श्रम करने में नहीं रहना चाहिए पीछे

जीवन में श्रम की महत्ता सबसे अधिक है। यदि मनुष्य में श्रम का महत्व नहीं समझा होता, तो शायद हम आज भी अन्य जीवों की तरह प्रकृति से सहयोगात्मक रवैया अख्तियार करते हुए जी रहे होते जिस तरह अन्य जीव जंतु जीते हैं।

Created By : Manuj on :23-11-2022 16:46:53 अशोक मिश्र खबर सुनें

अशोक मिश्र

जीवन में श्रम की महत्ता सबसे अधिक है। यदि मनुष्य में श्रम का महत्व नहीं समझा होता, तो शायद हम आज भी अन्य जीवों की तरह प्रकृति से सहयोगात्मक रवैया अख्तियार करते हुए जी रहे होते जिस तरह अन्य जीव जंतु जीते हैं। ऐसा माना जाता है कि राजा हो या प्रजा, अमीर हो या गरीब, सबको श्रम जरूर करना चाहिए।

कहते हैं कि मगध में एक बार अकाल पड़ा। यह अकाल कई सालों तक चलता रहा। फसलें नष्ट हो गईं। लोगों को खाने के लिए अनाज और पीने के लिए पानी मिलना मुश्किल हो गया। प्रजा में हाहाकार मच गया। लोग अपनी विपदा लेकर सम्राट चंद्रगुप्त के पास पहुंचे। हालांकि अकाल को लेकर उन्होंने मंत्रि परिषद की बैठक पहले ही बुला ली थी। महामंत्री चाणक्य ने उन्हें सलाह दी कि पानी का मितव्ययता से उपयोग किया जाए और दूसरे राज्यों से अनाज मंगाकर प्रजा में वितरित करके उनके प्राणों की रक्षा की जाए। इसके साथ ही उन्होंने सलाह दी कि हवन-यज्ञ करवाए जाएं।

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सम्राट चंद्रगुप्त और उनकी रानी ने बंजर भूमि पर हल चलाकर खेत जोता। खेत जोतने की प्रक्रिया पूरी होने और हवन-यज्ञ समाप्त होने के बाद चाणक्य ने कहा कि महाराज, अब नदियों को नहर बनाकर खेतों से जोड़ा जाए ताकि समस्या का स्थायी हल निकाला जा सके। इसके लिए नियत जगह पर राजा और प्रजा इकट्ठा हुए। महामंत्री चाणक्य भी वहां मौजूद थे।

सम्राट चंद्रगुप्त ने फावड़ा उठाया और नहर के लिए जमीन खोदने लगे। यह देखकर जनता में उत्साह की लहर दौड़ गई। प्रजा ने नहर बनाने का काम उत्साह से करना शुरू कर दिया और देखते ही देखते कुछ ही दिनों में नहर बनकर तैयार हो गई। नदियों से नहर में पानी छोड़ा गया और कुछ ही दिनों में पूरा मगध क्षेत्र हरा भरा हो गया।

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