लड़कियां प्रेम करें, लेकिन हमेशा सावधान जरूर रहें

यह एक ऐसा दुख है जिसे श्रद्धा के परिवार वाले कभी भुला नहीं पाएंगे। पर हमारा भारतीय समाज गिरे में शौक से लात मारता है। रेप की घटना होने पर हमारे देश के बुद्धिजीवी बड़े बड़े अक्षरों में लड़की और उसके माँ बाप के लिए गाइडलाइन्स तैयार करके छाप देते हैं।

Created By : ashok on :18-11-2022 13:57:16 नीरू शिवम खबर सुनें

नीरू शिवम
हृदय सदैव उलझन में डालता है, मस्तिष्क प्रैक्टिकल निर्णय सुना कर मसलों को और अधिक उलझाने का ही कार्य करता है। ऐसे में सुनी किसकी जाए? प्रेमी जन से पूछिए तो वे कहेंगे कि जिस हृदय में मेरे प्रेमास्पद का निवास है, वो हृदय मेरे लिए मंदिर के समान है। पूरी सृष्टि को प्रेमी की नजरों से देखने के दावे किए जाते हैं। मोहब्बत की जुबां यों मीठी चाशनी में डूबी हुई ही होती है। पर अगर किसी ज्ञानी से बात करें, तो वह व्यावहारिक बात कहेगा, वो हृदय को तुच्छ मानकर मस्तिष्क को ही सर्वोपरि मानेगा। एक दृष्टि से परखें तो उचित ही है, परन्तु हर बात के सदैव दो पहलू होते हैं। हृदय और मस्तिष्क की जंग तो प्राचीन काल से चली आ रही है तो ऐसे में निर्णय कैसे लिया जाए।

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अब विचारणीय यह है कि जिस समाज में हम रहते हैं, उससे सामंजस्य स्थापित करना है, तो मस्तिष्क को मानना ही होगा। हृदय की सलाह पर चलें तो हर गली में सोहनी- महिवाल, हीर रांझा और लैला मजनूं मिलेंगे। अब समाज की तरक्की इनके भरोसे तो हो नहीं सकती है न, पर यह भी उतना बड़ा सच है कि समाज में रहने के लिए प्रेम, करुणा, सहानुभूति जैसे संवेगों की भी आवश्यकता है। तो समाज को हृदय और मस्तिष्क में तालमेल बिठाने की आवश्यकता है और वो ही मार्ग सर्वोचित है। ऐसा सदियों से कहा जाता रहा है, भविष्य में भी कहा जाएगा।


अब आज के मुख्य प्रसंग पर आते हैं। मुद्दा है श्रद्धा और आफताब का। अगर हम धर्म की दृष्टि से इस संबंध को न परखें तो एक बात समझ लें कि हर रिश्ते का एक मनोविज्ञान होता है। किसी भी रिश्ते में पड़ने से पहले यह परखना बहुत जरूरी होता है कि प्रेम ही है या मात्र आकर्षण। अक्सर क्रश को प्रेम में लिया जाता है। ऐसा अक्सर और अधिकतर मामलों में होता है। फिर उस तनिक से आकर्षण के पीछे विवाह जैसा बड़ा कदम उठाना निरी मूर्खता है। श्रद्धा को कुछ ही दिनों बाद अवश्य ही अनुभव हो गया होगा कि इस रिश्ते की आयु अधिक नहीं है। अब ऐसे में दो बातें होती हैं। पहली तो यह कि अगर लड़की धन के मामले में आत्मनिर्भर है और उचित समय पर निर्णय लेना जानती है, तो शीघ्रता से सम्बन्ध विच्छेद कर लेगी। अगर मानसिक रूप से इतनी परिपक्व नहीं है, तो अति भावुकता में सम्बन्ध को बचाने का प्रयास करेगी। बस यहीं आकर प्राय: गलती हो जाती है क्योंकि जिस रिश्ते में परस्पर सम्मान नहीं है, एक दूसरे की परवाह करना नहीं है, एक दूसरे के सुख-दुख को समझने की मंशा ही नहीं है, वो रिश्ता कभी नहीं चल सकता है। भले ही दोनों में से कोई एक पक्ष कितना ही प्रयास कर ले। उनका अलग होना लाजिमी है। बात यहां तक भी ठीक थी। पर यहां अब सारी बात आफताब पर टिकी है।

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श्रद्धा की हत्या मात्र एक दिन में होने वाली घटना नहीं है। वो 35 टुकड़ों में कटने से पहले रोज न जाने कितनी ही मौतें मरी होगी। हिंसा करना पागलपन की निशानी है, पर क्रोध की अवस्था में किसी भी व्यक्ति का शव को 35 टुकड़ों में काट देना, एक भयंकर मानसिक डिसआॅर्डर को बताता है। यह असंभव है कि इसके चिह्न श्रद्धा को न मिलें हो, उसे जरूर ये आभास हो गया होगा कि आफताब मानसिक रूप से बीमार है। समय रहते उसने वहां से बचकर भागने की हिम्मत नहीं जुटाई जिसका परिणाम सबके सामने है। उसकी लाश के टुकड़े बरामद करने में पुलिस की सांसें फूल रही हैं। और हत्यारोपी आफताब कठघरे में भी मुस्कुरा रहा है।


यह एक ऐसा दुख है जिसे श्रद्धा के परिवार वाले कभी भुला नहीं पाएंगे। पर हमारा भारतीय समाज गिरे में शौक से लात मारता है। रेप की घटना होने पर हमारे देश के बुद्धिजीवी बड़े बड़े अक्षरों में लड़की और उसके माँ बाप के लिए गाइडलाइन्स तैयार करके छाप देते हैं। रेपिस्ट लड़के या उसके मां बाप के लिए कोई ज्ञान नहीं बघारता है। यही रीति है।

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खैर, चद्दर फटने पर अपने शरीर को ढकने का प्रयास खुद को ही करना होता है। बच्चियां बस इस बात का ध्यान रखें कि किसी भी रिश्ते में आने के पश्चात अपने आंख, नाक, कान खुले रखें। मुंह से प्यार की कसमें खाने के बाद भी लड़कों का व्यवहार ये बता देता है कि वस्तुत: प्रेम है भी या नहीं। वापिसी का एक मार्ग हमेशा खुला रखें, किसी भी रास्ते पर अंधाधुंध आगे न बढ़ती जाएं। तीसरी और अंतिम बात यह है कि अपनी हर शरारत अपने माता-पिता से शेयर करती रहें ताकि अवसर आने पर वो तुम्हारी गलती को सही तरीके से सुधार सकें।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं।)

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