उद्धव की कुर्सी जाना निश्चित! इन दो विकल्प को आजमाकर सत्ता बचा सकती है शिवसेना

तीन दिन से महाराष्ट्र में सियासी बादल मंडराए हुए हैं। शिवसेना के विधायकों की बगावत के बाद मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे सीएम आवास छोड़कर मातोश्री पहुंच गए हैं। इस लिए तय है कि उद्धव की कुर्सी जानी निश्चित है पर सत्ता को बचाने के लिए शिवसेना के पास अभी भी दो सियासी विकल्प शेष हैं।

Created By : Shiv Kumar on :23-06-2022 13:44:49 उद्धव ठाकरे खबर सुनें

एजेंसी, दिल्ली
मंत्री एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद महाराष्ट्र में उद्धव सरकार का जाना अब लगभग निश्चित हो गया है। सियासी हलचल के बीच अब शिवसेना के 37 से अधिक विधायक गुवाहाटी पहुंच चुके हैं। महा विकास आघाडी सरकार के समक्ष आए सियासी संकट से निपटने के लिए कांग्रेस, एनसीपी व शिवसेना लगातार मंथन में जुटे हुए हैं। पर किसी तरह का समाधान होता नजर नहीं आ रहा है। सीएम उद्धव की कुर्सी जाने की पठकथा लिखी जा चुकी है। इन स्थितियों में मुख्यमंत्री उद्धव के समक्ष सत्ता को बचाए रखने का क्या सियासी विकल्प शेष हैं?
सीएम ठाकरे बुधवार शाम को सीएम आवास छोड़कर मातोश्री (अपने घर) पहुंच गए हैं। ठाकरे ने फिलहाल मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा नहीं दिया है। पर उन्होंने इशारा दिया कि बागी यदि सामने आकर बातें करें तो वो ऐसा करने के लिए तैयार हैं। इसके बाद भी शिवसेना में मची भगदड़ रुक नहीं रही है। बागी एकनाथ शिंदे गुट की ताकत बढ़ती जा रही है। उद्धव के खुले आफर के बाद भी शिंदे का दिल नहीं पसीज रहा है। इन स्थितियों में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे कैसे सत्ता को बचाए रखने में कामयाब हो पाते हैं?

एकनाथ शिंदे को सीएम बना बचा सकते हैं सत्ता
एकनाथ शिंदे के साथ जैसे शिवसेना के विधायक खड़े दिखाई दे रहे हैं। इससे उद्धव ठाकरे के समक्ष अपनी खुद की कुर्सी को बचाने की जगह अब पार्टी व सत्ता को बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है। बुधवार को उद्धव ठाकरे ने भावुक संदेश भी दिया, जिसमें बोला कि यदि उनके अपने लोग उन्हें सीएम के पद पर नहीं देखना चाहते हैं तो उन्हें वह इसके लिए तैयार हैं। वैसे ठाकरे ने कहा कि वह चाहते हैं कि कोई शिवसैनिक ही सीएम बने। इससे स्पष्ट होता है कि उद्धव सत्ता को बचाने के लिए किसी भी शिवसैनिक को सीएम बनने का लिए भी कदम बढ़ा सकते हैं। उद्धव ठाकरे के विरुद्ध शिवसेना के विधायकों ने जैसे बगावत की है, उससे स्पष्ट है कि उनकी कुर्सी जानी है। इस स्थिति में उनपर एक विकल्प बचता है कि वो एकनाथ शिंदे को सीएम बनाने का दांव चल दें। एनसीपी और कांग्रेस ने शिवसेना प्रमुख एवं सीएम उद्धव ठाकरे को सुझाव दिया है कि एकनाथ शिंदे को सीएम बना दिया जाए। अब सवाल उठता है कि क्या उद्धव ठाकरे सियासी संकट से सरकार व शिवसेना को सुरक्षित रखने के लिए एकनाथ शिंदे को मुख्यमंत्री बनाने का कदम उठाएंगे। यह होने पर हो सकता है कि महा विकास आघाडी व शिवसेना के सामने आया यह सियासी संकट मिट जाए। वैसे शिंदे ने बुधवार को ट्वीट कर शिवसेना के एनसीपी व कांग्रेस से गठबंधन को अप्राकृतिक बताया था व इससे बाहर निकलना जरूरी कहा था। शिंदे ने कहा था कि शिवसेना कार्यकर्ताओं में एनसीपी-कांग्रेस के साथ सरकार बनाए जाने को लेकर भी गुस्सा है, क्योंकि उनकी विचारधारा पूरी तरह शिवसेना के खिलाफ है। ऐसे में शिंदे जैसे कांग्रेस-एनसीपी को लेकर आक्रामक है व भाजपा संग सरकार बनाने का सुझाव दे रहे हैं। इस स्थिति में उद्धव ठाकरे के समक्ष शिंदे को मुख्यमंत्री ही नहीं बल्कि महा विकास आघाड़ी से दूरी बनाने का विकल्प खोजना होगा।


भाजपा संग सरकार बनाने का विकल्प शिवसेना से बागी हुए शिंदे जैसे कांग्रेस व एनसीपी से नाता तोड़ने को लेकर सख्त रुख अख्तियार किए हुए हैं। साथ ही पार्टी के सभी विधायक शिंदे के पक्ष में खड़े हैं। इस स्थिति में उद्धव ठाकरे के समक्ष दूसरा विकल्प यह है कि कांग्रेस-एनसीपी से गठबंधन तोड़कर भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना लें। साफ है कि शिवसेना में बगावत के बाद तो उनकी कुर्सी जानी निश्चित है। इन हालातों में भाजपा के साथ हाथ मिलाने पर सत्ता में जरूर बनेंगे रहेंगे। शिंदे लगातार भाजपा संग मिलकर सरकार बनाने का विकल्प दे रहे हैं। सीएम के तौर पर उद्धव ने ढाई वर्ष का सफर पूरा कर लिया है। 2019 के विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद उद्धव ठाकरे ने भाजपा के सामने ढाई-ढाई वर्ष के लिए सीएम का फॉर्मूला रखा था, उसपर भाजपा राजी नहीं थी। इसलिए उद्धव ठाकरे ने बीजेपी से नाता तोड़कर अपने वैचारिक विरोधी कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बना ली और सीएम बने गए। बेशक ठाकरे ने भाजपा की जगह कांग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई हो पर ढाई वर्ष के सीएम का कार्यकाल पूरा कर लिया। यदि ठाकरे मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ते हैं तो उनकी पराजय नहीं मानी जाएगी। शिवसेना प्रमुख ठाकरे के सीएम बनने का सपना भी साकार हो गया पर शिंदे की बगवात से जैसा सियासी संकट खड़ा है। उसमें केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी से कहीं ज्यादा उनके समक्ष अपनी पार्टी को बचाने की चुनौती है। शिवसेना के विधायक से लेकर सांसद तक बागी हो गए हैं। वहीं, शिवसेना को यदि भविष्य में महाराष्ट्र की सियासत में वर्चस्व कायम रखना है तो एनसीपी व कांग्रेस के साथ संभव नहीं है। क्योंकि दोनों ही एक दूजे के वैचारिक विरोधी रहे हैं। शिवसेना व भाजपा दोनों ही हार्ड हिंदुत्व की सियासत करती रही हैं। इसलिए दोनों 25 वर्ष साथ रहे। ऐसे में ठाकरे के लिए भाजपा के साथ हाथ मिलाकर सत्ता में बने रहने व पार्टी को बचाए रखने का विकल्प है। देखना है कि उद्धव ठाकरे क्या सियासी कदम उठाते हैं?

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