पीएम मोदी के नेतृत्व में दुनिया में लगातार बढ़ रहा भारत का रुतबा

दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके भारत का पिछले कुछ वर्षों के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रुतबा बढ़ा है। इसमें भारत की बेहतरीन विदेश नीति और आक्रामक कूटनीति का अहम योगदान रहा है।

Created By : ashok on :29-11-2022 15:16:37 अमित कौशिक खबर सुनें

अमित कौशिक
दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुके भारत का पिछले कुछ वर्षों के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रुतबा बढ़ा है। इसमें भारत की बेहतरीन विदेश नीति और आक्रामक कूटनीति का अहम योगदान रहा है। इसकी एक झलक हमें हाल ही में संपन्न हुए जी-20 के बाली शिखर सम्मेलन के दौरान देखने को मिली, जब जी-20 के घोषणापत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कही गई बात को तवज्जो दी गई। घोषणापत्र में कहा गया है, ‘‘मौजूदा समय युद्ध का नहीं होना चाहिए।’’ यही बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में सितंबर में एससीओ शिखर सम्मेलन के दौरान कही थी। पीएम मोदी ने शांति का यह संदेश कई मौकों पर दिया है। चूंकि जी-20 दुनिया भर के 20 सबसे ताकतवर देशों के बीच संवाद का एक प्रमुख मंच है और आगामी सत्र की अध्यक्षता भारत ही कर रहा है, इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयान को याद किया जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा है, ‘‘आज का युग युद्ध का नहीं है। कूटनीति और संवाद ही ऐसी चीजें हैं, जो दुनिया को छूती हैं।’’

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भारतीय प्रधानमंत्री विश्व कल्याण को प्राथमिकता देते हैं, जो कि हमारी प्राचीन संस्कृति का एक हिस्सा है। वह विकास को भी समावेशी रखते हुए आगे बढ़ने पर जोर देते हैं। बाली शिखर सम्मेलन के दौरान उनके एक कथन से इसे समझा जा सकता है, जिसमें उन्होंने कहा है, ‘‘आज आवश्यकता है कि विकास के लाभ सर्व-स्पर्शी और सर्व-समावेशी हों। हमें विकास के लाभों को मम-भाव और सम-भाव से मानव-मात्र तक पहुंचाना होगा।’’ यही नहीं, भारत अब अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शक्तिशाली देशों और संस्थानों की विफलता को लेकर अपने विचारों को खुलकर रख रहा है। इसकी बानगी बाली शिखर सम्मेलन में देखने को मिली, जब पीएम मोदी ने जलवायु परिवर्तन, कोविड महामारी और यूक्रेन संकट से निपटने में विफल रहने पर संयुक्त राष्ट्र (यूएन) पर निशाना साधा। इसके अलावा प्राकृतिक संसाधनों पर अनधिकृत कब्जे को लेकर भी पीएम मोदी मुखर दिखाई दिए। उन्होंने कहा, ‘‘प्राकृतिक संसाधनों पर ओनरशिप का भाव आज संघर्ष को जन्म दे रहा है और पर्यावरण की दुर्दशा का मुख्य कारण बना है। प्लेनेट के सुरक्षित भविष्य के लिए, विश्वास का भाव ही समाधान है।’’ पीएम मोदी की वर्ल्ड लीडर की इमेज से भारत न केवल जगत गुरु का तमगा हासिल कर सकता है, बल्कि इससे उसे जल्द 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने में भी मदद मिलेगी। चाहे आतंकवाद से जुड़ा मुद्दा हो या जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्या हो, विश्व के सामने खड़ी बड़ी चुनौतियों के समाधान को लेकर भी भारत के विचारों को तवज्जो मिल रही है।

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इससे एक बात तो स्पष्ट हो जाती है कि भारत अब दुनिया को रास्ता दिखाने के पथ पर है, क्योंकि दुनिया भर के ताकतवर देशों में एक अकेला भारत ही है, जो कि विश्व कल्याण और समावेशी विकास को प्राथमिकता दे रहा है। यह भी सत्य है कि दुनिया उस देश के दिखाए मार्ग पर ही चल सकती है, जो कि विश्व कल्याण की सोच रखता हो। वर्तमान समय में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत ने अपनी जो धाक जमाई है, उसे देखते हुए अब कहा जाने लगा है कि देश सैकड़ों वर्षों पहले खोए अपने गौरव को दोबारा पा सकता है। यानी भारत आने वाले वर्षों में एक बार फिर विश्व गुरु की भूमिका में आ सकता है। यह बात इसलिए भी प्रासंगिक लगती है कि क्योंकि भारत का इतिहास न केवल समृद्ध रहा है, बल्कि उसकी छवि भी साफ और बेदाग रही है। इसने कभी किसी देश पर पहले हमला नहीं किया। इसके अलावा अगर वर्तमान समय की बात करें तो भारत की विदेश नीति और कूटनीति अपने स्वर्णिम दौर में कही जा सकती है, जिसके अमेरिका से बेहतर संबंध होने के साथ ही रूस से भी पुरानी दोस्ती कायम है। यूरोप और अफ्रीकी देशों से लेकर अरब देशों से भी हमारे अच्छे संबंध है। दो पड़ोसी दुश्मन देशों को अपवाद मान लिया जाए तो भारत के संबंध किसी भी देश के साथ खराब श्रेणी में नहीं कहे जा सकते हैं। इस लिहाज से विश्व का नेतृत्व करने के लिए भारत के पास उसके स्वर्णिम इतिहास से लेकर उज्ज्वल वर्तमान एवं भविष्य भी है।


आज के समय में दुनिया आर्थिक एवं सामाजिक असमानताओं से जूझ रही है, जिसका असर खासकर विकासशील एवं गरीब देशों पर पड़ रहा है। ऐसे में संवाद के जरिए समाधान निकालने की अपनी रणनीति के साथ भारत दुनिया को नई दिशा दे सकता है। एक और पहलू की ओर ध्यान दें तो भौतिकवादी युग की चकाचौंध और पश्चिम सभ्यता के रंग में रंगी आज की दुनिया के समक्ष अवसाद भी एक बड़ी समस्या बन चुका है। इस भौतिकवादी दौर में अध्यात्म ही एक साधन है, जो इस मानव जीवन का उद्धार कर सकता है और आध्यात्म के मामले में जितना समृद्ध एवं सजग भारत है, उतना कोई देश नहीं है। अध्यात्म से विमुख हो चुके मानव समाज को नई राह दिखाने में भारत की बड़ी भूमिका हो सकती है। चूंकि भारत 1 दिसंबर से जी-20 की अध्यक्षता ग्रहण कर रहा है, उसके पास विश्व गुरु की भूमिका में आने का पूरा मौका है। एक समय था, जब भारत को विश्व गुरु के रूप में जाना जाता था और दूर देशों के छात्र यहां पर शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। भारत की प्राचीन सभ्यता एवं संस्कृति, अर्थव्यवस्था, आध्यात्मिक एवं राजनीतिक समझ और यहां के लोगों का ज्ञान इतना समृद्ध था कि पूर्व से लेकर पश्चिम तक सभी देश हमारे भारत के कायल था। पुरातन काल से आध्यात्मिक केंद्र रहे भारत ने दुनिया को ‘शून्य’ दिया, जिसने गणित और विज्ञान को पूरी तरह से बदलकर रख दिया। देश के ऋषि-मुनियों ने दुनिया को योग से परिचित कराया, जो कि तन-मन को दुरुस्त रखने के साथ ही सत्य की खोज का भी माध्यम है। शल्य चिकित्सा और ज्योतिष शास्त्र भी भारतीय क्षेत्र से ही उपजे। विश्व की सबसे प्राचीनतम भाषा संस्कृत भारत की शान है, जिसके बारे में वैज्ञानिक और तकनीकी जानकार भी कह चुके हैं कि कंप्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा संस्कृत ही है। इसके अलावा मानव जीवन के लिए उपयोगी कई अन्य खोज भी भारत में हुई, जिसका उसे कोई श्रेय नहीं मिल पाया।

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चूंकि भारत के पास ज्ञान एवं संसाधनों की कोई कमी नहीं थी, यह बाहरी आक्रांताओं की नजरों में आ गया और फिर एक के बाद एक आक्रांता आता गया और भारत की विरासत को लूटता गया। समय के साथ भारत की चमक फीकी पड़ती चली गई और उसके हिस्से जो विश्व गुरु का तमगा था, वह भी अघोषित रूप से हटता चला गया। हालांकि अब इतिहास को दोहराने का वक्त नजर आने लगा है। अब एक बार फिर वह स्थिति बनती दिखाई पड़ रही है, जब भारत दुनिया के लिए गुरु की भूमिका निभाएगा। इसकी प्रासंगिकता को समझना इतना मुश्किल नहीं है, क्योंकि भारत की संस्कृति कहती है, ‘जियो और जीने दो’, जबकि पाश्चात्य संस्कृति का नारा हैं, ‘खाओ पियो ऐश करो’। अन्य संस्कृतियां जहां स्वार्थ की भावना को साथ लिए है, वहीं भारत की संस्कृति ने पूरे विश्व को ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना सिखाई है। यह भारतीय सभ्यता ही है जो कहती है कि केवल खुद का भौतिक सुख ही सब कुछ नहीं है, बल्कि ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के भाव से किए जाने वाले कार्य से आत्मा को संतुष्टि मिलती है और यही सबका लक्ष्य होना चाहिए। इसके अलावा भारत के हर संदेश में विकास की झलक देखने को मिल रही है और भविष्य में वही नेतृत्व की भूमिका में होगा, जो मानव जीवन को और सुगम बनाने के लिए चहुंओर समावेशी विकास पर जोर देगा। भारत को विश्व गुरु यानी समूची दुनिया के लिए एक सुधारक और शिक्षक बनाना शासन का एक महान प्रयास है और इस दिशा में सही मायनों में आगे बढ़ना है तो यह हम सभी का साझा प्रयास होना चाहिए। युवाओं को इस परिवर्तन का एजेंट बनने और मानव जाति के सामने आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए प्रगतिशील और स्थायी समाधान के साथ आगे आना होगा। उन्हें एक ऐसा न्यू इंडिया बनाने का प्रयास करना होगा, जो गरीबी, अशिक्षा, भय, भ्रष्टाचार, भूख और भेदभाव से मुक्त हो।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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