हड़बड़ी में गड़बड़ी, महंगी पड़ी!

लिखने का कीड़ा हमें बचपन में ही काट चुका था। लेकिन उस समय धूल में पसर-पसर कर धूम-धड़क्का करने से फुर्सत नहीं मिली । बचपन की धींगा मस्ती के बीच, कहां लिखने जैसा गंभीर कार्य करते?

Created By : ashok on :25-10-2021 13:55:34 खबर सुनें

-प्रभात गोस्वामी

लिखने का कीड़ा हमें बचपन में ही काट चुका था। लेकिन उस समय धूल में पसर-पसर कर धूम-धड़क्का करने से फुर्सत नहीं मिली । बचपन की धींगा मस्ती के बीच, कहां लिखने जैसा गंभीर कार्य करते? आज पकी उम्र में फुर्सत मिली है, तब लेखन गंभीर कार्य नहीं रह गया है। वैसे भी हमें बेवजह गंभीर होना भी तो नहीं आता। सो हमने अब लिखना शुरू किया है। शुरू से ही कविता, कहानी में हाथ था जरा तंग इसीलिए हमने लिखना शुरू कर दिया व्यंग्य।
एक दिन दस व्यंग्य रचनाओं का एक मोटा-बड़ा लिफाफा लेकर कबूतर खाने यानी डाकखाने पहुंचे। सीट पर ऊंघते हुए डाक बाबू ने शक की निगाहों से देखते हुए पूछा, 'क्या है इसमें?Ó
हमने बताया कि हमारी हस्त लिखित व्यंग्य रचनाएं हैं, क्यों?
वह ठहाका मारते हुए लोटपोट हो गया। उसने कहा कि भैये, कम्प्यूटर युग में एक तो हाथ से लिख रहे हो, फिर डाक से रचनाएं भेज रहे हो, हँसूँ नहीं तो क्या रोऊं? आजकल सब मेल से रचनाएं भेजते हैं। तुम ये बेमेल तरीका क्यों अपना रहे हो?
बात तो सही है। जब एक क्लिक पर पलक झपकते ही रचना संपादक की टेबल पर पहुँच जाती है; तब डाक से तीन-चार दिन का इंतजार क्यों करें! खैर, हमने अब अपने लैपटॉप की धूल झाड़ी और पिल पड़े। मानो वर्षों पहले बाबू बनने के लिए टाइपिंग का टेस्ट दे रहे हों। रोज घंटों टाइपियाने लगे और 'बुरी नजरÓ, 'द्रौपदी का चीरÓ, 'लोकतंत्र की चौथी टांगÓ, 'उड़ता तीतरÓ जैसे अखबारों में रोज ही छपने लगे। फेसबुक, व्हाट्सएप की दीवारों पर चुनावी पोस्टरों की तरह से व्यंग्य चेपने लगे। आलम ये है कि लाइक्स और कमेंट्स की बाढ़ से घर का कोना-कोना डूब गया है।
पर हमारे साथी व्यंग्यकार इसे सिरे से खारिज कर रहे हैं। सब कहते हैं कि कचरा पट्टी से निकलकर किसी स्तरीय अखबार या पत्रिका में छपकर बताओ तो मानें। व्यंग नहीं व्यंग्य लिखकर बताओ तो जानें। हमारे दिमाग की बत्ती गुल हो चुकी थी। उसे बदलकर अब एक नई एलईडी लगाई है। दिमाग फुल रोशन हुआ तो तय किया कि अब स्तरीय लेखन करेंगे और स्तरीय अखबारों, पत्रिकाओं में ही छपेंगे। बिन छपे कुछ दिन ऐसे गुजरे मानो किसी काल कोठरी में बंद कर दिया हो। फिर क्या? कुछ रातें काली करने के बाद सभी स्तरीय अखबारों में कुछ व्यंग मेल कर दिए।
दिन बीते,माह बीत गए। हमारी आँखें किसी विरहणी सरीखी, संपादक के जवाब के इंतजार में पथरा रही हैं। हमारी व्यंग रचनाएँ न छपीं और न ही उनकी स्थिति पर कोई जवाब आया। हारकर हमने अपने ही शहर के एक स्तरीय अखबार के दफ्तर के लिए कूच किया। दरवाजे पर पठान सरीखे दरबान ने बताया-व्यस्ततावश संपादक मिलने में असमर्थ है। विशेष परिस्थितियों में फोन पर बात करने की ही शर्त है। हमारी आँखों से आँसू निकल पड़े। हमने दरबान से फरियाद की कि बस एक बार मिलवा दीजिए। दरबान ने बड़ी बेरुखी से दस गज की दूरी से कहा, आँसू न बहा, फरियाद न कर/दिल जलता है तो जलने दे। क्या दरबानों को कड़ाई से पेश आने की तनख्वाह ही मिलती है?
हमने अपने आपको संभाला। सम्पादक जी को फोन भिड़ाया। सामने मिलते तो साक्षात भिड़ंत हो जाती। उधर से आवाज आई, कहिए, क्या कहना चाहते हैं?
हमने कहा, महोदय कुछ महीने पूर्व एक व्यंग्य आपको भेजा था। किसी लापता बच्चे जैसे आजतक उसका भी अता-पता ही नहीं चला?
हमारी बात को काटते हुए उधर से आवाज़ आई, अरे भैया, लिखने, भेजने और तुरंत छपने की हड़बड़ी के इस दौर में आपने भी एक गड़बड़ी कर दी। हरिशंकर परसाई जी की रचना कट-पेस्ट कर अपने नाम से धर दी। लिहाजा हमने आपको हमारे अखबार की ब्लैक लिस्ट में डालते हुए हमेशा के लिए बैन कर दिया है।
हाय री किस्मत! गोरा-चिट्टा चेहरा ब्लैक लिस्ट में!! कित्ती ज्यादती है यारों! हमारा माथा फिर ठनका। क्या सभी दस-बीस व्यंग्यों का जवाब इसीलिए नहीं आया? उधर संपादक जी ने बड़ी बेदर्दी से फोन काटा, लगा हमारा सर काट दिया हो। हम ये भी नहीं कह पाए । वो बेदर्दी से सर काटें अमीर और मैं कहूँ उनसे/हुजूर अहिस्ता...अहिस्ता..जनाब आहिस्ता...आहिस्ता...।

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