पीएफआई पर बैन की लड़ाई, संघ तक आई

रिश्ता पुराना है राजनीति और अपराध का। इस्लामिक संगठन पीएफआई ने बीस राज्यों में पैर अकेले अपने दम पर नहीं फैलाए। सत्ता का साथ पाकर नापाक मंसूबे की खिचड़ी पकाई। कर्नाटक में सीतारमैया के समय पीएफआई पर जितने भी मामले थे, सब वापस ले लिए गये थे। केरल में विधानसभा चुनाव के समय कांग्रेस ने पीएफआई से समर्थन मांगा था।

Created By : ashok on :03-10-2022 15:19:02 ramesh tiwari ripu खबर सुनें

रमेश तिवारी ‘रिपु’
रिश्ता पुराना है राजनीति और अपराध का। इस्लामिक संगठन पीएफआई ने बीस राज्यों में पैर अकेले अपने दम पर नहीं फैलाए। सत्ता का साथ पाकर नापाक मंसूबे की खिचड़ी पकाई। कर्नाटक में सीतारमैया के समय पीएफआई पर जितने भी मामले थे, सब वापस ले लिए गये थे। केरल में विधानसभा चुनाव के समय कांग्रेस ने पीएफआई से समर्थन मांगा था। तब विपक्ष को पीएफआई बुरी नहीं लगी। एनआईए और ईडी ने तड़ातड़ देश के पन्द्रह राज्यों में पीएफआई के खिलाफ कार्रवाई की, तो विपक्ष की भौंहें तन गईं। पीएफआई की देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्ता का सारा बही खाता अब सामने है। पीएफआई यानी पॉपुलर फ्रंट आॅफ इंडिया केरल से संचालित होने वाला एक कट्टर इस्लामिक संगठन है जिसे आरएसएस पसंद नहीं है। पिछले दिनों 22 सितम्बर को एनआईए की रेड के दौरान पीएफआई के सदस्य मोहम्मद बशीर के पास से संघ के पांच नेताओं को जान से मारने और आरएसएस दफ्तर को निशाना बनाने का साक्ष्य मिला।
देश की एकता, अखंडता और उसकी संस्कृति को तार-तार करने वाले पीएफआई की विपक्ष का वकालत करना, हैरान करता है। संघ की हिन्दुत्व विचारधारा का विरोध हो सकता है। मगर देश की शिराओं में दहशत का बारूद भरने वाले के पक्ष में राजनीति को जायज नहीं ठहराया जा सकता। हैरानी होती है कि पन्द्रह साल में देश के बीस राज्यों में नफरत की पाठशाला खोलने वाले संगठन की बसपा सुप्रीमो मायावती वकालत करती हैं। बैन करके सरकार ने चुनाव से पहले पीएफआई को टारगेट किया है। अगर पीएफआई देश की आन्तरिक सुरक्षा के लिए खतरा है, तो उस जैसे अन्य संगठनों पर भी बैन लगना चाहिए। आरएसएस भी देश में साम्प्रदायिकता फैला रहा है। समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर्रहान बर्क दवा करते हैं- पीएफआई पढ़े लिखों का संगठन है। सवाल यह है कि पढ़े लिखे लोगों का संगठन है तो फिर पीएफआई अपने आप को राष्ट्रवादी संगठन क्यों नहीं कहता? आरएसएस अपने आप को राष्ट्रवादी संगठन कहता है। केरल में पीएफआई सदस्य शफीक पायत ने एनआईए से कहा, वह युवकों को बम बनाने की ट्रेनिंग देता है।
पटना के पास फुलवारी शरीफ में पीएफआई के सदस्यों के पास से मिले दस्तावेज के मुताबिक 2047 तक भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने की योजना थी। देश में शरिया कानून लागू कराना, मुस्लिम युवकों को जोड़ना, सौ से अधिक संगठन बनाना, देश के राज्यों में पीएफआई का सदस्य मंत्री और सांसद बने। राज्यों में यह प्रचारित करना कि आरएसएस मुसलमानों के खिलाफ है। संघ भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहता हैं। छापे मारे गये पन्द्रह राज्यों को पीएफआई इस्लामिक स्टेट बनाना चाहता था। देश में क्रूरता की नर्सरी चलाने वाली पीएफआई ने दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए के विरोध में प्रदर्शन किया। दिल्ली में साम्प्रदायिक दंगे कराए। पैगम्बर पर टिप्पणी विवाद को तूल दिया। सिर तन से जुदा अथवा रैली में हिन्दुओं के खात्मे का नारा इन्होंने बुलंद किया। देश की एकता और अखंडता के खिलाफ साजिश की और संघ को बदनाम किया। देश की अन्य सात आतंकी संगठनों से इनकी साठगांठ है। हाथरस में जातीय हिंसा की योजना बनाने के प्रमाण मिले। कर्नाटक में हिजाब विवाद को भड़काया।
लव जिहाद के जरिये दूसरे धर्म की लड़कियों को टारगेट किया। केरल में ईसाई लड़कियां इनके निशाने में हैं। पीएम की रैली में विस्फोट करके जान माल को हानि पहुँचाने के साथ ही बड़ी सियासी हस्तियों को नुकसान पहुंचाने के साक्ष्य मिले। जहांगीरपुरी और कानपुर में हिंसा, राजस्थान के करौली, मध्य प्रदेश के खरगौन में हिंसात्मक घटनाएं कराई गईं। कर्नाटक में भाजपा नेता की हत्या की गई। इतना ही नहीं, इसके ऊपर भारत विरोधी एजेंडा चलाने का भी आरोप है जिसके सबूत भी जांच एजेंसियों को मिले हैं। केरल के कन्नूर के मट्टनूर में संघ के आॅफिस पर पेट्रोल बम फेंके। कोल्लम में पीएफआई कार्यकर्ताओं ने दो पुलिसकर्मियों पर हमला भी किया। इसके बावजूद मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना साजिद रशीदी ने एनआईए की रेड को साजिश करार दिया है। पीएफआई सिमी का दूसरा भाई है। एनआईए ने दूसरे राज्यो में भी कार्रवाई कि मगर पीएफआई ने केरल में बंद का आव्हान किया। केरल हाईकोर्ट को कहना पड़ा, हिंसा भड़काने और शांति भंग करने वालों के खिलाफ पुलिस सख्त कार्रवाई करें।
टेरर फंडिग करने वाले संगठन पर पांच साल का बैन लगने पर अब संघ पर भी प्रतिबंध की बात विपक्ष कर रहा है। जबकि पीएफआई के बुरे मंसूबे हैं। जैसा कि पीएफआई के राष्ट्रीय महासचिव अनीस अहमद का आरोप है कि केरल में दो सौ चालीस से अधिक लोगों की कत्ल के मामले में आरएसएस का नाम आया है। पीएफआई पर बैन लगाया जा रहा है तो संघ पर क्यों नहीं? पीएफआई के किसी भी कार्यकर्ता को आज तक दोषी नहीं ठहराया गया है। लेकिन देश के अंदर कोई भी आतंकी गतिविधियां होती है, तो पीएफआई का नाम लिया जाता है। ऐसा नहीं है कि संघ पर प्रतिबंध नहीं लगा है। पहली बार 4 फरवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या पर 18 महीने तक बैन था। दूसरी बार 1975 में इमरजेंसी के दौरान दो साल बाद बैन हटाया गया। तीसरी बार 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद छह महीने बाद पाबंदी हटाई गई।
देश में वामपंथी तबका जो संघ और बीजेपी से अलग सोच रखता है, पीएफआई के खिलाफ कार्रवाई को शक की निगाहों से देख रहा है। उसे लगता है इस कार्रवाई के पीछे बीजेपी और संघ के अपने सियासी फायदे हैं। कर्नाटक में आरएसएस का जो प्रयोग है,उस पर पीएफआई चोट करता आया है। केरल में आरएसएस है पर बीजेपी नहीं है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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