हड़ताली डॉक्टरों ने पेश की नई मिसाल

यह सचमुच मानवीय संवेदना की एक मिसाल पेश करने वाली घटना है। रोहतक पीजीआई में जैसे ही खबर पहुंची कि जुलाना में हुई बस और ट्रक की टक्कर होने से घायल 37 लोग घायल होकर ट्रामा सेंटर पहुंचे हैं, तो रेजिडेंट डॉक्टरों ने अपनी हड़ताल छोड़ दिया और घायलों का इलाज करने लगे।

Created By : ashok on :28-11-2022 15:13:02 संजय मग्गू खबर सुनें

संजय मग्गू
यह सचमुच मानवीय संवेदना की एक मिसाल पेश करने वाली घटना है। रोहतक पीजीआई में जैसे ही खबर पहुंची कि जुलाना में हुई बस और ट्रक की टक्कर होने से घायल 37 लोग घायल होकर ट्रामा सेंटर पहुंचे हैं, तो रेजिडेंट डॉक्टरों ने अपनी हड़ताल छोड़ दिया और घायलों का इलाज करने लगे। यह डॉक्टरों का मानवीय पक्ष है। कोरोना काल के दौरान भी यही डाक्टर भगवान का रूप लेकर कोरोना पीड़ितों का उपचार कर रहे थे। उन दिनों तो ऐसा लग रहा था कि कोरोना वायरस पूरी दुनिया को मानवविहीन कर देगा। आपाधापी और भय के उस दौर में यह डॉक्टर, नर्स और चिकित्सा क्षेत्र से जुडे लोग ही थे जिन्होंने पीड़ित मानवता को राहत दिलाई।

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दिन-रात एक करके लोगों का इलाज किया और लोगों को यह विश्वास दिलाया कि अभी इंसानियत जिंदा है। यही जज्बा कल रोहतक में देखने को मिला। पीजीआई में पिछले काफी दिनों से प्रदेश सरकार की बांड पालिसी के खिलाफ रेजिडेंट डॉक्टर्स हड़ताल पर थे। वे सरकार से बॉन्ड पालिसी को वापस लेने की मांग कर रहे हैं। इस बीच सरकार से बातचीत भी हुई, लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं निकला। सरकार भी बॉन्ड पालिसी को लेकर अड़ी हुई है। ऐसे में सरकार पर दबाव डालने के लिए रेजिडेंट डॉक्टर्स ने आपातकालीन सेवाएं छोड़ने की चेतावनी दी थी। शनिवार को उन्होंने आपातकालीन सेवाओं में ड्यूटी भी नहीं की, लेकिन जैसे ही जुलाना में हुई घटना की खबर फैली और पता चला कि बस-ट्रक की टक्कर में घायल हुए 37 लोग अस्पताल पहुंच चुके हैं, तो हड़ताली डॉक्टरों में से कुछ लोग आपसी सहमति से घायलों के पास पहुंचे और उनकी चिकित्सा में लग गए।

इन डाक्टरों ने घायलों का इलाज करके यह साबित कर दिया कि उनमें इंसान और अपने कर्तव्य के प्रति जो जज्बा है, वह सचमुच काबिले-तारीफ है। यह घटना बताती है कि एमबीबीएस की डिग्री लेकर ये मेडिकल छात्र चिकित्सा के क्षेत्र में उतरेंगे, तो किसी भी रोगी को इनसे निराश नहीं होना पड़ेगा। इनके लिए चिकित्सकीय कर्म आजीविका कमाने का एक साधन तो होगा, लेकिन ये पैसे के पीछे नहीं भागेंगे। कम से कम इन मेडिकल छात्रों ने यह उम्मीद तो जगा ही दी है। इस मतलबपरस्त दुनिया में कम से कम यह भरोसा तो हो ही गया है कि भविष्य में ये इसी तरह पीड़ित मानवता की सेवा करते रहेंगे।

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