तेजी से गड़बड़ा रहा है प्रकृति का पारिस्थितिकी तंत्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर नामीबिया से आए आठ चीतों को मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ा गया था। कूनो राष्ट्रीय पार्क में छोड़ने का कार्य भी प्रधानमंत्री ने किया था। इस बात को लेकर विपक्षी दलों ने खूब हो-हल्ला भी मचाया था। इन चीतों के भोजन के रूप में सैकड़ों चीतलों को छोड़ने की भी खूब आलोचना की गई।

Created By : Manuj on :02-10-2022 22:49:25 -संजय मग्गू खबर सुनें

संजय मग्गू
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर नामीबिया से आए आठ चीतों को मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो राष्ट्रीय उद्यान में छोड़ा गया था। कूनो राष्ट्रीय पार्क में छोड़ने का कार्य भी प्रधानमंत्री ने किया था। इस बात को लेकर विपक्षी दलों ने खूब हो-हल्ला भी मचाया था। इन चीतों के भोजन के रूप में सैकड़ों चीतलों को छोड़ने की भी खूब आलोचना की गई। अब यह भी कहा जाने लगा है कि नामीबियाई चीते अब गायों का भी शिकार करने लगे हैं। यह तो थी राजनीतिक बातें। दरअसल, यह कोई नई बात नहीं है।

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सदियों से ऐसा होता आया है। जो लोग ईको सिस्टम को समझते हैं, वह इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि प्रकृति ने हर क्षेत्र में संतुलन की व्यवस्था कर रखी है। यदि जंगलों में हिंस्र पशु न हों, तो अहिंस्र पशुओं की आबादी इतनी ज्यादा बढ़ जाएगी जिसकी वजह से ईको सिस्टम यानी प्रकृति का पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा जाएगा। चूँकि हमारा ईको सिस्टम एक जटिल कार्यप्रणाली है जिसे हम अपनी आंखों से देखकर कभी समझ नहीं सकते हैं। हम यह कभी नहीं समझ पाते हैं कि जंगल, मैदान, नदी, पेड़-पौधे और जानवर कैसे मिलकर हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं। इसको समझने के लिए अमेरिका के येलोस्टोन नेशनल पार्क की वर्तमान और 25 साल पहले के हालात पर विचार करना होगा। आपको बता दें कि येलोस्टोन नेशनल पार्क नौ हजार वर्ग किमी के दायरे में फैला हुआ है।

आज से पच्चीस साल पहले इस पार्क के आसपास रहने वाली आबादी ने बर्फ में रहने वाले सफेद भेड़ियों का शिकार करके उन्हें खत्म कर दिया। नतीजा यह हुआ कि यहां का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ गया और धीरे-धीरे अन्य प्रजातियों के जानवर भी खत्म हो गए। येलोस्टोन नेशनल पार्क बरबाद हो गया। पारिस्थितिकी तंत्र के विशेषज्ञों की सलाह पर अमेरिकी सरकार ने कनाडा से 31 सफेद भेड़ियों को मंगाकर येलोस्टोन नेशनल पार्क में छोड़ दिया। कुछ ही साल बाद इसके सकारात्मक नतीजे सामने आए। इन भेड़ियों ने बीमार और कमजोर बारह सिंघों को खाना शुरू किया तो स्वस्थ बारहसिंघे जंगलों में भाग गए। बारहसिंघे पार्क से भागे तो वहां रहने वाले भैंसों का शिकार करना भेड़ियों ने शुरू किया। नतीजा यह हुआ कि जो पेड़-पौधे शाकाहारी पशुओं के कारण खत्म हो गए थे, वे पुन: उगने लगे। पेड़ों पर रहने वाली चिड़ियां, कीट पतंगे और अन्य जानवर भी वापस लौट आए। ऊदबिलाव आए, तो नदियों में मछलियों की संख्या भी बढ़ी। मछलियों के बढ़ने से कौवे, बगुले और सारस जैसी प्रजाति के पक्षी भी येलोस्टोन में दिखने लगे, लेकिन इन सबकी संख्या न तो बहुत रही और न ही बहुत कम। सब कुछ संतुलित। प्रकृति का पारिस्थितिकी तंत्र बताता है कि हमारे आसपास स्थित वनों या अभयारण्यों से जैसे ही हिंस्र पशु गायब हो जाते हैं, वैसे ही हमारा ईको सिस्टम गड़बड़ाने लगता है।

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हमें इस बात को अच्छी तरह से समझ लेना होगा कि खूंखार माँसाहारी जानवर जिस भी क्षेत्र से गायब हो जाते हैं, वहां का पर्यावरण संतुलन पूरी तरह से बिगड़ जाता है क्योंकि ये जानवर ही पारिस्थितिकी तंत्र के शिखर पर बैठकर वनस्पतियों और नदियों की रक्षा करके दूसरे अन्य जीवों को पनपने का अवसर प्रदान करते हैं। अमेरिका के येलोस्टोन नेशनल पार्क की बात छोड़ दें, तो हमारे हिमालयी क्षेत्र के जंगलों में रहने वाले हिंस्र पशु चीते, तेंदुए अब नगरों में भी कभी-कभार दिख जाते हैं। इसका कारण यह है कि हमने इन हिंस्र पशुओं को भोजन उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले जंगलों को काटकर मैदान बना दिया है। वन क्षेत्र घटने से शाकाहारी पशु भी नाममात्र को रह गए। नतीजा यह हुआ कि भोजन की तलाश में हिंस्र पशु नगरों की ओर रुख करने लगे, तो हमें दिक्कत होने लगी। यहि हमें इससे बचना है कि हमें प्रकृति से छेड़छाड़ बंद करनी होगी।

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