कन्याभ्रूण हत्या का कलंक मिट जाता

हमारे देश में कन्याभ्रूण हत्या की बहुत गंदी और समाज विरोधी कुप्रथा सदियों से चली आ रही है। इसका यह मतलब नहीं है कि यह प्रथा हमारे देश में सनातन काल में भी रही है।

Created By : ashok on :01-12-2022 15:34:00 अशोक मिश्र खबर सुनें

अशोक मिश्र
हमारे देश में कन्याभ्रूण हत्या की बहुत गंदी और समाज विरोधी कुप्रथा सदियों से चली आ रही है। इसका यह मतलब नहीं है कि यह प्रथा हमारे देश में सनातन काल में भी रही है। नहीं, प्राचीन काल में सामाजिक व्यवस्था ऐसी थी कि स्त्री-पुरुष में भेद नहीं किया जाता था। समाज में सभी समान थे। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकार भी पुरुषों की ही तरह महिलाओं को प्राप्त थे। पुरुषों की तरह ही महिलाएं भी समाज का नेतृत्व करती थीं। तब किसी के मन में किसी तरह की एक दूसरे को लेकर हीन भावना भी नहीं थी। लड़कों की तरह ही लड़कियों की पढ़ाई, लिखाई, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यों में सहभागिता होती थी।

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महिलाओं के लिए बुरा दौर तक शुरू हुआ, जब समाज में स्त्री की स्वतंत्र अस्मिता और व्यक्तित्व को दरकिनार करके पुरुष प्रधान ने अपनी अस्मिता और व्यक्तित्व से जोड़कर देखना शुरू किया। दो राजाओं के आपसी युद्ध के परिणाम स्वरूप हारने वाले को अपनी बहन-बेटी का हरण या बलात विवाह का दंश झेलने को मजबूर होना पड़ा, तो उन्होंने इस अपमान से बचने के लिए लड़की के पैदा होते ही उसे मार देने की मानवघाती परंपरा को जन्म दिया। बस, तभी से पुरुषों का यह वीभत्स रूप कन्याओं की मौत का कारण बन गया।

बाद में जब कन्या भ्रूण का गर्भ में ही पता लगने की सुविधा हुई, तो दहेज के चलते उन्हें मारा जाने लगा। काश! युद्ध न हुए होते। समाज में स्त्री-पुरुष को समान समझने की आदि व्यवस्था आज भी कायम होती। सबको अपनी प्रतिभा के अनुरूप आगे बढ़ने और जीवन जीने का हक होता तो कितना अच्छा होता। हम इतने पतित तो नहीं होते।

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