अद्भुत अवसर है 21वीं सदी में रामेश्वर और विश्वेश्वर का मिलन

काशी एक बार फिर पूरी दुनिया के लिए नया अवसर लेकर आया है। तमिल संस्कृति के साथ मिलकर ज्ञान, शिक्षा और परंपराओं को आज की पीढ़ी को फिर से लोगों के सामने रख रहा है। हर उम्र के लोग काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रांगण में आकर इस ज्ञान गंगा में डुबकी लगा रहे हैं।

Created By : ashok on :04-12-2022 14:27:37 दीप्ति अंगरीश खबर सुनें

दीप्ति अंगरीश
काशी एक बार फिर पूरी दुनिया के लिए नया अवसर लेकर आया है। तमिल संस्कृति के साथ मिलकर ज्ञान, शिक्षा और परंपराओं को आज की पीढ़ी को फिर से लोगों के सामने रख रहा है। हर उम्र के लोग काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रांगण में आकर इस ज्ञान गंगा में डुबकी लगा रहे हैं। काशी और तमिलनाडु, दो सबसे संपन्न नदियों, गंगा और कावेरी-जिसे दक्षिण गंगा भी कहते हैं- के कारण से विशिष्ट हैं। इन नदियों के तटीय समाज में उन नदियों की पवित्रता समाहित है, और इनमें एक प्रकार की सांस्कृतिक और दाशर्निक एकता प्रदर्शित होती है। काशी के हनुमान घाट और केदार घाट पर जब तमिल मंत्रोच्चार के साथ पतितपावनी गंगा में स्नान करते हैं, तो तनिक भी अंतर नहीं होता कि ये काशी के पंडित नहीं हैं। ज्ञान और संस्कार के आधार पर दोनों एक-दूसरे के पूरक जान पड़ते हैं। तमिलवाासियों के मन में यह भाव अत्यंत प्रबल रहता है कि काशी की यात्रा और बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बिना हर तीर्थ निष्फल है। हनुमान घाट इलाके से केदार घाट तक फैले लघु तमिलनाडु, जहां पीढ़ियों से आकर बसे तमिल परिवार आज भी अपनी संस्कृति के साथ रह रहे हैं और रोज ही भजन मठ को जी रहे हैं।

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असल में, उत्तर प्रदेश में हो रहा काशी तमिल संगमम महान सांस्कृतिक उत्कर्ष का एक ऐसा ही पड़ाव है। आयोजन की ये अद्भुत कल्पना ना केवल भारत के दो सुदूर राज्यों को निकट लेकर आ रही है, बल्कि दुनिया भर में फैले भारतवंशियों को भी इससे जुड़ने का मोह प्रदान कर रही है। पहलू यह भी है कि काशी और तमिलनाडु के बीच सदियों पुराना संबंध है, जिसे इन दिनों काशी-तमिल संगमम में मनाया जा रहा है, जिसे भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा 17 नवम्बर-16 दिसम्बर, 2022 तक आयोजित किया जा रहा है।


देश में 19,500 से अधिक भाषा-बोलियां बोली जाती हैं जिनमें काशी और तमिलनाडु दुनिया की सबसे पुरानी भाषाओं-संस्कृत और तमिल-के केंद्र रहे हैं। सुब्रमण्यम भारती जैसे दिग्गज काशी में रहे, उन्होंने संस्कृत और हिंदी सीखी और स्थानीय संस्कृति को समृद्ध किया और तमिल में व्याख्यान दिए। तमिल के राष्ट्रकवि सुब्रह्मण्यम भारती ने 1898 में काशी आकर अपनी चार साल की पढ़ाई पूरी की थी और आप सभी के लिए ये एक रोचक तथ्य हो सकता है कि 1950 के बाद सिनेमा हॉल में सुबह का एक शो भी दक्षिण भारतीयों के लिए ही चला करता था। इतिहास बताता है कि अनेक तमिल राजाओं, प्रसिद्ध आध्यात्मिक संतों, कवियों और प्रसिद्ध लोगों ने तमिलनाडु में रामेश्वरम और उत्तर प्रदेश में वाराणसी के बीच तीर्थ यात्रा अवश्य की है और इसे अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार करने के लिए एक पवित्र कर्तव्य माना है। साहित्य में भी एक शास्त्रीय तमिल काव्य कालीथोगई काशी के महत्व को अद्भुत रूप में दर्शाता है। 15वीं शताब्दी में शिवकाशी की स्थापना करने वाले राजवंश के वंशज राजा अधिवीर पांडियन ने दक्षिण-पश्चिमी तमिलनाडु के तेनकासी में उन भक्तों के लिए शिव मंदिर बनवाया जो काशी की यात्रा नहीं कर सकते थे। 17वीं शताब्दी में तिरु नेलवेली में पैदा हुए संत कुमारगुरु पारा ने काशी पर कविताओं की व्याकरणिक रचना काशी कलमबकम लिखी, कुमारस्वामी मठ की स्थापना की।

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तमिलनाडु के नाट्कोट्टई क्षत्रम की ओर से काशी विश्वनाथ मंदिर में 210 वर्षों से निर्बाध 3 आरती की जाती हैं। आरती के लिए भस्मी और चंदन भी तमिलनाडु से ही मंगाया जाता है। वर्ष 1926 में काशी में अय्यर परिवार के सौजन्य से दक्षिण भारतीय व्यंजन परोसने की शुरुआत हो चुकी थी।


जहां काशी ने पंडित परंपरा को स्थापित किया, वहीं तमिलनाडु ने तमिल इलक्कियापरंबराई (तमिल साहित्यिक परंपरा) का उदय देखा। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के शिलान्यास समारोह में महान वैज्ञानिक सीवी रमन जैसे प्रतिष्ठित व्यक्ति उपस्थित और पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन कुलपति थे। काशी और चेन्नई, दोनों को यूनेस्को द्वारा संगीत के सृजनात्मक शहरों के रूप में मान्यता दी गई है और इस शानदार संबंध को इस रूप में देखा जा सकता है कि महान गायक, अभिनेत्री एवं भारत रत्न से सम्मानित एमएस सुब्बुलक्ष्मी ने काशी की प्रसिद्ध हिंदुस्तानी गायिका सिद्धेरी देवी से संगीत सीखा था। निश्चित तौर पर भारतीय सनातन संस्कृति के दो पौराणिक केंद्र विश्वेश्वर और रामेश्वर का मिलन सृजन और भावनात्मक संबंधों के नए द्वार खोलेगा।
(यह लेखिका के निजी विचार हैं।)

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