कबीरदास सचमुच बेजोड़ थे

सच कहा जाए, तो कबीर ईश्वर को उस रूप में नहीं मानते हैं जिस तरह आज भी लोग मानते हैं। वे ईश्वर की  परम सत्ता को स्वीकारते हुए तमाम तरह के आडंबर से बचने की सलाह देते हैं।

Created By : ashok on :31-10-2022 14:53:01 अशोक मिश्र खबर सुनें

अशोक मिश्र

हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने वाले आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कवियों में सूरदास, कबीरदास और तुलसीदास की बहुत सराहना की है। ये तीनों कवि अपने आप में बेजोड़ थे। इनकी एक दूसरे से तुलना नहीं की जा सकती है। अपने-अपने क्षेत्र के तीनों महारथी थे। लेकिन समाज सुधारक के रूप में कबीरदास का कोई जवाब नहीं है। कबीरदास के नाम से तो इन दिनों एक पंथ ही जल रहा है जिसे कबीरपंथी कहा जाता है। सच कहा जाए, तो कबीर ईश्वर को उस रूप में नहीं मानते हैं जिस तरह आज भी लोग मानते हैं। वे ईश्वर की परम सत्ता को स्वीकारते हुए तमाम तरह के आडंबर से बचने की सलाह देते हैं।

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कबीरदास का ईश्वर किसी मंदिर या मठ का मोहताज नहीं है। वह सर्वशक्तिमान और सर्वत्र विराजमान रहने वाला है। वह मंदिर में पूजा-पाठ करने या तमाम तरह के आडबंर करने से प्रसन्न होने वाला नहीं है। यदि सचमुच कबीरदास के अनुसार आचरण किया जाए, तो जीवन अत्यंत सरल, सहिष्णु और धार्मिक हो जाएगा। कबीरदास ने जिस परमब्रह्म की बात की है, वह दीन दुखियों का भला करने वाला है। वह जातिगत भेदभाव से दूर है। वह जितना प्रसन्न एक गरीब की आराधना से होता है, उतना ही उसे अमीर भी प्रिय हैं। उसके लिए अमीर-गरीब, सवर्ण-दलित, वैश्य, क्षत्रिय सब बराबर हैं।

जिस युग में कबीरदास पैदा हुए थे, उस समय धार्मिक पाखंड के खिलाफ कुछ कहना सरल नहीं था। लेकिन यह कबीरदास जी ही थे जिन्होंने बड़ी बेबाकी से अपनी बात समाज के सामने रखी और लोगों ने स्वीकार किया क्योंकि उनकी बात में तनिक भी झूठ नहीं था। यही वजह है आज भी कबीरदास पूजे जाते हैं।

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