बिरसा मुंडा और उनके जनजागरण का स्मरण

बिरसा द्वारा चलाए जा रहे सामाजिक जन जागरण के कार्यों से अंग्रेज सरकार घबरा गई थी। बिरसा धर्मांतरण के विरुद्ध भी काम कर रहे थे और अंग्रेजी साम्राज्य के अत्याचारों के विरुद्ध आंदोलन भी चला रहे थे।

Created By : ashok on :15-11-2022 15:00:49 गिरीश पंकज खबर सुनें

गिरीश पंकज
आज 'जनजातीय गौरव दिवस' है। भारत सरकार ने महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा के जन्मदिन (15 नवंबर, 1875) को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने की मंजूरी दी है। बिरसा मुंडा आदिवासियों में भगवान की तरह पूजे जाते हैं। उनका पूरा जीवन हम देखें तो वह आदिवासी बंधुओं के उत्थान के लिए ही समर्पित था। अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन के लिए भी उन्होंने आदिवासी बन्धुओं को प्रेरित किया। अंग्रेजों के अत्याचार के विरुद्ध निरंतर आंदोलन किए। गिरफ्तार भी हुए और कहा जा सकता है कि एक साजिश की तहत उनकी जान भी ले ली गई। बिरसा मुंडा ने ईसाइयों द्वारा किए जा रहे धर्मांतरण का खुलकर विरोध किया। यही कारण है कि उनका दमन होता रहा। अंग्रेजों के विरुद्ध उस समय मुंडा, भील, खासी, मिजो, सन्थाल, तामार और कोल समुदाय के लोग आंदोलनरत थे। जैसे छत्तीसगढ़ के बस्तर में भूमकाल आंदोलन चलता रहा जिसके महानायक थे गुंडाधूर। यह बेहद अद्भुत बात है कि आज जिसे हम जनजाति समाज का कहकर संबोधित करते हैं या वनवासी अथवा आदिवासी कहते हैं, वे बंधु आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। न केवल हिस्सा ले रहे थे, वरन अपने अधिकार के लिए, संस्कृति की रक्षा के लिए भी समर्पित थे।

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बिरसा मुंडा प्रगतिशील चिंतन से संपृक्त सुधारवादी आदिवासी नेता थे। उन्होंने अपने समाज में व्याप्त अंधविश्वास के विरुद्ध जागरण शुरू किया। ईसाई समाज द्वारा धर्म परिवर्तन की कोशिशों के विरुद्ध बिरसा मुंडा लगातार लगे रहे। उन्होंने अपने आंदोलन के कुछ सुधारवादी सूत्र विकसित किए थे, जो आज भी हमें सोचने पर विवश करते हैं। उन्होंने लोगों को समझाया कि जीव हत्या ठीक बात नहीं। बलि देना गलत है। सभी जीवों से हम प्रेम करें। उनके प्रति दया भाव रखें। उन्होंने शराब पीने से भी मना किया। आदिवासी समाज की एकता और संगठन पर जोर दिया। सादा जीवन उच्च विचार भी उनका मंत्र था। बिरसा जनेऊ को पवित्र मानते थे और सब से अनुरोध करते थे कि तुम लोग जनेऊ धारण करो। उन्होंने एक और अच्छी बात कही कि किसी का जूठा मत खाओ और दूसरे धर्मावलंबियों से विवाह मत करो। इस बात के लिए प्रेरित करने के पीछे उद्देश्य यही था कि कुछ चालाक ईसाई प्रलोभन देकर आदिवासी बंधुओं को धर्मांतरित ईसाइयों के साथ वैवाहिक संबंध बनाने के लिए उकसाते थे।


बिरसा मुंडा एक धूमकेतु की तरह अवतरित हुए थे। अगर आज उन्हें भगवान माना जाता है, तो यह गलत नहीं है। वह कहते थे, मैं धरती-आबा हूँ! यानी इस पृथ्वी का पिता हूँ। इसके पीछे उनका कोई दम्भ नहीं था, वे जिस तरह के सुधारवादी कार्यों में लगे थे, ऐसे कार्य एक पिता ही अपने घर परिवार के लिए करता है। पृथ्वी पर बसे उनके आदिवासी बंधु उनके पुत्र सरीखे थे। यही कारण है कि वह सबका कल्याण चाहते थे। इसीलिए उन्होंने अपनी मां से भी कहा था कि ईश्वर ने मुझे अपने समाज के कल्याण के लिए भेजा है। अत: मैं केवल तुम्हारा पुत्र नहीं हूँ। मैं तो धरती-आबा हूँ। तुम मेरे प्रति मोह माया त्याग दो और मुझे समाज कल्याण का कार्य करने दो । माँ ने पुत्र की भावना का सम्मान किया। फिर धीरे-धीरे सभी जन बिरसा को धरती-आबा कहने लगे। बिरसा ने आदिवासी बंधुओं से कहा कि कोई भी कहीं बेगारी नहीं करेगा। मेहनत के अनुसार आदिवासियों को मजदूरी मिलनी चाहिए। वनवासी बंधुओं पर अत्याचार करने वालों को दंडित किया जाए। वनवासियों को भी दीगर लोगों की तरह सुविधाएं दी जाएं। जैसे जमींदार और उच्च वर्गीय लोग भूमि खेती, पहाड़ और खनिज पर अपना अधिकार किए हुए हैं, उसी तरह वनवासियों को भी अधिकार मिलना चाहिए। बिरसा ने कहा, भूमि को लगान से मुक्त किया जाए। वनवासी महिलाओं को समुचित सम्मान और सुरक्षा दी जानी चाहिए। वनवासी बच्चों को भी शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। वे भी मंदिर और अन्य पूजा स्थलों में जाने के लिए स्वतंत्र हैं।

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बिरसा द्वारा चलाए जा रहे सामाजिक जन जागरण के कार्यों से अंग्रेज सरकार घबरा गई थी। बिरसा धर्मांतरण के विरुद्ध भी काम कर रहे थे और अंग्रेजी साम्राज्य के अत्याचारों के विरुद्ध आंदोलन भी चला रहे थे। यही कारण है कि सरकार ने आंदोलन का दमन करने के लिए लगातार कोशिशों की। जो लोग बिरसा के साथ आंदोलन से जुड़े थे, उनकी संपत्ति जब्त की जाने लगी। बिरसा घूम-घूम कर अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन कर रहे थे। चुटिया, पुरी डोंबरी, सिंबुआ आदि में उन्होंने सभाएं की। आखिरकार बिरसा को गिरफ्तार किया गया। बिरसा मुंडा का आंदोलन जब तेज हुआ तो ब्रिटिश हुकूमत और बिरसा के विरुद्ध फर्जी आरोप लगाकर रिपोर्ट दिखाने का सिलसिला शुरू किया गया। बिरसा के विरुद्ध वातावरण बनाने के लिए ऐसे आरोप लगाने जरूरी थे। और आखिरकार बिरसा को दो साल का कठोर कारावास दिया गया। पचास रुपये का जुर्माना भी लगाया गया, जिसे वह नहीं दे पाए तो छह महीने का अतिरिक्त कारावास दिया गया। दो साल बाद बिरसा को रिहा किया गया । लेकिन रिहा होने के बाद बिरसा एक बार फिर आदिवासी नवजागरण के कार्य में लग गए। इस बार बहुत गुप्त तरीके से आंदोलन चलाने की रणनीति बनाई गई और आदिवासी समाज के लोगों को अपने सनातन धर्म से जोड़ने के लिए प्रेरित किया गया। जिसमें सबसे जनेऊ पहनने की अपील की गई। बिरसा मुंडा को दोबारा उस वक्त गिरफ्तार किया गया, जब वे घर पर आराम कर रहे थे। तरह-तरह के आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। 9 जून 1900 को उन्हें खून की उल्टियां हुई और सुबह 9 बजे वनवासी बंधुओं के भगवान का निधन हो गया।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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