भलाई करने में ही धन की सार्थकता

ज्यादा संपत्ति का होना भी कई बार अच्छा नहीं होता है। व्यक्ति संपत्ति की रक्षा में ही दिन रात सोचता रहता है। यही वजह है कि कबीरदास जी को कहना पड़ा कि सांई इतना दीजिए जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए।

Created By : ashok on :04-12-2022 14:49:09 अशोक मिश्र खबर सुनें

बोधिवृक्ष

अशोक मिश्र
ज्यादा संपत्ति का होना भी कई बार अच्छा नहीं होता है। व्यक्ति संपत्ति की रक्षा में ही दिन रात सोचता रहता है। यही वजह है कि कबीरदास जी को कहना पड़ा कि सांई इतना दीजिए जामे कुटुम समाय। मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए। कहते हैं कि किसी नगर में एक सेठ रहता था। उसके पास अथाह संपति थी। उसके बावजूद वह दिन रात उसे बढ़ाने के फेर में लगा रहता था। नतीजा यह हुआ कि उसे कई तरह की बीमारियों ने घेर लिया। वह बिस्तर पर पड़े रहने के बावजूद धन की ही चिंता में डूबा रहता था। एक दिन वह अपने बिस्तर पर लेटा हुआ कुछ सोच रहा था कि उसे भजन सुनाई पड़ा जिससे उसको काफी सुकून मिला।

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भजन में कहा गया था कि मरते समय न तो परिजन काम आते हैं और न ही धन-दौलत काम आती है। व्यक्ति की केवल भक्ति और लोगों के साथ किए गए उपकार ही काम आते हैं। उसने नौकर से कहा कि वह भजन गाने वाले संत को घर में बुला लाए। इस पर नौकर ने बाहर झांक कर देखा और कहा कि वह तो कोई संत नहीं है, जूते गांठने वाला है जो अपनी मस्ती में भजन गाता रहता है। सेठ ने उस व्यक्ति को बड़े आदर के साथ बुलाया और कहा कि वह उसे रोज भजन सुनाया करे। वह उसे ईनाम देगा।

तीन दिन के बाद जूता गांठने वाले ने सेठ से कहा कि मैं आपके यहां नहीं आ सकता हूं। पहले मैं मस्ती में भजन गाता था, भगवान का नाम लेता था, अब मुझे धन की सुरक्षा का ध्यान लगा रहता है। यह सुनकर सेठ सारा माजरा समझ गया। उसने उस दिन से गरीबों और असहायों की सेवा और मदद करने लगा। उसे समय में आ गया था कि लोगों क८ी भलाई करने में ही धन की सार्थकता है।

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