कुछ बनावटें ऐसी मुझे जमी ही नहीं...

कुछ बनावटें ऐसी मुझे जमी ही नहीं, तस्वीर उसकी मुकम्मल बनी ही नहीं।

Created By : Pradeep on :20-04-2022 16:57:56 प्रतीकात्मक तस्वीर खबर सुनें

कुछ बनावटें ऐसी मुझे जमी ही नहीं
तस्वीर उसकी मुकम्मल बनी ही नहीं

हुस्न ही हुस्न है जिधर नज़र जाए
ऐ दोस्त मोहब्बत की कमी ही नहीं

आईने के सामने तुम यूं परेशान न हो
तुमसा यहां कोई दूसरा हसी ही नहीं

तिश्नगी कैसे बुझाती तेरी मय साकी
गर कहीं तेरी आंखों सा मयकशी ही नहीं

गैर-मुमकिन है कि तुम मुझको जान सको
जब मेरी तुम्हारी कभी ठनी ही नहीं

क्या खाक मनाई तूने फुरकत मेरी जां
जब आंख में तेरी कहीं नमी ही नहीं

जैसा सोच सको वैसा इंसा मुमकिन है
चेहरे बहुत थे सो क़िताब पढ़ी ही नहीं

जिसको देखो वहीं मुस्कान लिए फिरता है
हाल पूछो तो कहे यार कोई खुशी ही नहीं

सब लोग जताने में हैं मशरूफ यही
कि उनसा यहां कोई दूसरा धनी ही नहीं

गैर मुल्क हो आऊं पर बस नहीं सकता
हिंदुस्तान सी यारों सरजमीं ही नहीं

मुझे शायर न समझना मुझे सुनने वालों
मैंने बहुत सी बातें हैं जो लिखी ही नहीं।

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