उच्छृंखल तो नहीं बना रहा लिव इन रिलेशनशिप

जिस प्रेम विवाह या लिव इन रिलेशन की तारीफ करते हुए हमारे देश के आधुनिकतावादी थकते नहीं हैं, वह भारतीय संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रहा। हमारे यहां बिना विवाह किए एक साथ रहने की परंपरा कभी नहीं रही। जिसने भी ऐसा करने की हिम्मत दिखाई, उसे समाज के विरोध का सामना करना पड़ा।

Created By : ashok on :16-11-2022 14:43:00 संजय मग्गू खबर सुनें

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संजय मग्गू
मुंबई की श्रद्धा वाकर का जो हश्र हुआ, उसके बारे में सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आफताब पूनावाला का कृत्य न केवल घृणास्पद है, बल्कि निंदनीय भी। अभी तक मीडिया में जो रिपोर्ट्स आई हैं, उसके मुताबिक पकड़े जाने के बाद भी आफताब के चेहरे पर कोई शिकन नहीं दिखाई दे रही है। वैसे भी जिस व्यक्ति ने हत्या करने के बाद जिस तरह सुनियोजित ढंग से लाश के 35 टुकड़े किए हों और एक-एक करके दिल्ली के जंगलों में फेंक दिया हो, उससे किसी तरह के पश्चाताप की भावना की अपेक्षा करना, मूर्खता ही है। मुंबई के एक कॉल सेंटर में काम करने वाली श्रद्धा वाकर की आफताब पूनावाला से मुलाकात एक डेटिंग एप के जरिये हुई थी।

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इसके बाद दोनों में मुलाकात हुई, पहचान बढ़ी और प्रेम हुआ। यह सब कुछ ठीक वैसे ही हुआ, जैसा कि आमतौर पर एक प्रेम कहानी में होता है। लेकिन उसका अंत प्रेम कहानियों जैसा नहीं हुआ। सदियों से दुनिया भर की प्रेम कथाओं को पढ़कर देख लीजिए, प्रेम करने वालों ने एक दूसरे की हत्या नहीं की होगी। यही वजह है कि वे प्रेम कथाएं आज भी अमर हैं। प्रेमी-प्रेमियों की हत्याएं हुई हैं, लेकिन उन्होंने एक दूसरे को कभी नहीं मारा। जिस प्रेम विवाह या लिव इन रिलेशन की तारीफ करते हुए हमारे देश के आधुनिकतावादी थकते नहीं हैं, वह भारतीय संस्कृति का हिस्सा कभी नहीं रहा। हमारे यहां बिना विवाह किए एक साथ रहने की परंपरा कभी नहीं रही। जिसने भी ऐसा करने की हिम्मत दिखाई, उसे समाज के विरोध का सामना करना पड़ा। लिव इन रिलेशन पाश्चात्य सभ्यता से भारत में आया है। पश्चिमी देशों में समाज में इसकी स्वीकृति इसलिए है क्योंकि वहां का समाज हमारी तरह यौन वर्जनाओं में जकड़ा हुआ नहीं है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति की बेटी बिना विवाह किए मां बन जाती है, तो उनका सिर शर्म से नहीं झुकता है। पश्चिमी समाज में कुंवारी मां बनना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। यह दो वयस्क स्त्री-पुरुष के बीच का मसला है। इसमें न कानून हस्तक्षेप करता है, न समाज। इसलिए वहां लिव इन रिलेशन सफल भी है। लेकिन हमारा समाज इतना खुला भी नहीं है।

बिना विवाह किए साथ रहने और बच्चे को जन्म देने की घटना को समाज स्वीकार नहीं करता है। किसी को भी इस बात से कतई इनकार नहीं होगा कि दो वयस्क लोग अपने संबंध में फैसला लेने और उसके मुताबिक आचरण करने को स्वतंत्र हैं। लेकिन समाज और सामाजिक परंपराओं का भी तो कोई महत्व है। समाज की संरचना का उद्देश्य भी तो यही था कि व्यक्ति की बेलगाम इच्छाओं और कार्यकलापों पर समाज रूप अंकुश लगा रहे, ताकि समाज में एक स्थिरता बनी रहे, स्थायित्व बना रहे। विवाह जैसी संस्थाओं का पूरी दुनिया में हजारों साल से अस्तित्व इसीलिए बरकरार है क्योंकि इससे बेहतर व्यवस्था अभी तक प्रकाश में नहीं आई है। विवाह किसी भी धर्म या देश में हो, दो लोगों के बीच विवाह होने पर समाज के कुछ लोगों की भागीदारी होती है, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उनकी जिम्मेदारी पर विवाह होते हैं। ऐसे में विवाह के दौरान तय होने वाले दायित्वों को पति-पत्नी पूरा करने को बाध्य होते हैं, लेकिन लिव इन में ऐसा नहीं होता है। किसी की कोई जिम्मेदारी नहीं होती है।

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