मुश्किल हालात के बाद ही खुशनुमा प्रभात का आनंद है

भारतीय कला जगत में राजा रवि वर्मा, जो बचपन से ही सुन्दर सृजन के धनी हो गए थे, के प्रयासों को भुलाया नहीं जा सकता। रवि वर्मा जब मात्र 14 वर्ष के थे, चाचा की अनुपस्थिति में उनके द्वारा बनाए जा रहे चित्र में रंग भरते हुए बचे हुए रेखा कार्यों को भी पूरा कर गए थे, जो एक आश्चर्यजनक बात थी।

Created By : ashok on :05-12-2022 14:58:49 पंकज तिवारी खबर सुनें

पंकज तिवारी
भारतीय कला जगत में राजा रवि वर्मा, जो बचपन से ही सुन्दर सृजन के धनी हो गए थे, के प्रयासों को भुलाया नहीं जा सकता। रवि वर्मा जब मात्र 14 वर्ष के थे, चाचा की अनुपस्थिति में उनके द्वारा बनाए जा रहे चित्र में रंग भरते हुए बचे हुए रेखा कार्यों को भी पूरा कर गए थे, जो एक आश्चर्यजनक बात थी। वापस आने पर चित्र देखते ही राजा वर्मा आश्चर्य से भाव विभोर हो उठे। उनके मन में बालक रवि वर्मा को लेकर उम्मीदों का एक पहाड़ उभर आया और मन ही मन वो रवि वर्मा को भविष्य का महान चित्रकार मान बैठे जो आगे चलकर शत-प्रतिशत खरा सिद्ध हुआ। इसके लिए उनके चाचा हमेशा ही रवि वर्मा के साथ खड़े रहे। उनके प्रयासों के बल पर ही इनको त्रावनकोर के महाराजा से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। प्रतिफल ये हुआ कि दरबारी चित्रकार रामास्वामी नायडू द्वारा इन्हें जलरंग की बारीकियाँ समझने का मौका मिला। जल्द ही ये जलरंग में दक्षता हासिल करने में भी सफल रहे। कला के प्रति रवि वर्मा की ललक और तीव्र पकड़ को देखकर रामास्वामी नायडू तथा ब्रिटिश शबीह चित्रकार थियोडोर जॉनसन दोनों ने रवि वर्मा को तैल रंग में प्रशिक्षण देने से साफ मना कर दिया। हां, जॉनसन की तरफ से बस इतनी अनुमति थी कि पूर्ण हुए चित्र को बालक निहार सकता है। उसका कथन था कि चित्र निर्माण प्रक्रिया के समय वो अपने आस-पास किसी को भी नहीं रहने देता। ध्यान भंग की खाल ओढ़कर वो खुद को इस प्रक्रिया से अलग कर लिया था। बावजूद इसके अधिकतर लोगों का मानना था कि रवि वर्मा को तैल रंग की शिक्षा थियोडोर जॉनसन से ही मिली। मामला संशयग्रस्त है।

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जॉनसन ने खुद को बचाने का यह कदम ईर्ष्या बस उठाया या रवि वर्मा के आगे भविष्य में उसे अपनी जमीन खिसकती नजर आई इसलिए कह पाना मुश्किल है। पर एक बात तो साफ है कि मुश्किल हालात के बाद ही खुशनुमा प्रभात का आनंद है। अत: मुश्किल घड़ी में भी हाथ पैर मारना बंद नहीं करना चाहिए। युवा रवि वर्मा ने भी यही किया और मालाबार स्कूल आॅफ पेंटिंग में भी दाखिला के प्रयास में जा लगे। यहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। अब तक अपने अथक प्रयासों और लगातार निराश होने के चलते मानसिक रूप से कमजोर महसूस करने लगे थे रवि वर्मा, पर चित्रकला में नवीन सृजन में निरंतरता बनी रही। इस बीच भी इनके चित्र लगातार बनते रहे और अथक प्रयास, एकाग्रचित मन के प्रयासों का फल तथा महाराजा के सहयोग से पाश्चात्य कला चित्रों पर प्राप्त कुछ चित्रकला संबंधित पुस्तकों के चित्रों को देखकर, गहन अध्ययन कर ये चित्रों की बारीकियों को पकड़ पाये और प्रयत्न के बल पर ही खुद एक संस्थान बन बैठे।


देखते ही देखते इनके चित्र अंतर्राष्ट्रीय कला प्रदर्शनियों में भी सराहे जाने लगे और स्वर्ण पदक हासिल करने में सफल रहे। स्थानीय शैलियों का भी उन्होंने अध्ययन किया, परिचित चेहरों में दिव्यता भर कर वही रूप देवी देवताओं के हेतु प्रयोग किया। उनके अधिकतर चित्रों में सुगंधा है, जिसको लेकर रवि वर्मा के बारे में तरह-तरह की बातें हवा हुई थी और जिसकी वजह से वर्मा जी को कई जगह घेरा भी गया। चित्र सीता हरण में उन्होंने सीता के रूप में अपनी पोती की छवि को अंकित किया है। अब तक उनके काम का सिलसिला जोर पकड़ चुका था पर भटकन भी कम न थी। विषय को लेकर ऊहापोह जैसा वातावरण विद्यमान था। उनका मॉडल उनके आसपास से ही होता था वह एक ऐसे कलाकार थे जो कैनवास पर आॅयल कलर में काम करने वाले पहले भारतीय कलाकार बनें।

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भारतीय कला जगत में, तैल रंगीय यथार्थता को लाने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। यूरोपीय यथार्थवादी शैली को भारतीय रूप में प्रस्तुत कर देना धीरे-धीरे इनके लिए आसान होता गया। इनके चित्रों में शबीह चित्र, सामाजिक संदर्भों युक्त चित्र और जग जाहिर धार्मिक चित्र प्रमुख थे। राष्ट्रीयता संबन्धी इनके चित्रों से अंग्रेज भी खार खाये हुए थे। बाल गंगाधर तिलक, रानी लक्ष्मीबाई, महाराणा प्रताप और शिवाजी जैसे जननायकों के चित्र बनाकर वर्मा जी लोगों में देशप्रेम की भावना को भी उजागर करने में सफल हुए और आंदोलनकारी लोगों के बीच भी सम्मानीय बन गये साथ ही महंगे कलाकार भी, शबीह चित्र बनवाने के लिए लोग इनके हाँ करने का इंतजार किया करते थे। आगे चलकर उन्हें एशिया का रेम्ब्रा भी कहा जाने लगा।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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