नहीं रहे संचार क्रांति के मसीहा पंडित सुखराम, दिल्ली एम्स में ली आखिरी सांस

पूर्व केंद्रीय मंत्री पंडित सुखराम का देर रात को दिल्‍ली स्थित एम्‍स में निधन हो गया। ब्रेन स्‍ट्राक के बाद उन्‍हें दिल्‍ली एम्‍स में भर्ती करवाया गया था। वह 94 साल के थे।

Created By : Pradeep on :11-05-2022 15:34:11 नहीं रहे संचार क्रांति के मसीहा पंडित सुखराम। खबर सुनें

देश रोजाना, शिमला
पूर्व केंद्रीय मंत्री पंडित सुखराम का देर रात को दिल्‍ली स्थित एम्‍स में निधन हो गया। ब्रेन स्‍ट्राक के बाद उन्‍हें दिल्‍ली एम्‍स में भर्ती करवाया गया था। वह 94 साल के थे। पंडित सुखराम काफी समय से बीमार थे व कुछ दिन पहले ही उन्‍हें मंडी से दिल्‍ली एम्‍स में ले जाया गया था। मुख्‍यमंत्री जयराम ठाकुर ने सरकारी हेली‍काप्‍टर से उन्‍हें दिल्‍ली पहुंचाया था। आज देर रात उनकी पार्थिव देह मंडी पहुंचेंगा। वीरवार को उनका अंतिम संस्‍कार किया जाएगा। इससे पहले सेरी मंच पर अंतिम दर्शन के लिए उनकी पार्थिव देह रखी जाएगी।

हिमाचल की राजनीति में चाणक्य की भूमिका निभाई पंडित सुखराम ने
27 जुलाई 1927 को मंडी जिला की तुंगल घाटी के कोटली गांव में जन्मे पंडित सुखराम की शुरूआत बतौर सरकारी कर्मचारी हुई। उन्होंने 1953 में नगर पालिका मंडी में बतौर सचिव अपनी सेवाएं दी। इसके बाद 1962 में मंडी सदर से निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीते। 1967 में इन्हें कांग्रेस पार्टी का टिकट मिला और फिर से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। इसके बाद पंडित सुखराम ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने मंडी सदर विधानसभा क्षेत्र से 13 बार चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। पंडित सुखराम ने कभी विधानसभा चुनावों में हार का मुंह नहीं देखा। केंद्र में उनकी जरूरत महसूस होने पर उन्हें लोकसभा का टिकट भी दिया गया। वह लोकसभा का चुनाव भी जीते और केंद्र में विभिन्न मंत्रालयों का कार्यभार संभाला। 1984 में सुखराम ने कांग्रेस पार्टी के टिकट पर पहला लोकसभा चुनाव लड़ा और प्रचंड बहुमत के साथ संसद पहुंचे।
भाजपा के महेश्वर सिंह ने 1989 में हराया था पंडित सुखराम को

1989 के लोकसभा चुनावों में उन्हें भाजपा के महेश्वर सिंह से हार का सामना करना पड़ा। 1991 के लोकसभा चुनावों में सुखराम ने महेश्वर सिंह को हराकर फिर से संसद में कदम रखा। 1996 में सुखराम फिर से चुनाव जीतकर लोकसभा पहुंचे। 1998 में पंडित सुखराम पर आय से अधिक संपति मामले को लेकर सीबीआई ने छापे डाले थे।
हिमाचल विकास कांग्रेस ने जीती थीं पांच वि स सीटें

इसके बाद पंडित सुखराम को कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया गया। उन्होंने अपनी खुद की पार्टी बनाई, जिसका नाम दिया हिमाचल विकास कांग्रेस। इस पार्टी ने पूरे प्रदेश में विधानसभा का चुनाव लड़ा और पांच सीटों पर जीत हासिल की। 1998 में प्रदेश में गठबंधन की सरकार बनी और पंडित सुखराम की हिविकां ने बीजेपी को समर्थन देकर प्रेम कुमार धूमल को पहली बार सीएम बनाने में योगदान दिया। 1998 में ही उनकी पार्टी ने लोकसभा का चुनाव भी लड़ा, जिसमें शिमला सीट पर कर्नल धनीराम शांडिल ने जीत हासिल की थी।

2007 में सन्यास राजनीतिक विरासत अपने बेटे अनिल शर्मा को

पंडित सुखराम ने 2003 में अपना आखिरी विधानसभा का चुनाव लड़ा और फिर 2007 में सक्रिय राजनीति से सन्यास लेकर अपनी राजनीतिक विरासत अपने बेटे अनिल शर्मा को सौंप दी। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान सुखराम का सारा परिवार बीजेपी में शामिल हो गया। कारण बताया गया कांग्रेस पार्टी में हुआ अपमान। हालांकि बीजेपी की सदस्यता सिर्फ अनिल शर्मा ने ही ली जबकि बाकी परिवार पार्टी के लिए ऐसे ही काम करता रहा। पंडित सुखराम ने मंडी जिला की कुछ सीटों पर बीजेपी प्रत्याशियों के लिए प्रचार भी किया और वोट भी मांगे। मंडी जिला की 10 में से 9 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली और यहां से कांग्रेस का सफाया हो गया। अनिल शर्मा भारी मतों से जीतकर विधानसभा पहुंचे और उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए सुखराम के पोते आश्रय शर्मा ने बीजेपी से टिकट के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन बीजेपी ने मौजूदा सांसद को ही टिकट दिया। इससे खफा होकर पंडित सुखराम दोबारा से अपने पोते संग कांग्रेस में शामिल हो गए।

संचार क्रांति के मसीहा
बतौर लोकसभा सदस्य पंडित सुखराम ने दूर संचार राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में अपना आखिरी कार्यकाल देखा। इस दौरान पंडित सुखराम ने प्रदेश सहित देश भर में जो संचार क्रांति लाई आज भी उसका जिक्र होता है। आज लोगों के हाथ में जो मोबाईल फोन है उसे अगर पंडित सुखराम की देन कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा। पंडित सुखराम को एक तरह से संचार क्रांति का मसीहा माना गया। हिमाचल प्रदेश में उन्हें संचार क्रांति के मसीहा के नाम से ही पुकारते हैं। उन्होंने संचार राज्य मंत्री रहते हिमाचल प्रदेश में वो संचार क्रांति ला दी थी जो शायद प्रदेश के भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए बहुत देर से पहुंचती।

18 चुनाव लड़े, 2 बार हुई हार

पंडित सुखराम ने अपने राजनीतिक जीवन में 18 बार चुनाव लड़े। इनके नाम एक रिकार्ड दर्ज है। यह कभी भी विधानसभा का चुनाव नहीं हारे। मंडी सदर सीट पर इनके परिवार का आज तक एकछत्र राज चल रहा है। यहां से 13 बार खुद चुनाव लड़ा और जीता जबकि बेटा चौथी बार यहां से विधायक चुनकर विधानसभा पहुंचा हैं। सुखराम ने लोकसभा के पांच चुनाव लड़े जिनमें से 2 बार हार हुई। देश या प्रदेश में चाहे किसी भी राजनीतिक दल की लहर चली हो, इनका परिवार कभी विधानसभा का चुनाव नहीं हारा। मौके की नजाकत को भांपना और समय रहते निर्णय लेना पंडित सुखराम की खासियत रही और शायद यही कारण है कि इन्हें राजनीति का चाणक्य कहा गया।

कभी नहीं पहुंच पाए सीएम की कुर्सी तक
पंडित सुखराम हिमाचल प्रदेश के सीएम बनना चाहते थे लेकिन यह संभव नहीं हो सका। इस बात को लेकर उनका हमेशा सीएम वीरभद्र सिंह के साथ 36 का आंकड़ा रहा। पंडित सुखराम की वरिष्ठता को पार्टी ने हमेशा नजरअंदाज किया और इस बात की टीस उनमें हमेशा रही। यही कारण था कि पंडित सुखराम ने अपना एक अगल दल बना दिया था, लेकिन उसके दम पर भी वह सीएम की कुर्सी तक नहीं पहुंच सके।

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