उम्मीद की नई किरण, सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन दायर

दिल्ली के 10 साल पुराने छावला गैंग रेप मर्डर केस में पीड़िता के परिवार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक रिव्यू पिटिशन दायर कर कोर्ट से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है।

Created By : - on :07-12-2022 15:24:35 कैलाश शर्मा खबर सुनें


कैलाश शर्मा
दिल्ली के 10 साल पुराने छावला गैंग रेप मर्डर केस में पीड़िता के परिवार ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में एक रिव्यू पिटिशन दायर कर कोर्ट से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की है। सुप्रीम कोर्ट ने छावला गैंग रेप मर्डर के सभी आरोपियों को 7 नवंबर को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। पीड़िता के परिजनों ने अपील में कहा है कि इस मामले में कई तथ्यों की व्याख्या सही ढंग से नहीं हो पाई है। इससे पहले दिल्ली के राज्यपाल की मंजूरी मिलने पर दिल्ली पुलिस ने भी सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दायर करके सुप्रीम कोर्ट से अपने फैसले पर फिर से विचार करने की मांग की है। यहां यह जानना बहुत जरूरी है कि छावला गैंग रेप मर्डर केस में पहले लोअर कोर्ट ने घटना को जघन्य अपराध मानते हुए दोषियों को फांसी की सजा सुनाई थी जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था। हाईकोर्ट ने दोषियों के लिए बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था- ये वो हिंसक जानवर हैं, जो सड़कों पर शिकार ढूंढते हैं। दोषियों ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। जिस पर पक्ष विपक्ष की दलीलों को सुनने व सबूतों के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने लोअर कोर्ट व हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए दोषियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। इससे पीड़िता के परिवार के साथ साथ सभी को काफी आश्चर्य हुआ और दुख भी हुआ।

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अब प्रश्न यह है कि घटित जघन्य अपराध के लिए ये लोग दोषी नहीं, तो और कौन? गौरतलब है कि 9 फरवरी 2012 को उत्तराखंड की 19 साल की लड़की का अपहरण किया गया था। 14 फरवरी 2012 को हरियाणा के रेवाड़ी में उसकी जली हुई बॉडी मिली थी। उसे दिल्ली के छावला से अगवा कर गैंगरेप किया गया था। लड़की का सही नाम छुपा कर उसे छावला नाम दिया गया था। गैंगरेप के दौरान उसके शरीर को सिगरेट से दागा और चेहरे पर तेजाब डाला गया। उसके शरीर पर कार में रखे औजारों से हमला किया गया। इसके बाद हत्या कर दी। इस केस में रवि कुमार, राहुल और विनोद को आरोपी बनाया गया था। गैंगरेप के 2 साल बाद 2014 में निचली अदालत ने रवि, राहुल और विनोद को दोषी पाया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई। हाईकोर्ट ने भी फांसी की सजा को बरकरार रखा था।


छावला गैंगरेप के खिलाफ दिल्ली में कई प्रदर्शन भी हुए थे। दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट में सजा कम करने की अपील की। जिसका पुलिस ने विरोध करते हुए कहा था कि यह अपराध केवल पीड़िता के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह समाज के खिलाफ अपराध है। दिल्ली पुलिस ने कहा था कि यह जघन्य अपराध है। एडिशनल सॉलिसिटर ने भी कहा कि लड़की के शरीर पर 16 गंभीर चोटें थीं। लड़की की मौत के बाद उस पर 10 वार किए गए। पीड़ित लड़की के पिता ने भी कहा था कि मामले के दोषियों को फांसी की सजा बरकरार रखी जाए। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कॉर्ट ने कहा कि भावनाओं को देखकर सजा नहीं दी जा सकती है। सजा तर्क और सबूत के आधार पर दी जाती है। अदालत को पुलिस जांच में कमियां दिखीं। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पुलिस ने ठीक से जांच नहीं की। जांच से कहीं साबित नहीं होता कि अपराध इन तीनों ने ही किया। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस ललित, जस्टिस एस रवींद्र भट और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी की बेंच ने पुलिस की जांच में कमी के चलते दोषियों को बेनिफिट आॅफ डाउट देते हुए रिहा कर दिया। दोषियों की रिहाई पर लड़की के पिता ने कहा कि हम यहां न्याय के लिए आए थे। यह अंधी कानून व्यवस्था है। दोषियों ने हमें कोर्ट रूम में ही धमकाया था। हमारे 12 साल के संघर्ष को नजरअंदाज कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हम टूट गए हैं, लेकिन कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे।

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अंत में यही कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर अगर निचली अदालत ने, जांच एजेंसी ने,जांच अधिकारी ने जांच में गलती की है तो जांच अधिकारी को जेल भेजना चाहिए। अपर्याप्त सबूत के आधार पर सजा सुनाने वाले निचली अदालत के जज को छुट्टी पर भेज देना चाहिए इससे कम से कम भविष्य में इस तरह के मामलों की जांच करते समय जांच अधिकारी ठीक तरीके से जांच तो करेंगे। एक बात और जिस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को संदेह का लाभ का देते हुए बरी किया है उस फैसले में यह जरूर कहा है कि ट्रॉयल कोर्ट चाहे तो दोबारा नए सबूत मंगा सकती है और विचार कर सकती है कि अपराधी कौन था?
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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