भारतीय जनमानस के कलाकार राजा रवि वर्मा और उनकी कृतियाँ

कुछ समय पूर्व की बात है। रामायण के फिर से दूरदर्शन पर शुरू होने के साथ ही राम के गुणों की चर्चा, राम के संस्कार, भाइयों के बीच का दर्शन, गुणों-अवगुणों पर तार्किक बहस जैसे एक बार फिर से दबा हुआ मर्म उजागर हो गया है।

Created By : ashok on :27-11-2022 15:06:44 पंकज तिवारी खबर सुनें

पंकज तिवारी
कुछ समय पूर्व की बात है। रामायण के फिर से दूरदर्शन पर शुरू होने के साथ ही राम के गुणों की चर्चा, राम के संस्कार, भाइयों के बीच का दर्शन, गुणों-अवगुणों पर तार्किक बहस जैसे एक बार फिर से दबा हुआ मर्म उजागर हो गया है। रामायण से संस्कार ग्रहण कर चुकी एक पीढ़ी जो लगभग अपने उम्र के कई बसंत पार कर चुकी है, बच्चों के संस्कार को लेकर चिंतित थी, उनके बाद की वह पीढ़ी, नई पीढ़ी जो पाश्चात्यता के विचारों के साथ तैयार हुई, उसमें चाह कर भी वह संस्कार नहीं डाल पाए और आए दिन नए-नए मुद्दों को लेकर कुछ ऐसी फिल्में भी बनीं जो भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहीं। जहाँ बच्चे जब गर्मियों की छुट्टियों में अपने घर जाते हैं तो उन्हें यह कहते आसानी से सुना जा सकता है कि हम तो दादी के घर जा रहे हैं, जहाँ दादी बस मनोरंजन की एक चीज बनकर रह गई है, जहाँ दादा बच्चों के बिगड़ते रूपों को देखकर घर के एक कोने में दुबक कर बस रो लेते हैं और अपने बच्चों के संस्कार को लेकर चिंतित है। ऐसे दौर में रामायण के शुरू होते ही अचानक से बड़े स्तर पर परिवर्तन देखने को मिला। यही परिवर्तन मिला था राजा रवि वर्मा के चित्रों, विशेषत: धार्मिक चित्रों को देखकर उस जमाने में जब ईश्वर की पहुँच मूर्त रूप से भारत के घर-घर में हो गया था। रवि वर्मा के प्रेस में बने उनके अपने चित्रों के हजारों प्रतियों के रूप में।

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अब हम कहें कि साहित्य और कला की प्रासंगिकता क्या है? क्या यह प्रश्न बचकाना नहीं लगता? जिस तरीके से लोग रामायण में पूरे जी-जान से अपने आप को प्रस्तुत कर देने वाले राम और सीता के रूप में अरुण गोविल तथा दीपिका को अपने भगवान के रूप में मानते हैं, उनके कदमों पर चलना चाहते हैं। क्या सभी के जेहन में राम और सीता की यह तस्वीर नहीं बस गई है? आज लगभग सभी लोग राम और सीता को इसी रूप में पसंद कर रहे हैं इसी रूप में पूज रहे हैं।


एक समय था जब राजपूत शैली, मुगल शैली अपने उद्देश्य को खो रही थी, चित्रकार स्थिर होकर चित्रकारी नहीं कर पा रहे थे। चित्र नहीं बना पा रहे थे। कलाकारों को अपना जीवन यापन करना भी भारी पड़ रहा था, कला को लेकर अस्थिरता का माहौल व्याप्त था। भारतीय कला की स्थिति डांवाडोल थी। हालांकि मध्यकाल में, मुगल शैली में, कंपनी शैली में तथा और भी कई शैलियों में देवी-देवताओं के चित्र बने, लेकिन उनमें ऐसे गुणों की कमी थी कि वे लोगों के दिलों में जगह बना पाते, उन सबों में लोक संस्कृति, स्थानीयता तथा बेडौलता की छाप नजर आती थी। ऐसी कला नहीं मिल पा रही थी जो पूरे देश पर एक साथ अपना छाप छोड़ सके।

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उसी बीच आधुनिक कला में या कला के आधुनिक दौर में लोगों को देवी-देवताओं के एक नए रूप से परिचित करवाया गया। लोगों को देवी-देवताओं के सम्मोहक चित्रों से परिचित करवाने वाले कलाकार थे राजा रवि वर्मा। इनके द्वारा ही लीथोग्राफ प्रेस की स्थापना की गयी। फलत: अधिक और सस्ते चित्रों का निर्माण होने से भारत के अधिकतर घरों में इनके चित्रों की पहुँच हुई। इनके चित्रों में लोगों को अपने भगवान नजर आये और उनकी पूजा भी हुई। अपने चित्रों के विषय और सजीवता के बल पर ही रवि वर्मा भारतीय जनमानस के दिलों पर राज करने लगे थे। कहना गलत न होगा कि रवि वर्मा जन-जन के चित्रकार हो गये थे। हालांकि विरोध हुआ, बहुत विरोध हुआ। अच्छे कार्यों का विरोध होता भी है, विरोध होना ही अच्छाई का परिचायक है। उनका भी हुआ लेकिन वह हारे नहीं चलते रहे। कला समीक्षक फ्रँक नोरिस का शब्द, जो कला अंत में लोगों द्वारा स्वीकृत नहीं होती वह जीवित नहीं रहती सार्थक सा हुआ जान पड़ता है क्योंकि समीक्षकों द्वारा नकारे गये चित्रकार रवि वर्मा लोगों द्वारा स्वीकृत हुए। फलत: उनकी कला आज भी जीवित है और हमेशा ही जीवित रहेगी।


समय शायद 1862 का रहा होगा बालक रविवर्मा के चाचा राजा वर्मा राज भवन की दीवारों पर तंजौर शैली में चित्र बना रहे थे। अचानक उन्हें कुछ विशेष कारण से थोड़ी देर के लिए बाहर जाना पड़ा। एकांत पाकर अंतस के प्रबल भावों के बल पर बालक रवि वर्मा जो मात्र 14 वर्ष का था, बेखौफ, निडर होकर उसने चित्र में रंग भरना शुरू कर दिया। साथ ही बचे हुए रेखा कार्यों को भी पूरा कर दिया जो एक आश्चर्य जनक बात थी। यहीं से रवि वर्मा का चित्रकार जाग्रत हुआ और प्रसिद्ध हुआ।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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