कर्तव्य के बिना अधूरा है ज्ञान

जो व्यक्ति संयम, नियम और सदाचार का पालन करते हुए अपना जीवन व्यतीत करता है, उसके जीवन में सांसारिक बाधाएं बहुत कम आती हैं। शारीरिक व्याधि तो हो सकती है, लेकिन सामाजिक जीवन की तमाम दुश्वारियों से वह बचा रहता है।

Created By : ashok on :29-11-2022 15:37:42 अशोक मिश्र खबर सुनें

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र
जो व्यक्ति संयम, नियम और सदाचार का पालन करते हुए अपना जीवन व्यतीत करता है, उसके जीवन में सांसारिक बाधाएं बहुत कम आती हैं। शारीरिक व्याधि तो हो सकती है, लेकिन सामाजिक जीवन की तमाम दुश्वारियों से वह बचा रहता है। ईरान के एक संत थे। वह वैसे तो राजवंश में पैदा हुए थे, लेकिन पंद्रह साल की उम्र में ही उनका ध्यान और उपासना की ओर झुकाव होने लगा था। वे सांसारिक कार्यों से लगभग दूर होने लगे थे। उनका एक दुर्व्यसनी परिचित था, उसने काफी प्रयास किया कि वे उसकी तरह दुर्व्यसन में लिप्त हो जाएं, लेकिन अपनी मनोकामना में सफल नहीं हुआ।

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जब संत कुछ बड़े हुए तो उन्होंने लोगों को सत्य, अहिंसा, सदाचार, धर्म और दयालु होने का उपदेश देना शुरू किया। वे सबको आपस में प्रेम भाव से रहने और मिलजुलकर समस्याओं को सुलझाने की शिक्षा देते रहते थे। यही वजह थी कि वैक्ट्रिया का राजा उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुआ। उसने उन्हें अपना गुरु मान लिया और उनके सिखाए हुए मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। एक दिन संत से एक जिज्ञासु ने पूछा कि क्या ज्ञान प्राप्त करने से कल्याण संभव है? संत ने कहा कि ज्ञान प्राप्त करना बहुत अच्छा है, लेकिन प्राप्त ज्ञान को समाज के कल्याण के लिए उपयोग करना उससे भी श्रेष्ठ है। सिर्फ ज्ञान से न व्यक्ति का विकास हो सकता है, न समाज का।

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लेकिन यदि प्राप्त ज्ञान का कर्म के साथ समावेश हो जाए, तो दोनों का कल्याण हो सकता है। कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति ही अपना और समाज का भला कर सकता है। कर्तव्य ही ज्ञान को उपयोगी बनाता है। यह सुनकर जिज्ञासु ने संत को प्रणाम किया और चला गया। संत ने संयम और सदाचार का जीवन भर प्रचार किया। उनकी ख्याति ईरान में काफी दूर-दूर तक फैल गई।

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