सतगुरु की महिमा अनंत है

फिर सवाल उठता है कि कबीरदास या नानक देव जी के सतगुरु और अक्षर ज्ञान देने वाले सतगुरु में फर्क क्या है? दरअसल, इन दोनों महापुरुषों के सतगुरु उस संसार में ले जाते हैं, जो अध्यात्म का है, धर्म का है।

Created By : ashok on :15-11-2022 14:53:20 अशोक मिश्र खबर सुनें

अशोक मिश्र
सतगुरु यानी सच्चा गुरु। कबीरदास ने भी सतगुरु की बात कही और सिखों के पहले गुरु नानकदेव जी ने भी सतगुरु की महिमा गाई है। यह सतगुरु है कौन? गुरुनानक देव जी या कबीरदास जी के सतगुरु वह नहीं हैं जिन्हें हम समझते हैं। जो गुरु हमें शिक्षा देता है, अक्षर ज्ञान करवाता है। पढ़ा-लिखाकर सभ्य नागरिक बनाता है, समाज में रहने लायक बनाता है, नौकरी-चाकरी करने के योग्य शिक्षा देता है, वह कबीरदास या नानक देव वाला सतगुरु नहीं है। यह गुरु तो हमें सांसारिक शिक्षा देता है। संसार में रचना-बसना सिखाता है, लेकिन वह नहीं सिखाता है, जो कबीरदास या नानक देव जी को उनके सतगुरु सिखाते हैं।

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फिर सवाल उठता है कि कबीरदास या नानक देव जी के सतगुरु और अक्षर ज्ञान देने वाले सतगुरु में फर्क क्या है? दरअसल, इन दोनों महापुरुषों के सतगुरु उस संसार में ले जाते हैं, जो अध्यात्म का है, धर्म का है। कबीरदास या नानक देव जी के सतगुरु अक्षर ज्ञान नहीं देते हैं, परमात्मा से मिलने का मार्ग बताते हैं। वह सांसारिक मुसीबतों से छुटकारा दिलाकर अध्यात्म की पावन भावभूमि में ले जाने का कार्य करते हैं। यहां तक किसी को पहुंचा पाने में केवल सतगुरु ही सक्षम हैं। बिना सतगुरु के यह कार्य असंभव है। यह सतगुरु ही है जो मनुष्य की कलुषित भावनाओं को निकालकर प्रेम और सद्भावना का भाव भरता है। वह मानव मात्र से प्रेम करने को प्रेरित करता है। वह जाति, धर्म, भाषा और संप्रदाय से परे है। यही वजह है कि सिख धर्म के महान गुरुओं, कबीरदास जैसे संत कवियों ने किसी तरह का भेदभाव नहीं किया। अपने चाहने वालों को भी यही शिक्षा दी। आज समाज को ऐसे संतों, गुरुओं की बहुत आवश्यकता है जो समाज को नई दिशा दे सकें।

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