जबरन धर्मांतरण पर रोक बहुत जरूरी है

स्वामी रामकृष्ण परमहंस के अनन्य भक्त स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो (अमेरिका) में आयोजित धर्म संसद में कहा था, जो धर्म चिरकाल से जगत के समदर्शन और सर्वाधिक मत-ग्रहण की शिक्षा देता आया है, मैं उसी धर्म में शामिल अपने को गौरवान्वित महसूस करता हूं।

Created By : ashok on :04-12-2022 14:08:05 निशिकांत ठाकुर खबर सुनें

निशिकांत ठाकुर
स्वामी रामकृष्ण परमहंस के अनन्य भक्त स्वामी विवेकानंद ने 1893 में शिकागो (अमेरिका) में आयोजित धर्म संसद में कहा था, जो धर्म चिरकाल से जगत के समदर्शन और सर्वाधिक मत-ग्रहण की शिक्षा देता आया है, मैं उसी धर्म में शामिल अपने को गौरवान्वित महसूस करता हूं। हम लोग केवल दूसरे धर्मावलंबी के मतों के प्रति सहिष्णु हैं, ऐसा नहीं है, हम यह भी विश्वास करते हैं कि सभी धर्म सत्य हैं। जिस धर्म की पवित्र भाषा में अंग्रेजी 'एकस्क्लूशन' (अर्थात हेय या परित्याज्य) के शब्द का किसी भी तरह अनुवाद नहीं किया जा सकता है। मैं उसी धर्म से जुड़ा हूं। जो जाति पृथ्वी के समस्त धर्म और जाति के उत्पीड़ितों और शरणार्थियों को हमेशा से, खुले मन से, आश्रय देता आया है, मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने पर गर्व है। आप लोगों को यह बताते हुए मैं गौरव महसूस कर रहा हूं कि जिस वर्ष रोमन जाति के भयंकर उत्पीड़न और अत्याचार ने यहूदियों के पवित्र देवालय को चूर-चूर कर दिया था, उसी वर्ष यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट अंश दक्षिण भारत में आश्रय के लिए आया, तो हम लोगों ने उन लोगों को सादर ग्रहण किया और आज भी उन लोगों को अपने हृदय में धारण किए हुए हैं। ऐसे धर्म का अनुयायी होने में मैं गर्व महसूस करता हूं जिसने जोरोस्त्रियन के अनुयायियों और वृहद पारसी जाति के अवशिष्ट अंश को शरण दी थी और जिसका पालन वह आज तक कर रहा है। मैं उसी धर्म से जुड़ा हूं।

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संभवत: स्वामी विवेकानन्द की इसी उपरोक्त विवेचनात्मक उक्ति को ध्यान में रखकर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के विद्वान न्यायमूर्ति एमआर शाह और सीटी रविकुमार की पीठ ने भाजपा नेता और वकील अश्वनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर टिप्पणी की होगी। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता में अन्य लोगों को किसी विशेष धर्म में परिवर्तित करने का मौलिक अधिकार नहीं है। यह निश्चित रूप से धोखाधड़ी, जबरदस्ती या प्रलोभन के माध्यम से किसी व्यक्ति को परिवर्तित करने के अधिकार को स्वीकार नहीं करता है। धर्म परिवर्तन करवाना किसी का अधिकार नहीं हो सकता। धर्म परिवर्तन पर सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हलफनामे में यह जानकारी दी गई है। सरकार ने कहा है कि वह जबरन धर्म परिवर्तन के इस खतरे से परिचित है। ऐसी प्रथाओं पर काबू पाने वाले कानून समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक हैं।


ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय द्वारा एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें केंद्र और राज्यों को उपहार और मुद्रा प्रतिबंधों के माध्यम से डराने, धमकाने, धोखा देने और लालच देकर होने वाले धर्मांतरण को रोकने के लिए कदम उठाने का निर्देश देने की मांग की गई थी । उपाध्याय ने अपने अनुरोध में कहा था कि जबरन धर्म परिवर्तन एक राष्ट्रव्यापी समस्या है, जिसके तत्काल समाधान की आवश्यकता है। उपाध्याय ने प्रस्तुत किया था कि इस तरह के जबरन धर्मांतरण के शिकार अक्सर सामाजिक और आर्थिक रूप से अपरिचित लोग होते हैं। विशेष रूप से देखने वाली बात यह है कि ये सब अनुसूचित जाति और जनजाति के लोग होते हैं। हालांकि, सरकार इस तरह के खतरों के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने में विफल रही है। धोखाधड़ी, धोखा और डराने-धमकाने के माध्यम से ऐसे धर्मांतरण को व्यापक रूप से लेते हुए अदालत ने कहा कि यदि इस तरह के धार्मिक धर्मांतरणों को नहीं रोका जाता है, तो वे राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों के धर्म और विवेक की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। जस्टिस शाह और हिमा कोहली की सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से उन उपायों को बताने को कहा, जो सरकार लालच के माध्यम से जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए कर रही है। खंडपीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वह अपना रुख स्पष्ट करे और जवाब दे कि बल, छेड़खानी या धोखाधड़ी के माध्यम से इस तरह के जबरन धर्म परिवर्तन को रोकने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं। न्यायालय ने इस संबंध में कहा कि धर्म की स्वतंत्रता हो सकती है, लेकिन जबरन धर्म परिवर्तन से धर्म की स्वतंत्रता नहीं हो सकती है।

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भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने धर्मांतरण के खिलाफ राष्ट्रीय सहमति बनाए जाने पर बल दिया था । उन्होंने कहा था कि इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर बहस होनी चाहिए। आडवाणी के अनुसार धर्मांतरण के विरुद्ध अभियान किसी समुदाय के खिलाफ नहीं हो सकता है, और न ही होना चाहिए। संविधान विशेषज्ञ फैजान मुस्तफा लिखते हैं: धर्मांतरण विरोधी कानून पुराने आधार पर बनाए गए हैं कि महिलाओं, एससी और एसटी को सुरक्षा की जरूरत है, वे अपने दम पर महत्वपूर्ण निर्णय नहीं ले सकते हैं। वे एक जातिवादी और पितृसत्तात्मक समाज के सामाजिक पदों पर टिके रहते हैं। दुनिया में तीन ऐसे बड़े धर्म हैं जिनके कारण दुनियां में धर्मांतरण जैसा शब्द आया । यह बड़े धर्म हैं, बौद्ध, ईसाई और इस्लाम। तीनों ही धर्मों ने दुनिया के पुराने धर्मों के लोगों को अपने धर्मों में स्वेच्छा से दीक्षित किया और जबरन धर्मांतरित किया। उस काल में इन तीनों धर्मों के सामने थे हिंदू, यहूदी धर्म के अलावा दुनिया के कई तमाम छोटे और बड़े धर्म। भारत में प्राचीन काल से ही दो धर्म अस्तित्व में रहे पहला जैन और दूसरा हिंदू धर्म है। उन दोनों ही धर्मों के लोगों को धर्मांतरण के लिए कहीं कहीं स्वेच्छा से, तो अधिकतर मजबूरी मेें अपना धर्म छोड़कर दूसरा धर्म अपनाना पड़ा । प्राचीन काल से लेकर आज तक भारतीय समाज में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण होते आए हैं।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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