सांसारिक मोह माया में रमा संन्यासी

संन्यासी कई तरह के होते हैं। एक तो वे जो सांसारिक मोह-माया त्यागकर पूरे देश और समाज के लिए जीते हैं। दूसरे वे जो कपड़े तो संन्यासी के पहले होते हैं, लेकिन वे सांसारिक संबंधों को त्याग नहीं पाते हैं।

Created By : ashok on :17-11-2022 15:30:03 अशोक मिश्र खबर सुनें

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र
संन्यासी कई तरह के होते हैं। एक तो वे जो सांसारिक मोह-माया त्यागकर पूरे देश और समाज के लिए जीते हैं। दूसरे वे जो कपड़े तो संन्यासी के पहले होते हैं, लेकिन वे सांसारिक संबंधों को त्याग नहीं पाते हैं। ऐसे लोग दिखावा तो करते हैं कि वे संन्यासी हो गए हैं, लेकिन असल में वे ठीक उसी तरह का आचरण करते हैं जैसा कि गृहस्थ करते हैं। हमारे समाज में संन्यासी का मतलब ही परिवार को त्यागकर संसार के लिए जीना होता है। एक बार की बात है। आनंदमठ और वंदेमारतम के रचियता बंकिमचंद्र चटर्जी की विद्वता और प्रतिभा से प्रभावित होकर अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें न्यायाधीश नियुक्त कर दिया।

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वे न्याय की कुरसी पर बैठने के बाद बिना किसी भेदभाव के न्याय करने लगे। इसी क्रम में उन्होंने गलत काम करने पर कुछ अंग्रेजों को भी सजा सुनाई। इससे गोरे नाराज हो उठे। बंकिमचंद्र के एक मित्र थे। उन्होंने संन्यास ले लिया था। एक बार वे उनसे मिलने आए। बंकिम चंद्र ने उनका आवभगत किया। थोड़ी देर बात करने के बाद संन्यासी मित्र ने कहा कि मैं आपके पास एक काम से आया हूं। मेरे एक रिश्तेदार हैं जिनके लिए एक सिफारिशी पत्र लिखवाना चाहता हूं। आप अगर सिफारिशी पत्र लिख देंगे, तो उनका काम हो जाएगा। यह सुनकर बंकिम चंद्र ने कहा कि आपने जब संन्यास ले लिया है, तो फिर आपको अपने किसी संबंधी से क्या मतलब है। संन्यासी को तो सांसारिक मोह-माया से दूर रहकर भगवान की साधना करनी चाहिए। यही संन्यास की सार्थकता है। उनकी बात सुनकर संन्यासी निराश हो उठे। वे बंकिम चंद्र के सामने शर्मिंदा भी हुए। बंकिम चंद्र ने कहा कि जब से मैंने आनंदमठ लिखा है, अंग्रेज मुझसे नाराज हैं। मेरी बात वे सुनेंगे नहीं। इसलिए मेरा सिफारिशी पत्र लिखना बेकार है।

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