कुप्रथाओं के मूल में है अज्ञान

समाज में दहेज, तिलक, मृत्युभोज आदि अवसरों पर प्रदर्शन का बोलबाला है। सैकड़ों साल से ये कुप्रथाएं प्रचलन में हंै। इससे स्पस्ट है कि हम सभी पीड़ित और परेशान हैं।

Created By : ashok on :30-11-2022 15:04:54 कांतिलाल मांडोत खबर सुनें

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कांतिलाल मांडोत
समाज में दहेज, तिलक, मृत्युभोज आदि अवसरों पर प्रदर्शन का बोलबाला है। सैकड़ों साल से ये कुप्रथाएं प्रचलन में हंै। इससे स्पस्ट है कि हम सभी पीड़ित और परेशान हैं। कुप्रथाओं का मूल आखिरी कहां है? कौन है जिसने इन कुप्रथाओं को ढोने के लिए हमें विवश किया है? इन कुप्रथाओं की गहराई में हमारा अविवेक, अंधविश्वास और अज्ञान है। किसी भी प्रथा के प्रचलन के समय प्राय: सभी का उद्देश्य यह होता है कि समाज में इन प्रथाओं के आधार पर संतुलन बना रहे, पर जब मूल दृष्टिकोण लुप्त हो जाता है, तो संतुलन के बजाय असंतुलन और अव्यवस्थाओं का बोलबाला हो जाता है।

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प्रथाएं अगर अच्छी हैं तो अभिनंदनीय एवं अनुकरणीय हंै किंतु कुप्रथाएं तो कभी स्वीकार्य नहीं हो सकती हैं। जिनसे हमें प्राण मिलता है, उन प्रथाओं को नकारने का तो प्रश्न ही नहीं उठता है। प्रतिकार और नकार उनका ही होता है जो जिनसे हम पिछड़ते हैं एवं हमारी हानि होती है। हम स्वयं अनुभूति कर रहे हैं कि जिन प्रथाओं में प्राण ही नहीं है, फिर उनके चिपके रहने से क्या फायदा है। कोई औचित्य नहीं है। जो प्रथा छोड़ने योग्य है उसे हमें छोड़ देना चाहिए। आज प्रगतिशील युग में भी अंध विश्वास एवं अंधानुकरण का जो क्रम हमारे समाज में जिस तरह चल रहा है, उसे देखकर कई बार मन में विचार आता है कि इस स्थिति में यदि हम कोई क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं ला पाये तो आने वाली पीढ़ी हम पर हसेंगी।

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हमारा अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा। समाज निरन्तर पतन की ओर बढ़ता चला जाएगा। जिन प्रथाओं को निभाते हुए संपन्न व्यक्ति और सामान्य व्यक्ति भी रो रहा है। उन प्रथाओं का सामूहिक स्तर पर प्रतिकार करना चाहिए। हमारे विवेक का दीपक कभी बुझना नहीं चाहिए। किसी भी परम्परा और प्रथा को निभाते हुए देश, काल और परिस्थितियों का ज्ञान रहना चाहिए। प्रश्न प्राचीनता और नवीनता का नहीं है।

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