महाराष्ट्र के सियासी संकट में खुलकर सामने नहीं आ रही भाजपा, जानें इंतजार की वजह

महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे सरकार पर संकट में घिरी है। पर भाजपा खामोश हैं। भाजपा ना खुलकर सामने ही आ रही है व ना ही सरकार बनाने की दिशा में कदम बढ़ा रही है। वहीं एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के दो तिहाई विधायकों को लेकर असम में डेरा डाल रखा है। वहीं अब प्रश्न उठता है कि भाजपा आखिर क्यों वेट एंड वाच के मूड में दिख रही है?

Created By : Shiv Kumar on :24-06-2022 14:45:43 महाराष्ट्र के सियासी संकट खबर सुनें

एजेंसी, दिल्ली
महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के बगावत के बाद से उद्धव ठाकरे सरकार पर संकट के बादल छाए हुए हैं। वहीं भाजपा सरकार बनाने से केवल एक कदम दूर है, लेकिन बीजेपी अपने सियासी पत्ते खोलने से बच रही। भाजपा खुलकर सामने आने की जगह फूंक-फूंककर कदम बढ़ा रही है। साथ ही भाजपा उद्धव सरकार के खुद ही गिरने का इंतजार कर रही है। किसी भी दशा में भाजपा उद्धव सरकार को गिराने का आरोप अपने सिर नहीं लेना चाहती। भाजपा चौकन्नी है व जोर दे कह रही है कि इस बगावत से उसका कोई लेना-देना नहीं है, शिवसेना का यह आंतरिक मसला है।

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उद्धव ठाकरे के करीबी रहे एकनाथ शिंदे की बगावत ने महा विकास अघाड़ी गठबंधन सरकार के भाग्य पर ग्रहण लगा दिया है। शिवसेना नेता बेशक इस संकट के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं पर वो शांत है। भाजपा खुलकर सामने आने की जगह अच्छे वक्त के इंतजार में है। वर्ष 2019 में बीजेपी एनसीपी नेता अजित पवार के साथ जल्दबाजी में सरकार बनाकर धोखा खा चुकी है, इसलिए अब कोई जल्दबाजी नहीं दिखा रही हैं। श‍िवसेना में बगावत कर एकनाथ श‍िंदे पार्टी के दो तिहाई के करीब व‍िधायक के साथ गुजरात व अब असम में डेरा जमाकर बैठे हैं। भाजपा एक ओर स्वयं से इस घटनाक्रम को श‍िवसेना का अंदरुनी केस बता रही है। वहीं दूसरी ओर बागी व‍िधायकों के ठहरने व सुरक्षा के इंतजाम भाजपा शास‍ित गुजरात व असम में क‍िए गए हैं। यहां सुरक्षा ऐसी है क‍ि कोई बाहरी पर‍िंदा भी पर नहीं मार सकता है। इस स‍ियासी बगावत से यदि क‍िसी को लाठा होने वाला है तो वह सिर्फ एक पार्टी भाजपा ही है।
आपको बता दें कि साल 2019 में भाजपा च शिवसेना गठबंधन में साथ रहते हुए विस चुनाव लड़ा था। चुनाव में इस गठबंधन को प्रचंड जीत मिली लेकिन फिर मुख्यमंत्री पद को लेकर शिवसेना ने भापजा से नाता तोड़कर अपनी व‍िरोधी रही कांग्रेस व एनसीपी के साथ हाथ मिलाकर सरकार बना ली थी, पर ढाई वर्ष के बाद मंत्री एकनाथ शिंद बागी हो गए व दो तिहाई विधायकों को साथ लेकर उद्धव सरकार की सत्ता से विदाई की पटकथा लिख दी है। उद्धव के हाथों से निकलती सत्ता को देखते हुए भी भाजपा ना तो खुलकर सामने आ रही हैं व ना ही सरकार बनाने में कोई जल्दी दिखा रही। इसका एक बड़ा कारण ये है कि भापजा उद्धव सरकार को गिराकर शिवसेना को सहानुभूति लेने व मराठा कार्ड खेलने देने का भी मौका नहीं देना चाहती। दूसरा कारण ये भी है कि 2019 वाली महाराष्ट्र व 2020 वाली राजस्थान वाली गलती दोहराना नहीं चाहती।

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साल 2019 में एनसीपी नेता अजित पवार संग भाजपा ने सरकार बनाने का प्रयास किया था। पूर्व सीएम फडणवीस को कुर्सी तो मिली थी पर वह मात्र 80 घंटे ही पद पर रह पाए थे। इससे भाजपा को अच्छी खासी फजीहत झेलनी पड़ी थी। इस कड़वे अनुभव की वजह से इस बार भाजपा ठोस संभावना ना बनने तक स्वयं को दूर रख रही है, क्योंकि फिर से भाजपा उस गलती को दोहराना नहीं चाहती। दूसरा कारण ये भी है कि कहीं मुंबई लौटने पर शिवसेना के बागी विधायक कहीं कुछ वापस उद्धव खेमे में ना वापस चले जाएं। ऐसी घटना राजस्थान में सचिन पायलट केस में भाजपा देख चुकी है। कांग्रेस ने उस वक्त बीजेपी पर राज्य में गहलोत सरकार को अस्थिर करने व उसके एमएलए की खरीद-फरोख्त के प्रयास करने का आरोप लगाया था। अपनी सरकार बचाने में कांग्रेस सफल रही थी। इस तर्ज पर महाराष्ट्र केस में शिवसेना व एनसीपी इसी इंतजार में है कि बागी विधायक मुंबई वापस आएं। शरद पवार कह चुके हैं कि मुंबई आने पर हालात चेंज होंगे तो उद्धव ने कहा कि शिवसेना के विधायक हमारे सामने आकर बात करें।

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