जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान महावीर और उनकी शिक्षा

तीर्थंकर भगवान महावीर अपने साधकों को समझाया करते थे कि जो व्यक्ति सादगी से जीवन बिताता है, लोगों से छल-कपट नहीं करता है। बुरे कार्य करके धन नहीं कमाता है। वह हमेशा सुखी रहता है।

Created By : ashok on :09-12-2022 15:16:13 अशोक मिश्र खबर सुनें


अशोक मिश्र
जैन धर्म भारत के सबसे पुराने धर्मों में से एक है। जैन धर्म में अहिंसा का बहुत महत्व है। जैन धर्म के संत-महात्मा मुंह पर हमेशा एक कपड़ा बांधकर चलते हैं ताकि भूल से भी कोई जीव मुंह में न चला जाए और उसकी मौत हो जाए। वे लोग चलते समय भी जीव जंतुओं का ध्यान रखते हैं। यही जैन धर्म की महानता है। जैन धर्म के जितने भी तीर्थंकर हुए हैं, उन सबने मनुष्यों को आपस में प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया है।

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तीर्थंकर भगवान महावीर अपने साधकों को समझाया करते थे कि जो व्यक्ति सादगी से जीवन बिताता है, लोगों से छल-कपट नहीं करता है। बुरे कार्य करके धन नहीं कमाता है। वह हमेशा सुखी रहता है। व्यक्ति चाहे अच्छे कर्म करे या बुरे, उसका परिणाम उसे भुगतना ही पड़ता है। जब व्यक्ति बुरे कार्य करके धन कमाता है, तो उसका उपयोग पूरा परिवार करता है, लेकिन जब उसके परिणाम भुगतने की बारी आती है, उस समय उसे अकेले ही भुगतना पड़ता है। जो व्यक्ति सात्विक, सदाचारी, निष्कपट रहता है, उस व्यक्ति को थोड़े से प्रयास से निर्वाण की प्राप्ति हो जाती है।

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उन्होंने साधकों को संबोधित करते हुए कहा कि सच्चा भिक्षु वही होता है, जो दूसरों को कटु वचन नहीं बोलता है। जो व्यक्ति क्रोध नहीं करता है, जिसको अपनी इंद्रियों पर भरोसा होता है, वही व्यक्ति संत होने लायक होता है। जो व्यक्ति संकट आने पर भी व्याकुल नहीं होता है, वही भिक्षु है। बहुत सारे लोग भिक्षु का वेश धारण कर लेते हैं, लेकिन सच्चे अर्थों में भिक्षु वही होता है, जो सद्गुणी हो, चरित्रवान हो, जीवों के प्रति दया रखता हो, जो हर प्रकार का त्याग करने को तैयार रहता हो, वही सच्चा संत है।

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