खाद्यान्न संकट से बचाएगा तो गेहूं ही

जब किसी प्राचीन काल में उगाई जाने वाली और अपने आप उगने वाली जंगली प्रजाति की फसलें विपरीत परिस्थितियों में उगने की क्षमता रखती थीं। यही वजह है कि कृषि वैज्ञानिकों की निगाह अब गेहूं की जंगली प्रजाति पर आकर टिक गई है।

Created By : ashok on :30-11-2022 14:56:46 संजय मग्गू खबर सुनें

त्वरित टिप्पणी

संजय मग्गू
यह तो सभी जानते हैं कि पूरी दुनिया में कुपोषण और भूखे रहने वालों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है। जब से रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ है, तब से यह संकट और बढ़ गया है। इसके साथ ही साथ क्लाइमेट चेंज ने भी हमारे सामने एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है। फसलों के लिए अनुकूल मौसम न होने से अनाज की पैदावार लगातार घट रही है। ऐसे में हमारी भोजन की जरूरतों को केवल गेहूं की उपज ही पूरा कर सकती है, वह भी इन दिनों उगाई जाने वाली गेहूं की प्रजाति नहीं। आज से दो से ढाई हजार साल पहले अपने आप उगने वाली गेहूं की जंगली प्रजाति। अब सवाल यह है कि इतनी पुरानी गेहूं की जंगली प्रजाति के दाने अब मिलेंगे कहां? तो इसका सीधा सा जवाब यह है कि दुनिया भर के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम में रखे गेहूं की प्रजातियों को वैज्ञानिक अध्ययन कर रहे हैं।

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उनका मानना है कि वर्तमान गेहूं की प्रजातियों का जलवायु परिवर्तन की वजह से उत्पादन घटता जा रहा है। प्रकृति में आने वाले परिवर्तन और कीटनाशकों के उपयोग से फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीट-पतंगे प्रतिरोधक क्षमता में हासिल कर ले रहे हैं जिसकी वजह से कीटनाशकों का प्रभाव कम होता जा रहा है। पूरी दुनिया में जब हरित क्रांति का अभियान शुरू हुआ, तो भारत सहित सभी जगहों पर ऐसी फसलों को जो संकर थीं, उगाने पर जोर दिया गया जो जल्दी तैयार हो जाती थीं और ज्यादा उत्पादन देती थीं। इसके लिए अंधाधुंध रासायनिक खादों का भी उपयोग किया जाने लगा। नतीजा यह हुआ कि विभिन्न फसलों की प्रजातियों में विपरीत परिस्थितियों में उगने की क्षमता लगातार घटती गई। अब थोड़ा सा भी मौसम प्रतिकूल होता है, तो विभिन्न फसलों का उत्पादन घट जाता है।

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जब किसी प्राचीन काल में उगाई जाने वाली और अपने आप उगने वाली जंगली प्रजाति की फसलें विपरीत परिस्थितियों में उगने की क्षमता रखती थीं। यही वजह है कि कृषि वैज्ञानिकों की निगाह अब गेहूं की जंगली प्रजाति पर आकर टिक गई है। उन्होंने 1700 ईस्वी पूर्व की गेहूं की एक प्रजाति का अध्ययन करना शुरू कर दिया है। उनका मानना है कि यदि इस दिशा में जल्दी ही कुछ नहीं किया गया, तो वर्ष 2050 तक जो आबादी होगी, उसके लिए वर्तमान अनाज उत्पादन का 60 प्रतिशत ज्यादा उगाना होगा, तभी पूरी दुनिया की आबादी का पेट भर पाना संभव हो पाएगा। इस बात को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी समझते हैं। यही वजह है कि वे पिछले साल से ही मिलेट ग्रेन्स उगाने पर जोर दे रहे हैं। मिलेट ग्रेन्स का मतलब है मोटा अनाज जिसका उपयोग करना आज के दौर में बिल्कुल कम हो गया है। मोटा अनाज खाना मतलब अपना स्टेटस घटाना भी हो गया है। लेकिन जैसी परिस्थितियां पैदा हो रही हैं, उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि भविष्य में यही मोटे अनाज पूरी दुनिया की भूख मिटाएंगे। वैसे दुनिया भर के वैज्ञानिक आधुनिक जीवन शैली की वजह से होने वाले रोगों के मूल में चावल को मानते हैं। यही वजह है कि अमेरिका में चावल का बहिष्कार होने लगा है। मोटे अनाज की ओर लोग आकर्षित हो रहे हैं।

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