल तो आती है मगर तब तक बहुत देर हो जाती है। भगवान जाने तुम्हारी चेतना, किस मठ में जा कर सो जाती है?
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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