सावरकर के योगदान पर सियासी कोलाहल

एक व्यक्ति के दो चेहरे। उनका नाम है विनायक दामोदर सावरकर। बीजेपी के लिए वीर सावरकर राष्ट्र भक्त हैं। जबकि राहुल गांधी ऐसा नहीं मानते। वीर सावरकार को समझना है। जानना है। तो उन्हें दो हिस्सों में देखना होगा।

Created By : ashok on :28-11-2022 15:24:07 रमेश तिवारी ‘रिपु’ खबर सुनें

रमेश तिवारी ‘रिपु’
एक व्यक्ति के दो चेहरे। उनका नाम है विनायक दामोदर सावरकर। बीजेपी के लिए वीर सावरकर राष्ट्र भक्त हैं। जबकि राहुल गांधी ऐसा नहीं मानते। वीर सावरकार को समझना है। जानना है। तो उन्हें दो हिस्सों में देखना होगा। अंडमान जाने के पहले के सावरकर और अंडमान से आने के बाद के सावरकर के बीच के अंतर को समझना होगा। कांग्रेस से जुड़े लोग अंडमान से पहले की पूरी अवधि की बात नहीं करते। उनके जेल जाने के बाद की गतिविधियों की बात करते हैं। वहीं बीजेपी उनके माफीनामा और उसके बाद की बातों को नजर अंदाज करके देखती है। कांग्रेस भी मानती है, जेल जाने से पहले वे क्रांतिकारी थे। जेल से आने के बाद उनका देश के प्रति और देश की आजादी के लिए आंदोलन करने वालों के प्रति दृष्टिकोण बदल गया। वे ब्रितानी सरकार के समर्थक हो गए। सावरकर के आलोचक मानते हैं कि सावरकर ने सन 1937 में रिहा होने से लेकर सन 1966 में अपनी मृत्यु तक महात्मा गांधी के खिलाफ माहौल बनाने के सिवा कुछ नहीं किया। उन्हें पचास साल काला पानी की सजा हुई। लेकिन दस साल ही रहे। 1923 में वे भारत हिन्दू राष्ट्र किताब लिख कर अंग्रेजों की मदद करने का मन बनाया। अंग्रेजों ने उन्हें हिन्दू महासभा को संगठित करने का अधिकार दे दिया। उनकी पेशन 60 रुपये महीना तय कर दी गई। सावरकर ने इंग्लैंड की रानी को लिखा था कि आप हिंदुस्तान को नेपाल के राजा को दे दें। क्यों कि नेपाल का राजा सारी दुनिया के हिन्दुओं का राजा है। हिन्दू महासभा का सेशन नेपाल के राजा को सलामी देकर शुरू होता था और उनकी लम्बी आयु की कामना पर खत्म होता था।

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सावरकर को लेकर कांग्रेस में आज भी कई तरह का संदेह है। क्यों कि सन 1948 में मुंबई पुलिस ने सावरकर को गांधी जी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के शक में छह दिनों बाद गिरफ्तार कर लिया था। उन्हें फरवरी 1949 में बरी किया गया। गांधी जी हत्या की जांँच कर रही है कपूर कमीशन की रिपोर्ट में सावरकर को दोष मुक्त नहीं माना गया था। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गाँधी की हत्या के बाद 27 फरवरी 1948 को पंडित नेहरू को लिखे खत में कहा था, सावरकर के अधीन हिंदू महासभा है। यह एक कट्टर शाखा है। जिसने ये साजिश रची और उसे अंजाम दिया। 18 जुलाई 1948 को श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखे एक खत में गाँधी की हत्या के बारे में सरदार पटेल ने कहा था कि उन्हें मिली जानकारी इस बात की पुष्टि करती है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिन्दू महासभा की गतिविधियों के परिणाम स्वरूप देश में एक ऐसा माहौल बना था जिसमें ये भयानक त्रासदी संभव हुई। जाहिर सी बात है, इन्हीं सब तथ्यों की वजह से सावरकर के प्रति कांग्रेस के नेताओं की धारणा अलग हटकर है। दूसरी ओर इंदिरा गांधी ने 1966 में सावरकर के निधन पर उन्हें क्रांतिकारी कहा था। यह भी कहा कि सावरकर ने अपने कार्यों से देश को प्रेरित किया था। सावरकर ने सेल्यूलर जेल में मां भारती की स्तुति में छह हजार कविताएं जेल की दीवारों में लिखी। उन्होंने कविता कोयले और पत्थर से लिखा। लिखी कविता को कंठस्थ भी कर लिया था।


सावरकर को 1910 में नासिक के कलेक्टर की हत्या में शामिल होने के आरोप में लंदन में गिरफ्तारी के बाद काला पानी की सजा मिली। सावरकर ने अंडमान की सेल्यूलर जेल में सन 1913 और 1920 के बीच दया याचिका दायर की थी। उसमें लिखा था, सरकार अगर कृपा और दया दिखाते हुए मुझे रिहा करती है, तो मैं संवैधानिक प्रगति और अंग्रेजी सरकार के प्रति वफादारी का कट्टर समर्थक रहूँगा, जो उस प्रगति के लिए पहली शर्त है। मैं सरकार की किसी भी हैसियत से सेवा करने के लिए तैयार हूँ, जैसा मेरा रूपांतरण ईमानदार है, मुझे आशा है कि मेरा भविष्य का आचरण भी वैसा ही होगा। मुझे जेल में रखकर कुछ हासिल नहीं होगा, बल्कि रिहा करने पर उससे कहीं ज्यादा हासिल होगा। सर मैं आपका नौकर बन कर रहना चाहता हूँ।

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सावरकर पर आरोप है कि रिहाई के बाद ब्रितानी सरकार हर महीने 60 रुपये की पेंशन देती थी, इसलिए वे ब्रितानी सरकार के काम काज को अच्छा बताते थे। स्वतंत्रता आंदोलन से खुद को दूर रखा। वहीं सावरकर के प्रशंसक कहते हैं, सावरकर ने दया याचिकाएं नहीं बल्कि आत्म समर्पण याचिकाएं दायर की थी। उन्हें पेशन नहीं, बल्कि नजरबंदी भत्ता दिया जाता था, गुजारे के लिए। जो कि डेढ़ साल बाद दिया गया। इसलिए कि उनकी एलएलबी की डिग्री मुंबई विश्वविद्यालय ने रद्द कर दी थी। उनकी वकालत पर प्रतिबंध लग गया था। अगर उन्होंने अंग्रेजों से समझौता किया होता तो वो अपनी संपत्ति वापस मांगते। कांग्रेस सावरकर के जरिये बीजेपी को घेरना चाहती है। क्यों कि बीजेपी और आरएसएस सावरकर को देशभक्त के रूप में प्रचारित बरसों से कर रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने यह कहकर विवाद को हवा दिया कि सावरकर को साजिश के तहत बदनाम किया गया है। उन्होंने अंग्रेजों के सामने दया याचिकाएं महात्मा गाँधी के कहने पर दायर की थी। वीर सावरकर एलएलबी थे। बौद्धिक थे। वो गांधी के कहने पर दया याचिका लिखे होंगे, ऐसा नहीं लगता। सावरकर की राजनीति किसी पार्टी के लिए नफा नुकसान का मुद्दा हो सकता है। लेकिन देश हित में जायज नहीं है। चूंकि महाराष्ट्र में सावरकर का बड़ा सम्मान है। सावरकर की चिट्ठी के जरिये राहुल उनकी देश भक्ति पर सवाल यूंँ ही खड़े नहीं किये हैं। कई सियासी वजह हो सकती है। वहीं उनके बयान पर भारत जोड़ो यात्रा में कोई बवाल होता,तो ठिकरा शिंदे की सरकार और बीजेपी पर फोड़ते। फिर गुजरात के चुनाव में उसे मुद्दा बनाया जाता।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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